जून 2026

पुस्तकसबसे उपेक्षित वर्ग की गुलाबी गलियाँ     Posted: November 1, 2023

  सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुरेश सौरभ द्वारा संपादित लघुकथा संग्रह ‘गुलाबी गलियाँ’समाज के सबसे उपेक्षित, तिरस्कृत तथा निन्दनीय वर्ग वेश्याओं के अंतहीन दर्द और वेदनाओं का जीता जागता एक दस्तावेज है। दुःख के महासागर को समेटे हुए इस संग्रह की लघुकथाओं में समाज के दोहरे चरित्र को उजागर करने का ईमानदारी से प्रयास किया गया है। जहां एक ओर दिन के उजाले में उन्हें चरित्रहीन तथा समाज का गंदा धब्बा तवायफ, कुलटा जैसे जुमलों से नवाज़ा जाता है, वहीं दूसरी ओर रात के अंधेरे में वे ही घृणित नारियाँ रम्या बन जाती हैं। 

उसके मन की इच्छओं, भावों, और संवेदना को पुरातन काल से ही पुरुष द्वारा नकार दिया गया। इन्द्र द्वारा अहिल्या हरण, भीष्म द्वारा अम्बा अम्बालिका का हरण चंद उदाहरण हैं। ‘गुलाबी गलियाँ’’की प्रत्येक लघुकथा में वेश्याओं की यही अर्न्तवेदना स्पष्ट रूप से मुखरित होती दीख पड़ती है। 

 प्रारम्भ करें संग्रह की प्रथम लघुकथा ‘मरुस्थल’से। सुकेश साहनी की यह एक ऐसी औरत की करुण दास्तान है जिसके लिये पति ही उसके अस्तित्व का प्रमाण था। उसकी मृत्यु के पश्चात वह आर्थिक मोर्चे पर हारकर चकलाघर पहुँच जाती है। पति के हमशक्ल ग्राहक में अपने पति को खोजने के निरर्थक प्रयास में अन्त में मर्मान्तक दुःख ही उसके हाथ लगता है।          

           सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र  अवस्थी ने अपनी  एक रचना में लिखा है-“औरत के पैरों तले पक्की जमीन होती ही नहीं। उसके सिर पर हमेशा बोझ होता है, आर्थिक गुलामी कापति की मौत होने पर, बीमारी में परिवार  का पेट भरने के लिए मजबूर होकर ऐसी औरतें वेश्या बन जाती हैं। इस मजबूरी की तड़प देखने को मिलती है-पूनम (कतरियार) की ’खुखरी’, सत्या शर्मा की ‘पीर जिया की’, सीमा रानी की ‘ईमानदारी’,महावीर रावांल्टा की लघुकथा ‘मदद के हाथ’ जैसी लघुकथाओं में। 

          प्राचीन कल से ही यह देखा गया है कि पुरुष द्वारा निर्मित परिवेश में जो स्त्री स्वयं को नहीं ढाल पाती, अपना अस्तित्व सिद्ध करने की कोशिश करती हैं, परन्तु आर्थिक रुप से सक्षम  नहीं हैं, तो अपने पति, प्रेमी, रिश्तेदार यहां तक कि पिता, भाई के द्वारा भी चकलाघर पहुँचा दी जाती हैं। रेखा शाह की लघुकथा ‘इस देश न आना लाडो’ में प्रेमी द्वारा, ऋचा शर्मा की  ‘निष्कासन’और मनोरमा पंत की ‘पेशा’ में पति द्वारा, सुधा भार्गव  की ‘वह एक रात  में’ पिता के कारण और डॉ. अशोक गुजराती की ‘बेटी तू बची रह’ में दलाल द्वारा लड़कियों को वेश्यावृति में धकेल दिया जाता है।

   वेश्या का काम है तन से पुरुष को खुश करना। लेखन से उसका क्या वास्ता ? मीरा जैन की लघुकथा ‘कालम खुशी का’ में नगरवधू जैसे ही आत्मकथा के रूप में एक किताब लिखने की घोषणा करती है तो अगले दिन ही वह लापता हो जाती है। क्यों ? पाठक इसे भली-भाँति जानते हैं। यह लघुकथा सभ्य समाज पर एक तमाचा है।

        चकलाघर में पहुँच जाने पर भी कुछ वेश्याएँ अपने स्त्रीयोचित अस्तित्व को बचाए रहती हैं। अनिल पतंग की ‘मजहब’ लघुकथा में सलमा वेश्या समाज के तथाकथित सफेदपोश संभ्रात जनों को कटाक्ष सहित आईना दिखाती है। वह निडरता से कहती है “मैं तो सिर्फ शरीर बेचती हूँ हुजूर ! पर आप लोग ईमान के साथ पूरा देश बेचते हैं। आपका और मेरा एक ही मजहब है केवल पैसा ,पैसा,पैसा।”

      भगवान  वैद्य  की लघुकथा ‘असली चेहरा’ में वेश्या सुंदरी तल्खी के साथ कहती है –“इस शहर के एक और तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्ति का असली चेहरा लेकर जा रही हूँ। रुपम झा की लघुकथा ‘गंगाजल’ में वेश्या कहती है-“हम तो दुनिया को बता के अपनी अदाएँ बेचतीं हैं लेकिन आप जैसे लोग तो.. अपनी आत्मा और ईमान बेच लेते हैं साहेब।”

    रघुविंद्र यादव के ‘चरित्र हनन’में चंपा बाई चिढ़ कर बोलती  है-‘‘आज के नेताओं के पास चरित्र है ही कहां? जिसका कोई हनन कर सके।’’

      नीरू मित्तल की एक शानदार लघुकथा है जिसमें ग्राहक वेश्या से कहता है-“पति और बच्चे के होते हुए तुम्हें यह सब करने की क्या जरूरत है?’’

 ‘‘जरूरत होती है साब…..घर की बहुत सी जरूरत हैं, कुछ इच्छाएँ भी होती हैं। पति के आगे हाथ फैलाना और मन मसोस कर रह जाना बहुत मुश्किल होता है।’’

      यह लघुकथा उन लोगों की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है, जो वेश्याओं के ऊपर अपना पैसा लुटा देते हैं और पत्नी की छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करने के लिए भी उसे पैसा नहीं देते। दिनेश कुमार थर्रा उठा यह सोचकर कि पहले पत्नी लड़ती थी, पर अब बहुत समय से खामोश रहती है, कहीं उसकी पत्नी भी तो……….?,आगे आप समझ ही गए होंगे ।

   मर्द अपने पुत्र में अपनी परछाई को देखता है। अतः उत्तराधिकारी को जन्म देने के लिये उसे पत्नी की आवश्यकता पड़ी। मर्द का हमेशा से यही दृष्टिकोण रहा कि उसकी पत्नी, कभी भी किसी गैर मर्द का संग न करे और पवित्र बनी रही, जबकि स्वयं के लिए उसका अपना दृष्टिकोण है कि पत्नी उत्तराधिकारी को जन्म देने के लिए, और वेश्या खुशी देने के लिए होती है। 

 पुरुष की इसी दोहरी मानसिकता को इस संग्रह की लघुकथाओं में बखूबी चित्रित किया गया है। शुचि भवि की लघुकथा ‘रजिस्टर्ड तवायफ’ में जीनत तवायफ ग्राहक प्रफुल्ल के बटुए से गिरी उसकी पत्नी की फोटो देखकर कहती है- ‘‘साहब किसी और के बटुए में भी यही तस्वीर देखी है।’’तो प्रफुल्ल पागल- सा हो जाता है; क्योंकि उसकी पत्नी मर्द के पहले से बने-बनाए चौखट में फिट नहीं हो रही थी, ऐसा उसे लगता है जबकि सच्चाई बड़ी पाकीजा थी।

     रमेश प्रसून की लघुकथा ‘आधुनिक रंडियाँ’ लघुकथा में एक अनुभवी वेश्या व्यंग्यपूर्वक कहती है ‘सुनो कास्टिग काउच, लिव इन रिलेशन, पत्नियाँ की अदला-बदली क्या वेश्यावृत्ति नहीं?

    वेश्याओं का जन्म जिन्दगी के अँधियारों में होता है और उसी अँधेरे में खामोशी से अंत भी हो जाता है। पूरी जिन्दगी उनका इस्तेमाल  एक वस्तु की तरह होता है। अदित कंसल की लघुकथा ‘चरित्रहीन’ में सोनी कहती है-‘‘इस शहर में ऐसा कोई नहीं जो हमारे जज्बात समझे। सब जिस्म के भूखे भेड़िए हैं।’’

    इसी तरह के दर्द और वेदना के संवाद सुधा भार्गव की लघुकथा ‘वह एक रात में’ देखने को मिलते हैं।

           कई लघुकथाओं में वेश्यालय में जन्मे ऐसे बच्चों का जिक्र किया गया है, जो जलालत की जिंदगी से बाहर निकल पाए और एक हसीन मुकाम पर पहुँच गए। ‘बजरंगी लाल की ‘वापसी’, कल्पना भट्ट की ‘बार गर्ल’ विभा रानी श्रीवास्तव की ‘अँधेरे घर का उजाला’ अलका वर्मा की ‘मैं ऋणी हूं’ मंजरी तिवारी की ‘एक देवी’, जिज्ञासा सिंह की ‘आहट’, राजेंद्र पुरोहित की ‘रंग बदलती तस्वीर में’ ऐसे ही बच्चों की तस्वीरें उकेरी गईं हैं।                                 

     वेश्या से विवाह करके उसे सामान्य जिंदगी देने वाली आदर्श लघुकथाएँ भी इस संग्रह की शोभा बढ़ाती है। सुधा भार्गव की ‘वह एक रात’अभय कुमार भारती की ‘कोठे वाली’ राजकुमार  घोटड़  की ‘कोठे के फूल  में’ ग्राहक  वेश्याओं  से विवाह  करके उन्हें सम्मानजनक जिन्दगी प्रदान करते हैं।

सत्या शर्मा की लघु कथा ‘पीर जिया की ‘में लिखा हुआ है कि उस हाड़-मांस के शरीर के अंदर एक कोमल हृदय भी था,जो न जाने कब से किसी के लिए तड़पने को बेचैन था,पर वेश्याओं के लिए तो यह सोचा जाता है कि उनका कोई मन ही नहीं होता है।

  पढ़िये कुछ चुभते हुए  वाक्यांश  जो वेश्याओं के लिए  कहे जाते हैं ।

  -वह एक कलंक है और नए कलंक को जन्म देने जा रही है 

  (ज्ञानदेव मुकेश  की ‘शूल तुम्हारा, फूल हमारा’)

 -तुम्हारा क्या धर्म और क्या जात (गुलजार  हुसैन की ‘दंगे की एक रात’)

-हर रोज नये नये मर्द फाँसती है यह (कांता राय की ‘रंडी’लघुकथा)

-भगवान के मंदिर को भी नहीं छोड़ा इन लोगों ने। छिः कैसे लोग हैं, यहाँ भी गंदगी फैलाने आ गए (डॉ.रंजना जायसवाल की ‘कैसे कैसे लोग’)

-साली को कहीं जगह नहीं मिलती तो यहां चली आती है। (सिद्धेश्वर  की ‘आदमीयत’)

-इन लोगों की क्या औकात है मेरे सामने (रुपम झा की ‘गंगाजल’)

-चुप रह रंडी। हमसे बराबरी करती है (मुकेश कुमार ‘मृदुल’ की ‘चोट’) 

-रास्ते की औरत और गली का कुत्ता कभी इज्जत नहीं पाते (रमेशचन्द्र शर्मा की लघुकथा ‘कैरेक्टर लेस’)

         इस संग्रह  में अपमानित  करने वाले इन जुमलों को नकारती हुई ऐसे भी अनेक लघुकथाएँ हैं, जो वेश्याओं के उजले पक्ष को समाज के सामने रखती हैं। ये लघुकथाएँ बतलाती हैं कि जो वेश्याएँ इस गंदगी फँसी हुईं हैं, वे नहीं चाहती कि और भी लड़कियाँ उसमें  धकेली जाएँ या उनके कारण किसी ग्राहक का घर बर्बाद हो।

    इससे संबंधित कमलेश भारतीय की एक खूबसूरत लघुकथा है ‘प्यार नहीं करती’ जिसमें वह अपने ग्राहक का घर उजाड़ना नहीं चाहती है। इसलिए वह कहती है-जब मैं एक औरत द्वारा अपना पति छीन लिये जाने का दुख भोग रही हूँ। तब तुम मुझसे यह उम्मीद कैसे करते हो कि मैं अपना घर बसाने के लिए किसी का बसा बसाया घर उजाड़ दूँगी?’’

   इसी तरह की और भी लघुकथाएँ हैं जैसे मिन्नी मिश्रा की ‘दलदल’ पूनम आनंद की लघु कथा ‘तवायफ’ रमाकांत चौधरी की बेहतरीन लघुकथा ‘गुलबिया’ चित्रगुप्त की ‘सीख’ ऋचा शर्मा की ‘माँ- सी’ नीना मंदिलवार  की ‘नवजीवन’, राजकुमार घोटड़; की ‘कोठे के फूल ‘,राजेंद्र पुरोहित की ‘रंग बदलती तस्वीर’ अरविंद असर की ‘उसूल’ विजयानन्द विजय की ‘धुंधलका छँटता  हुआ’अशोक गुजराती की ‘बेटी तू बची रह’ ज्योति मानव की ‘एक गुण’आती हैं । 

        तन और मन के गहरे भेद को समझाते-बुझाते हुए सुरेश सौरभ की लघुकथा ‘गंगा मैली नहीं’ में कहा गया है ‘गंगा मैली नहीं होती, कभी नहीं होती।… किसी वेश्या के लिए सौरभ जी के भाव पावन व पुनीत हैं।

  लेखक गुलजार  हुसैन ‘दंगे की रात में’ वेश्या को कह जाते हैं-सबसे खूबसूरत औरत..  और वह यही नहीं रुकते वेश्या को गुलाब की सुंगध तक कह डालते हैं। ओमप्रकाश क्षत्रिय की लघुकथा ‘सफाई’ में  वेश्या का पावन चरित्र दृष्टिगोचर होता है। डॉ.चन्द्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा ‘देवी’ भी वेश्या का पवित्र रूप दर्शाती है।

     इन लघुकथाओं में कुछ लघुकथाएँ ऐसे भी हैं, जिनमें यह दिखाया गया है कि कुछ  लेखक /पत्रकार  वेश्याओं  की जीवनी जानने के लिए कोठे पर पहुँचते हैं, पर उनके जख्मों को कुरेदने के कारण  उन्हें,  अपमानित ही होना पड़ता है। इन लघुकथाओं में भगवती प्रसाद द्विवेदी की ‘गर्व’ लघुकथा है जिसमें वेश्या कहती है-‘‘हमें बकवास पसंद नहीं। फटाफट अपना काम निपटाओ और फूटो।’’

     डॉ. सुषमा सेंगर की लघुकथा ‘झूठ के व्यापार’ में एक बड़े कहानीकार को कहा जाता है-जिसे देखो वही मुँह उठाए चला आता है जख्म कुरेदने।

    नज़्म सुभाष  की लघुकथा ‘ग्राहक’में हृदयहीन ग्राहक वेश्या की खराब तबियत  की परवाह ही नहीं करता है।…. एक कठोर यथार्थ नज्म़ ने प्रस्तुत किया है।

    इस संग्रह की और भी प्रेरणात्मक लघुकथाएँ हैं जिनमें ,देवेन्द्र राज सुथार की ‘बदचलन’, डॉ.प्रदीप उपाध्याय  की ‘वादा’, डॉ .शैलेश गुप्त  ‘वीर’ की ‘गुडबाय’ सुषमा सिन्हा की ‘पापी कौन’ अनिता रश्मि की ‘असर’ अविनाश अग्निहोत्री की ‘नातेदार’ ,कल्पना भट्ट  की ‘बार गर्ल्स’  डॉ. पूनम आंनद  की ‘तवायफ ‘,राजेन्द्र वर्मा की ‘बहू ‘, विभा रानी श्रीवास्तव  की ‘अंधेरे घर का उजियारा’ , बजरंगी लाल यादव  की ‘सजना है मुझे’ तथा जिज्ञासा सिंह की ‘आहट’ राजेन्द्र  उपाध्याय  की ‘दृष्टि’ पुष्प  कुमार  राय  की ‘बार गर्ल्स’ नीना सिन्हा की ‘निषिद्धौ पाली रज’ डॉ..सत्यवीर जी की ‘सीढियाँ उतरते हुए’, विजयानंद विजय की ‘धुंधलका छँटता हुआ’ सहित सभी लघुकथाएँ श्लाघनीय हैं।

    सबसे सुखद यह है कि इस संग्रह की भूमिका प्रसिद्ध साहित्यकार संजीव जायसवाल ‘संजय’ ने लिखी है। दो उदीयमान साहित्यकार देवेन्द्र कश्यप ‘निडर’ व नृपेन्द्र अभिषेक नृप ने भी इस दस्तावेजी संग्रह में अपनी छोटी-छोटी विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ जोड़कर, संग्रह को और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया है।

   अंत में मैं सुरेश सौरभ जी के संपादकीय शब्द दोहराना चाहती हूँ-“इस साझा संकलन को पढ़ते-पढ़ते वेश्याओं के जीवन, उनके संघर्ष उनके सुख-दुख पर अगर एक व्यक्ति की भी संवेदना जाग्रत होती है तो मैं समझता हूँ कि इस संग्रह का उद्देश्य पूर्ण हुआ। मेरा श्रम सार्थक हुआ।’’ 

 मैं सौरभ जी को इस सुंदर लघुकथा संकलन के संपादन हेतु बधाई प्रेषित करती हूँ। सुंदर आवरण बनाने, किताब को हार्ड बाउंड मजबूत बाइंडिंग में प्रकाशित करने के लिए भी मैं श्वेतवर्णा प्रकाशन की मुक्तकंठ से प्रशंसा करती हूँ।

गुलाबी गलियाँ (साझा लघुकथा संग्रह):संपादक-सुरेश सौरभ, वर्ष-2023,,मूल्य-249रु पृष्ठ; 124,प्रकाशन-श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली।

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