कूड़ा बीनती वो बच्चियाँ अक्सर वहाँ आती, दुकानो के बाहर पड़े लिफाफे और गत्ते उठाने, कई बार झगड़ती गत्तो की हिस्सेदारी को लेकर फिर जल्द ही समझौता कर लेती, वह गाँव से आकर उस बड़ी सी दुकान में बहुत सालों से नौकर लगा था, उन बच्चियों को देखकर उसे अपनी बेटी की याद आती ,जो उनकी ही उम्र की थी। एक बच्ची तो कुछ-कुछ उसे अपनी बेटी के जैसी ही लगती, हाँलाकि उनके बोलने का लहज़ा सुनकर उसे हँसी आतीम जब वह पूछती, ” ऐंकल(अंकल) ऐ ऐंकल गत्ते है क्या?”
“ऐ तो रोज्जे( रोज ही) ना देता” दुकानदार के बोलने से पहले ही दूसरी जवाब देती.
उस दिन उसने सहज ही उस लड़की से पूछ लिया,” सुन, तेरा नाम क्या है?”
लड़की ने उस की तरफ देखा, एक दम अविश्वासी -सी नज़रों से और बोली, ” कुछ नी है मेरा नाम” और तेज कदमों से आगे बढ़ गई, एक पल को वह ठिठका, फिर उसे लगा कि उसकी अपनी बेटी भी अब इतनी ही समझदार हो गई होगी कि अजनबी और अपने का अंतर कर सके एक मुस्कान उसके होठों पर फैल गई
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