अध्ययन, विश्लेषण, मूल्यांकन एवं अर्थ निगमन की प्रक्रिया का नाम आलोचना है। रचना को पूर्णता प्रदान करती है आलोचना लेकिन आज आलोचना की सबसे बड़ी समस्या क्या है? विश्वसनीयता! ख्यात लघुकथा मर्मज्ञ, कथाकार, व्यंग्यकार श्री सूर्यकांत नागर जी ने भी लघुकथा के विविध पक्षों का विवेचन करती अपनी कृति- ‘लघुकथा वृत्तान्त ‘ की प्रस्तावना में इसी पीड़ा को व्यक्त किया है । उनके अनुसार साहित्य की विभिन्न विधाओं में संभवतः लघुकथा-आलोचना ही सर्वाधिक अनुर्वर, विवादास्पद और अविश्वसनीय विधा है। आलोचक को निर्भीक, निर्लोभ और निष्पक्ष होना चाहिए, वैमनस्यता रहित। गुटपरस्त तथा शिविरबद्धता के कारण आलोचना पूर्वाग्रहों का विकृत चेहरा बन चुकी है। आलोचक को लेखक की भावना को समझ पात्रों में प्रवेश करना चाहिए। उसे कला और भाव पक्ष दोनों को देखना चाहिए । एक कुशल समीक्षक धूप और बारिश देख छाता पकड़ने की कला सिखाता है । विमर्श के बढ़ रहे अकाल के दौर में नागरजी सोचकर ही सिहर उठते हैं कि विचार का ही अंत हो गया तो शेष क्या रहेगा ?
हालांकि वे संतोष व्यक्त करते हैं कि लघुकथा में अब पहले सा शोर या नारेबाजी नहीं है। वह सलीके से बुनी जा रही है ( अध्याय-लेखकीय जागरूकता से …)
120 पृष्ठ की इस लघुकथा विमर्श केन्द्रित पुस्तक के तीन खण्ड हैं-आलेख, व्यक्तित्व और समीक्षा ।
‘जरूरी है नवोन्मेषी साहित्य सृजन’ में नागर जी लघुकथा में अध्यात्म दृष्टि न्यूनता की पीड़ा व्यक्त करते हैं साथ ही अध्यात्म की सूक्ष्म परिभाषा देते हुए ये भी स्पष्ट करते हैं कि अध्यात्म का सम्बन्ध किसी धार्मिक विचारधारा से नहीं है बल्कि उसका भाव आत्मा -परमात्मा सम्बन्धित चिंतन से है । वास्तव में अध्यात्म का अर्थ है आत्मा का अध्ययन या स्वयं को जानना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जहाँ व्यक्ति अपने आंतरिक अस्तित्व, अपनी चेतना और स्वयं के वास्तविक स्वभाव को समझने का प्रयास करता है ।
‘ लघुकथाओं में पुरुषवादी सोच’ अध्याय का कथन ‘कई बार औरत इसलिए चुप्पी साधे रहती है ताकि घर बचा रहे ।’सोचने पर विवश करता है ।’विगत सदी के अंतिम दशक के लघुकथा परिदृश्य’ में सूर्यकांत नागर अनुवाद को लेकर एक कसक बयान करते हैं। वे कहते हैं कि हम हिन्दी के लघुकथाकार गैर हिन्दीभाषियों से तो अपेक्षा करते हैं कि वे हिन्दी के करीब आएँ; लेकिन हम अन्य प्रांतीय भाषाओं को सीखने- जानने की कोशिश नहीं करते। विश्वास देकर ही विश्वास पाया जा सकता है ।
अन्य अध्यायों में लघुकथा में शिल्प और शैली तथा नारी विमर्श पर विस्तृत और प्रभावी तरीके से लिखा गया है । नागर जी कहते हैं कि लघुकथा को भाव, कला, भाषा, संवाद की दृष्टि से देखा जाना चाहिए न कि दर्जी के फीते से नापने की कोशिश की जानी चाहिए।
व्यक्तित्व खंड में नागर जी ने लघुकथा के ख्यात हस्ताक्षरों श्यामसुन्दर व्यास, बलराम, मधुदीप, विक्रम सोनी, रमेश बत्तरा, सतीश राठी और रूप देवगुण के कृतित्व के आवश्यक बिन्दुओं पर विस्तृत रूप से लिखा है । ‘कथा कहे बलराम’ में नागर जी स्पष्ट करते हैं कि लघुकथा में अंतर्विरोध होगा तो व्यंग्य स्वत: अपनी जगह बना लेगा । व्यंग्य की प्रमुखता से लघुकथा का कथा -तत्व भटक सकता है । इसी अध्याय में लघु कहानी आंदोलन का भी जिक्र आया है । इसी प्रकार सतीश राठी के संदर्भ में पारस दासोत और क्षितिज संस्था का भी उल्लेख हुआ है ।
डॉक्टर श्यामसुन्दर व्यास की लघुकथा ‘ठंडी आग’ एक अत्यंत उल्लेखनीय उदाहरण है – साक्षात्कार के बाद मुँह लटकाए जब सुदर्शन घर लौटा तो वृद्ध पिता ने पूछा, “क्या हुआ?”
“वही, जो हमेशा होता है…।” हारे-थके स्वर में बेटे ने कहा।
पिता ने बेटे को पास में बैठाया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “हार कर बैठने से अच्छा है चलना। पगले ! प्रतिभा और परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाते।”
बेटे ने उठती निःश्वास को बरबस दबाकर धीमे से कहा, “इस देश में पैसा या पहुँच ही सब कुछ है बापू?”
बापू क्या कहते, चुप रहे। सुदर्शन भी चुप रहा। पर उसके अंदर उमड़ता मेघ वृद्ध पिता के झुर्रीदार चरणों पर पानी की दो बूँद बनकर अनायास झर पड़ा।
वृद्ध पिता ने विचलित होते हुए कंपित स्वर में कहा, “मन की इस आग को पानी मत बना बेटे। ठंडी आग ठुकराई जाती है, पूजी नहीं जाती।”
सूर्यकांत नागरजी ने ‘प्रेमचंद की कथाओं में आधुनिक दृष्टि ‘ में प्रेमचंद की आठ-दस कथाओं को ही आधुनिक लघुकथा के समकक्ष बताया है। यहाँ ठहर कर वे आधुनिकता बोध की बात करते हैं । प्रेमचंद के काल में अज्ञान, अंधविश्वास, पाखंड, नारी उद्धार पर उनका लेखन ही आधुनिकता बोध था।
समीक्षा खंड में समकालीन यथार्थ को प्रभावी ढंग से चित्रित करती डॉक्टर अशोक भाटिया की कृति ‘अंधेरे में आँख’ , चैतन्य त्रिवेदी की ‘कथा की अफवाह’ और डॉक्टर बलराम अग्रवाल की ‘पीले पँखों वाली तितलियाँ’ की समीक्षाएँ हैं । डॉक्टर अशोक भाटिया में एक खास किस्म की ख़लिश देखते नागर जी चैतन्य त्रिवेदी को शिल्प और कथ्य दोनों स्तर पर सदैव नए आयामों की तलाश करते और डॉक्टर बलराम अग्रवाल को विलक्षण रचना विधान रचते पाते हैं ।
पुस्तक का प्रूफ त्रुटि रहित है और मुखपृष्ठ आकर्षक और संदेशप्रद ।
लघुकथा को चाभी का खिलौना, शॉर्टकट, पार्ट टाइम जॉब मानने वालों को आगाह करती और लघुकथा के विविध पक्षों का विवेचन करती यह पुस्तक न केवल विमर्श के नये वातायन खोलती है बल्कि लघुकथाकारों को समकालीन यथार्थ के प्रति सजग रहने को प्रेरित भी करती है ।
अपने कथ्य और उद्देश्य में बेहद सफल एक अत्यंत संग्रहणीय कृति ।
– सन्तोष सुपेकर , उज्जैन, . 9424816096