छब्बीस जनवरी आई तो मालती काम से आते समय शाम को नैना के लिए एक झंडा लेती आई। कपड़े उसने पहले से ही साफ कर दिये थे। सुबह उसे जगाना नहीं पड़ा। बल्कि हुआ यूँ कि नैना ने ही उसे जगाया। बात यह था कि मैडम ने उसे क्लास का मॉनिटर बना दिया था। उसे ही प्रभात फेरी की अगुवाई करनी थी। नारे भी उसे ही बोलना था। दो भाषण उसने तैयार कर लिए थे। इसके अलावा, नृत्य, और वंदना में भी थी। सारांश यह कि पूरे कार्यक्रम के दौरान लोग नैना को टुकुर-टुकुर देखते रहेंगे। पूरे गाँव में प्रभात फेरी निकलती है। ऐसे में सभी चाचा-चाची, दादा-दादी और अन्य उसे देखेंगे और मन ही मन कहेंगे, ‘वाह नैना, वाह!’ यही तमाम बातों के कारण वह बहुत उत्साहित थी।
छब्बीस जनवरी का कार्यक्रम पूरा हुआ। मिष्ठान वितरण में उसे पुरस्कार में कापियाँ और पेंसिल मिले। दो लड्डू भी मिले। वह घर पहुँची तो मम्मी नहीं थी। एक घण्टे बाद आई। उसे बहुत गुस्सा आया। लेकिन मम्मी ने जब उसे गले लगाया तो वह भूल गई। बोली,”मम्मी लड्डू लाई हूँ। एक आप खा लो।” मम्मी ने उसे चिपटा लिया, “नहीं, तुम खा लो। दो ही तो है।”
पर उसने मम्मी के मुँह में ठूस दिया। दोनों हँस पड़ीं। नैना बोली- “मम्मी अब कहीं जाना नही है न?”
मम्मी बोली, “तुम खेलो। मै जाकर जल्दी आ जाऊँगी।”
नैना को रुलाई आ गई। बोली, “देखो मम्मी, आज मैडम ने एक बात बताया है। उन्होंने कहा- हम सब आजाद हैं। सबको समान अधिकार है। कोई किसी का गुलाम नहीं। उसपर आज तो छब्बीस जनवरी है। सबकी छुट्टी है। तुम तो संडे भी काम पर जाती हो।”
मम्मी बोली, “अभी दो दिन पहले जब बुखार हुआ था, तब छुट्टी ली थी न। रोज-रोज छुट्टी कौन देगा?” मम्मी ने नैना को गोद में बिठा लिया।
मालती सोचने लगी – ‘कितनी झूठी है ये मैडम! भाषण कुछ देती है, घर मे कुछ कहती हैं।’ उसे चिंता होने लगी कि मैडम ने उसे दोपहर में ही बुलाया था। बोली थी, “छब्बीस जनवरी को सुबह नही दोपहर में आ जाना।” जाना तो पड़ेगा, नहीं तो नाहक ही चिल्लाएंगी।’
वह धीरे-धीरे नैना को थपकी दिये जा रही थी। नैना हाथ में लड्डू लिये ही सो गई थी।
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