प्रोमिला कुछ दिन के लिए बहू-बेटे के साथ मुम्बई रहने आई। घर का चाल-चलन देखकर हैरान थी। बहू और बेटा दोनों ही अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं। न कोई घर का ध्यान है न बच्चों का। वह कब क्या खाते हैं क्या पीते हैं, उन्हें कोई ख़बर नहीं। सुबह से शाम तक घर के सारे काम करने के लिए एक सहायक रखी हुई है। वह जो जैसा पका दे वही सब खा लेते हैं। प्रोमिला सोच रही थी, क्या बहू पूरे दिन में खाना पकाने के लिए एक घंटा भी नहीं निकाल सकती। छोटे-छोटे बच्चों को कामवाली के सहारे छोड़ रखा है। कई बार उसने इस विषय में बहू से बात करने की सोची मगर यह सोचकर चुप रह गई कि कहीं उसे बुरा न लग जाए।
आज दोपहर पौत्री रीना जब स्कूल से आई तो बुखार में तप रही थी। प्रोमिला ने बहू को आवाज़ लगाई, “अंबिका रीना को बुखार है, आकर इसे दवाई देदे।”
लैपटॉप पर आँखें गढ़ाए-गढ़ाए ही अंबिका ने कामवाली को आवाज़ दी, “लक्ष्मी रीना को 15एम एल बुखार की दवाई देदे।”
प्रोमिला यह देखकर कुढ़ते हुए बुदबुदाई, “आग लगे ऐसी नौकरी को जो संतान के दुख का अहसास भी न होने दे। भला दो मिनट उठकर बच्चे को दवाई भी नहीं दे सकती।”
रात को खाने की मेज़ पर प्रोमिला ने पूछ ही लिया, “अंबिका ऐसी भी क्या नौकरी है तेरी जो अपने बीमार बच्चे को तू दस मिनट भी नहीं दे पाई।”
थकी आवाज़ में अंबिका बोली, “क्या बताऊँ अम्मा जी! डायरेक्टरशिप पाना कोई आसान काम नहीं होता। बस वही पाने के लिए दिन-रात इतनी मेहनत कर रही हूँ। आप ही सोचो, डायरेक्टर बनकर जब मैं ढ़ेर सारा पैसा कमाऊँगी तो उसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा आपकी पौत्री को ही होगा। मैं उसकी सारी इच्छाएं पूरी कर सकूँगी।
बहू की बातें सुनकर आज तो प्रोमिला से रहा न गया तंज कसती बोली, “तू तो बस रहने ही दे बहू, ईश्वर द्वारा मुफ़्त में मिली माँ की गोद और ममता का सुख तो तू उसे दे नहीं सकी, पैसा कमाकर ख़ाक सुख देगी।”
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