पसंद, मोटे तौर पर हमारी वैचारिक स्थिति और संवेदना के स्तर पर लिया गया तात्कालिक निर्णय होती है। फिर समय की कसौटी उसे बार-बार सार्थकता तथा प्रासंगिकता पर कसती रहती है। समकाल के नवाचार आपकी पसंद के अस्तित्व को लगातार तौलते रहते हैं। बहुत कम रचनाएँ इन पर कसौटियों लगातार खरी उतरतीं रहतीं हैं। जो उतर जातीं हैं, वे इतिहास में कालजयी रचना की तरह दर्ज हो जातीं हैं- भले ही वह इतिहास किसी व्यक्ति विशेष की चेतना का हो, समाज का हो या किसी काल का हो।
इतिहास के साथ एक मुहावरा चलता है, जो इतिहास को बार-बार दोहराता है। इतिहास को बार-बार दोहराए जाने का तर्क विज्ञान में साइनोसाइडल वेव फॉर्म से लेकर, सृजन की दुनिया में भविष्य दृष्टि तक विस्तार पाता है।
यदि मैं अपनी पसंद की बात करूँ, तो मुझे वह रचनाएँ पसंद आतीं हैं, जिनमें समकाल की विधागत प्रवृत्तियाँ भरपूर हों और उसमें से भविष्य दृष्टि की रोशनी निकल रही हो। बहुत सारे सार्थक और महत्वपूर्ण लेखन के बीच से अपनी दो पसंदीदा रचनाओं का चयन करना सचमुच कठिन कार्य है।
फिलहाल मुझे अपनी पसंद की दो लघुकथाओं पर बात करनी है। जबकि मेरे सामने खलील जिब्रान, फ़्रेंज़ काफ़्का, जयशंकर प्रसाद, मंटो, विष्णु प्रभाकर, अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन, ओ हेनरी, परसाई, शरद जोशी, रघुवीर सहाय, एन.उन्नी, सतीश दुबे, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी तथा चैतन्य त्रिवेदी आदि सैकड़ों लेखकों की लघुकथाएँ उपस्थित हैं। यदि इनमें हमारी दादी-नानी के मुँह से सुनी गईं सैकड़ों लघुकथाओं को भी जोड़ दें, तो यह लघुकथाओं का समुद्र बन जाता है। इस समुद्र से दो बूँद जल निकलना, मेरी पसंद के साथ न्यायोचित नहीं है। समय और स्थान की सीमा को ध्यान में रखते हुए और इन चयनित लघुकथाओं के समान और भी बहुत सारी लघुकथाएँ मुझे पसंद हैं, को स्वीकार करते हुए मैं अपनी पसंद प्रस्तुत कर रहा हूँ। संभवतः यह कह सकता हूँ मेरा चयन सिर्फ समकालीन लघुकथाओं में से है।
सबसे पहले एकदम ताजा, कथादेश के सितम्बर 2025 अंक में प्रकाशित सुकेश साहनी जी की लघुकथा – ‘वह तीसरा’ का ज़िक्र करना चाहूँगा। कुल 353 शब्दों की इस लघुकथा को पढ़ने में 2-3 मिनट का समय लगा। पाठ के बाद जब लघुकथा के अनकहे ने, जब मन में विस्तार पाना शुरू किया, तो कई दिनों तक उसमें से कथ्य और विवेक निकलते रहे। यह लघुकथा हमारे युग में बाजार, मनुष्य और तकनीक के अंतर्संबंध, हस्तक्षेप और प्रभाव की बहुत बड़ी आख्यान है। इसमें बाज़ार और तकनीक की साँठ-गाँठ और उनके शिकार मनुष्य की विवशता को बहुत ही समर्थ ढंग से रेखांकित करने में लेखक सफल हुआ है। मैंने लेखक की सफलता इसमें नहीं देखी कि उसकी भाषा बहुत अच्छी है, या कहानी की बुनावट कसी हुई है, या कहानी पाठ में पाठक को बाँधकर रखती है। ये सब चीजें तो रियाज़ से भी हासिल होतीं हैं। ऊपर से सुकेश साहनी जैसे बहुचर्चित और सुप्रतिष्ठित लेखक की लघुकथा में यह सब बहुत ही सामान्य तरीके से आयत होते हैं। यदि कोई नया लेखक होता, तो जरूर इन विधागत अनुशासन और कौशल की पड़ताल की जाती। हमें तो यह देखना था कि एक शीर्षस्थ लघुकथा लेखक अपने समय की जटिलता को किस तरह से पकड़ रहा है और अपनी जीवनदृष्टि से प्रसंस्कृत करके वह अपने पाठकों क्या दे रहा है ? जिस विषय में वह प्रवेश कर रहा है, उसकी जटिलता क्या है ? लेखक अपने समाने खड़ी चुनौतियों को किस तरह स्वीकार करता है। फिर उसकी सृजनात्मक कौशल कैसे एक रचना को जन्म देती है ? यह रचना अपने पाठ और पाठक में कितनी सम्प्रेषित हो रही है ? समय के बरक्स रचना की यात्रा कितनी और कैसी है।
सीने में उठते दर्द से, यह कहानी शुरू होती है। यह दर्द लेखक को नींद से बाहर कर देता है। यहीं पर सुबह के चार बजे का इशारा भी है। कहीं दिल का दौरा तो नहीं है, इस आशंका से लेखक वर्तमान में बहुतायत में घट रही बीमारी और उससे व्याप्त भय को रेखांकित कर रहा है। एक समय था, जब लोग दिल के दौरे की आशंका बुजुर्गों में भी नहीं सोचते थे, आजकल तो बच्चों के साथ भी यह स्वीकार्य है। यह हमारे समय और विशेषकर कोविड के बाद के समय में पैदा हुआ भय है। हर दूसरे दिन अखबारों में किसी युवा के दिल के दौरे से मृत्यु की ख़बर पढ़ने को मिल रही है। यानि कोविड महामारी समाप्त नहीं हुई, बल्कि बहुत सारी बीमारियों के जानलेवा क्षमता में विस्तार कर गई। अच्छी बात यह रही कि लेखक को सुबह के चार बजे के समय का आभास भी मिल गया था। जो विकल्प की संभावना को भी दर्शा रहा है। हुआ भी यही यह डकार के साथ बीमारी छू-मंतर हो गई।
एक तो भोर में नींद का खुलना, ऊपर से गैस और डकार जैसी प्रक्रिया से गुजरते हुए नींद का उचट जाना स्वाभाविक है। इस उचटी हुई नींद पर साइड टेबल पर पड़ी मोबाइल ने कब्जा कर लिया और वह सोशल मीडिया के दलदल में उतर गया। यहाँ पर उसकी चेतना सवाल उठा रही है कि अभी उसको समस्या हुई उसी से सम्बन्धित पोस्ट क्यों दिख रहे हैं ? मोबाइल का बाजार बीमारी के संकेत, दवा मंगवाने तथा डॉक्टर के सम्पर्क का ऑनलाइन पता लेकर उपस्थित हो गया। मार्केटिंग और बेचने की प्रवृत्ति हमारे जीवन और निज में कितनी भयानकरूप से घुसपैठ कर चुकी है। इसकी रणनीति ऐसी कि जब हम मानसिकरूप से सबसे कमजोर हैं, विवेक परिस्थितिगत दबाव में हाशिए पर दुबका होता है। ठीक उसी समय बाजार विकल्प लेकर दानव की तरह खड़ा हो जाता है। वस्तुतः बाजार आजकल वस्तु बेचता भर नहीं है, आपको खरीद भी लेता है। यहाँ पर लेखक की चेतना आम मनुष्य से अलग होकर कहती है – ‘पिछले कुछ दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि वह जो भी सोचता है या सोशल मीडिया पर देखता है, पलक झपकते ही उससे सम्बंधित पोस्ट्स का बाजार, तमाम लुभावने आफर्स लिए उसके सामने खुल जाता है।’ यह लिखकर लेखक अपने पाठक को सोशल मीडिया की बेचने की रणनीति को समझा देता है। सिर्फ समझाता नहीं है, पाठक को सावधान भी करता है। सावधान करने की प्रविधि लेखक अपनी भाषा और कहन से अर्जित करता है। यथास्थिति वर्णन में अपने लेखकीय कौशल से विचार को सम्प्रेषित करने का जो कथ्य यहाँ पर लेखक ने प्राप्त किया है, वह सराहनीय है।
कथा में आगे इस मोबाइल के बाजार की कृत्रिम मेधा की क्षमता और मनुष्य के निजता में उसके तकनीक के हस्तक्षेप को अँधेरे में मोबाइल के प्रकाश के माध्यम उल्लेखित होता है। यहाँ अँधेरे में मोबाइल का प्रकाश, अँधेरे के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि अंधकार को और भी गहन करता है। इस स्थापना में लेखक सफल है। यहाँ एक और सूत्र हाथ लगता है कि सारे प्रकाश अँधेरे के ख़िलाफ़ नहीं होते हैं। विशेषरूप से बाजार की तकनीक से उत्पन्न प्रकाश के प्रति सतर्क रहिए वह आपके जीवन में चौंधियाहट भरकर, अँधेरे को ही और भी प्रगाढ़ करते हैं। अंततः लेखक को पारम्परिक सुरक्षा पर ही भरोसा है, जब वह मोबाइल पर तौलिया डालकर निश्चिंत होता है।
पूरी कथा व्यंजना में एक तरफ बहुत व्यापक और बड़े बाजारू रणनीति को उद्घाटित करती है, तो दूसरी तरफ जीवन के वास्तविक घटना को रखकर अपनी स्थापना को प्रमाणित करने में सफल है। इस लघुकथा में भविष्य की बहुत बड़ी त्रासदी का मर्म करवट बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। दिखाई दे रहा है कि भविष्य में एक डेटा की औकात में सिमटे मनुष्य से बाजार किस तरह खेलेगा और मनुष्य अपनी त्रासदी का दर्शक भर बचेगा। यहाँ पर लेखक, अत्याधुनिक तकनीक की जटिलता को बहुत ही सरल अर्थों में पाठक के मन में उतारने सफल हुआ है। इस लघुकथा का लेखक मनुष्य, तकनीक और बाजार के बीच नया विमर्श खड़ा करने का बहुत मजबूत तर्क उपलब्ध करवा रहा है। इस विषय पर किसी भी बड़ी कहानी और उपन्यास के कथानक और मंतव्य से ज्यादा प्रभावशाली ढंग से यह लघुकथा काम करती हुई दिखाई दे रही है। समय के लिए बहुत ही जरूरी कथा लिखने के लिए लेखक को बहुत बधाई। लघुकथा की तकनीक, भाषा और व्यंजना को सीखने के लिए, इस लघुकथा का बार-बार पाठ करना चाहिए। आप सब के लिए मैं लघुकथा को नीचे उद्धृत कर रहा हूँ
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा ‘मकड़ी’ है , जिसकी लेखिका डॉ सुषमा गुप्ता जी हैं। संवाद – शैली में लिखी गई इस लघुकथा में डर के मनोविज्ञान को पकड़कर लेखिका ने समाज की बड़ी समस्या को रेखांकित किया है। यह लघुकथा अपनी भाषायी कसावट और कथ्य के व्यापक सरोकार की दृष्टि से पाठक को प्रभावित करती है।
160 शब्दों की इस लघुकथा में कथा का मुकम्मल आस्वाद मिलता है। कथानक, लेखिका द्वारा मकड़ी को मारे जाने जैसी बहुत ही स्वाभाविक घरेलू घटना से शुरू होता है, जो हर घर में सामान्यतः घटता ही रहता है। किन्तु जब किसी संवेदनशील सृजनधर्मी के घर में घटता है, तो उसमें से एक सशक्त लघुकथा निकलकर बाहर आ जाती है, जिसको कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता –17का प्रथम पुरस्कार भी मिल जाता है। खैर पुरस्कार किसी रचना की श्रेष्ठ या पसंदीदा होने की कसौटी नहीं हैं; लेकिन यदि कोई लेखन हमें पसंद आ रहा है और उसे पुरस्कृत भी किया जा चुका है, वह भी कथादेश जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में तो अपने पसंद के प्रति आत्मविश्वास बढ़ जाता है।
जब लेखिका धड़ाक् ! की आवाज़ के साथ मकड़ी को मारती है, तो उसके दोस्त या पति जो पास में बैठकर अखबार पढ़ रहे हैं, वह नज़र उठाकर लेखिका की तरफ़ देखते हैं। यहाँ पर बिना किसी शब्द और संवाद के सिर्फ नज़र से जीव– हत्या के विरुद्ध, सशक्त संदेश पाठक के मन में प्रवेश कर जाता है। यह संदेश लेखिका के सकपकाने और सफ़ाई देने के माध्यम से और भी गहन हो जाता है। वह कहती है कि मकड़ी से डर रही थी। फिर उसके सामने प्रतिप्रश्न उठता है – ‘‘मकड़ी तुमसे ताकतवर थी?’’
यह सवाल ही इस लघुकथा का मुख्य बिंदु है, जिसके जवाब पर पूरा कथानक खड़ा होता है – ‘‘अरे नहीं! कमज़ोर-सी थी। एकदम ज़रा-सी।’’ यहाँ पर एक व्यंग्य– मिश्रित संशय उठता है कि मकड़ी तुमसे कमजोर भी थी और तुमको उससे डर भी लग रहा था। कमजोर से डरना, लेखिका के अस्तित्व पर व्यंग्यात्मक प्रहार की तरह है, जिसकी प्रतिक्रिया में लेखिका का तर्क है – ‘‘उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी’’ सुकून में खलल एक ऐसा पद है, जो व्यक्ति के मनः और आकलन क्षमता से संचालित होता है।
यहाँ पर उसकी कल्पना और कल्पना के अतिरेक में एक बहुत छोटी सी चीज का भयानक स्वरूप स्वंय निर्मित हो सकता है। इसमें डर उत्पन्न करनेवाली वस्तु की पृष्ठभूमि और इतिहास भी सहायक होते हैं। समान्यतः मकड़ी से डर का कारण संस्कारगत और उसके द्वारा निर्मित रहस्यमयी परिवेश है। एक जाल में फँसकर मर जाने का आभास और उससे से जुड़ी अन्य तमाम रहस्यमयी कथाएँ मकड़ी को भयानक बना देतीं हैं। वस्तुतः मकड़ी के डर से कम उसके साथ जुड़ी संकल्पनाएँ डर का बड़ा कारण बनती हैं। यहीं पर जब बात आती है कि डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं, तो कथानक को एक सूत्र वाक्य मिल जाता है, जो सभ्याताओं में जीवन के निष्कर्शों से निकला और स्थापित है। यहीं से लेखिका को चेतना मिलती है और उसकी नज़र अखबार के हेडलाइन – भ्रष्टाचार के विरुध रैली निकालते छात्रों पर निर्ममता से लाठी
भाँजने पर टिक जाती है। यहाँ पर एक तरह की स्थिति को रखकर लेखिका अलग हट जाती है। कथा का बाकी विस्तार पाठक के अंदर होता है।
लघुकथा में बुने पृष्ठभूमि के आधार पर छात्रों के विरोध का व्याकरण समझने की दिशा मिलती है। यहाँ पर सत्ता का डर है। यह डर सत्ता के सुकून के खो जाने का है। यह डर सत्ता के गिर जाने का भी है। यहाँ इतिहास गवाह है कि विश्व की सत्ताओं ने अपने सुकून और सुरक्षा के लिए बहुत बड़े-बड़े संहार किए हैं।
सत्ता के इस डर से कमजोर और निस्सहायों के खून से इतिहास की किताबें रँगी पड़ीं हैं। इस अमानवीय प्रक्रिया का तर्क अपनी सत्ता और नियन्त्रण को बचाए रखना है। सत्ता भयभीत इसलिए है कि छात्र रैली निकाल रहे हैं। यहाँ पर सत्ता लाठी भाँजकर उन छात्रों का दमन करती है। हो सकता है, लाठी के भय से वे रैली स्थगित कर दें। सबकुछ सत्ता के नियन्त्रण में आ जाए। सत्ताधारियों को सुकून हो जाए। यहाँ एक घटना, जो बिना घटे, घटित हो रही है। वह यह है कि सत्ता स्वीकार कर रही है कि वह भ्रष्ट है, तभी तो वह इस रैली का दमन कर रही है। इस तरह से एक मकड़ी को मारने की छोटी- सी घटना, देश की बहुत बड़ी घटना से जुड़ जाती है। न केवल जुड़ती है, उसके भेद भी खोलती है। पाठक के मन में उसका पक्ष भी निर्मित करती है। अंततः यह लघुकथा अपने पाठक को मानवीय और सकारात्मक चेतना से समृद्ध करने सफल हो जाती है।
व्यंग्य, कटाक्ष और दृश्य के माध्यम से अंतरात्मा तक पहुँचना और बिट की तरह से अपनी बात करना, कथानक की सम्प्रेषणीयता को धारदार बनाता है। एक बिट पर कथा को समाप्त करना और कथा के गुणों को भी बचा ले जाना, बहुत कठिन काम होता है। लेखिका इसमें सफल हैं और भविष्य के लेखकों के लिए उदाहरण भी।
पाठकीय चेतना के अलावा, इन दोनों लघुकथाओं के पाठ से लघुकथा लेखकों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। भाषा-व्यवहार, कथ्य की बुनावट, कहन की मौलिकता और अपनी विधा के विकास की अगली कड़ी बनने के कौशल को सीखने के लिए इन कथाओं को बार-बार पढ़ना चाहिए।
मैं लघुकथा डाट कॉम का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे अपनी पसंद पर लिखने का अवसर दिया। इस लेखन से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। आइए संदर्भित लघुकथाओं को भी पढ़ते हैं।
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1-वह तीसरा/ सुकेश साहनी
सीने में उठते तेज़ दर्द से उसकी आँख खुल गई,पेट किसी नगाड़े की तरह तना हुआ था। सुबह के चार बजे थे।
‘कहीं यह दिल का दौरा पड़ने के लक्षण तो नहीं’, उसने सोचा और पसीने-पसीने हो गया। घबराकर वह पत्नी को जगाने ही वाला था कि एकाएक खुलकर ‘विंड’ पास हुई, सीने का दर्द और जकड़न छू-मंतर हो गए। यह सब गैस का उत्पात था, यह सोचकर उसने राहत की साँस ली। अब नींद आने का सवाल ही नहीं था। उसने साइड टेबल पर पड़े मोबाइल को उठा लिया और सोशल मीडिया की ताज़ा पोस्ट को देखने लगा। पहली पोस्ट पर उसकी नज़र ठहर गई-हार्ट अटैक आने से पहले शरीर देता है यह पाँच संकेत। अगली पोस्ट हृदय के दुश्मन एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम करने की दवा को ऑनलाइन मँगाने को लेकर थी। फिर कब्ज और गैस से छुटकारा पाने के घरेलू नुस्खे विषयक पोस्ट थी। यही नहीं डॉक्टर से तत्काल ऑनलाइन परामर्श की सुविधा भी उपलब्ध थी।
यह देखकर वह सोच में पड़ गया। पिछले कुछ दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि वह जो भी सोचता है या सोशल मीडिआ पर देखता है, पलक झपकते ही उससे सम्बंधित पोस्ट्स का बाजार, तमाम लुभावने ऑफर्स लिये उसके सामने खुल जाता है। वह हैरान था कि यह कैसा एप्प या चिप है, जो उसके दिमाग में चल रही हर गतिविधि पर नज़र रख उससे सम्बंधित पोस्ट उसके सामने परोस देता है।
उस दिन वह नितांत निजी क्षणों में अपनी पत्नी के साथ आलिंगनबद्ध था, दो जिस्म सुध-बुध खोकर एक दूसरे में समा जाने को आतुर थे। तभी उसकी नज़र साइड टेबल पर साइलेंट मोड में पड़े फोन पर पड़ी, जो किसी नोटिफिकेशन के कारण एकाएक रोशन हो गया था। तभी एक अहसास बड़ी शिद्दत से उसके दिमाग में जागा-उसे लगा उन दोनों के अलावा कोई तीसरा भी कमरे में है, जो उनकी गतिविधियों पर नज़र बनाए है। ऐसा सोचते ही विचित्र- सी शिथिलता उसके शरीर में छाती चली चली गई। पत्नी ने चौंककर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
हैरान, परेशान पत्नी को उत्तर दिए बिना वह झटके से उससे अलग हुआ और लपककर साइड टेबल पर पड़े फोन को ‘हैंड टॉवल’ से ढक दिया।
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2-मकड़ी/ डॉ.सुषमा गुप्ता
धड़ाक!
उसने अखबार से नज़र उठाई। पहले मरी हुई मकड़ी को देखा फिर मुझे। वो भी घूरकर। मैंने सकपकाकर सफाई दी, ‘‘मुझे हत्या नहीं करनी थी। इसकी हत्या का मेरा कोई इरादा भी नहीं था; पर मैं डरी हुई थी। यह मकड़ी मेरे बिस्तर के बहुत पास थी। मुझे मकड़ी से डर लगता है।’’
‘‘मकड़ी तुमसे ताकतवर थी?’’
‘‘अरे नहीं! कमज़ोर-सी थी। एकदम ज़रा- सी।’’
मेरी इस बात पर उसने व्यंग्य- भरी मुस्कान के साथ मुझे देखते हुए कहा, ‘‘यह कितनी विरोधाभासी बात है। वह तुमसे कमज़ोर थी और तुम्हें उससे डर लग रहा था!’’
मेरी पेशानी पर कुछ बल उभर आए। मैंने ऊहापोह से कहा, ‘‘उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी…शायद…’’
उसने गहरी साँस छोड़ते हुए हाथ का अखबार नीचे पटक दिया और बेहद निराश होकर कहा, ‘‘डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं।’’
मेरी नज़र अख़बार की हैडलाइन पर अटक गई।
‘‘भ्रष्टाचार के विरोध में रैली निकालते,यूनिवर्सिटी के छात्रों पर प्रशासन ने निर्ममता से लाठियाँ भाँजी।’’
-0–प्रदीप मिश्र, दिव्यांश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, इन्दौर -452009 (म.प्र), मो. 9425314126.