पिछले कई वर्षों से बहुत से लघुकथाकारों की रचनाएँ पढ़ी हैं | लघुकाय आवरण में नपी-तुली महत्त्वपूर्ण शब्दावलi में ऐसी कसी हुई विधा कि जिसे पढ़कर पाठक का मस्तिष्क झनझना उठता है और लम्बे समय तक लघुकथाएँ अपनी छाप बनाए रखती है। हमारे बहुत से श्रेष्ठ लघुकथाकारों ने इस विधा को बहुत समृद्ध बनाया है।
सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘गोश्त की गंध’ और ठंडी रज़ाई’, मैं कैसे पढ़ूँ,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’जी की ‘नवजन्मा तथा ऊँचाई’ ,डॉ सतीशराज पुष्करणा जी की ‘सहानुभूति’, रमेश बतरा की लड़ाई , सुअर ,सुधा गुप्ता जी की ‘कन्फ़ेशन’ है, श्यामसुन्दर अग्रवाल की ‘वापसी’, माँ का कमरा आदि बहुत से लेखकों के सृजन ने लघुकथा को नए आयाम दिए हैं।
आज समय की कमी और आपा-धापी के दौर में उपन्यास और कहानियाँ तो पढ़े ही जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर लघुकथा पाठकों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में लघुकथाओं ने पाठकों को कम समय में अधिक प्रसंगों से जोड़ने का काम किया है। आजकल साहित्य में ये विधा बहुत लोकप्रिय होती जा रही है ।
‘मेरी पसंद’ के अंतर्गत दो कथाओं का चयन करना कोई आसान काम नहीं है फिर भी मैंने दो लघुकथाओं का चुनाव किया है। मेरी पसंद की पहली लघुकथा डॉ . कविता भट्ट की ‘गाइड ’ है तथा दूसरी डॉ . जेन्नी शबनम की ’पहचान’।
गाइड: डॉ . कविता भट्ट ने अपनी लघुकथा ‘गाइड’ में पुरुष के दोहरे व्यक्तित्व का परिचय देते हुए उसका मुखौटा उतार कर उसके असली चेहरे का पर्दाफ़ाश किया है। लघुकथा का पात्र प्रोफेसर- जो बात तो नारी स्वतंत्रता और सम्मान की कर रहा है; लेकिन सामने बैठी शालिनी की देह को किस तरह भेड़िए वाली निगाहों से भेद रहा है। उसकी निगाहों को पढ़ते ही शालिनी अपमान से जलती आँखों से उसे घूरती हुई साथ बैठी सहेली निशा को भी तुरंत साथ चलने को कहकर उठ खड़ी होती है। जो कुछ अचानक हुआ, वह निशा की समझ से परे था। तिलमिलाती हुई शालिनी ने रास्ते में निशा को प्रो0 की सांकेतिक भाषा से अवगत करवाया कि क्यों वह उसकी रिसर्च चुटकियों में पूरा करवाने का भरोसा दिला रहा था।
सच ही है, संस्कारहीन पुरुष भले कितना ही सुशिक्षित क्यों न हो जाए, उसके भीतर में छिपा वासना का हिंस्र पशु सदैव लोलुप और अमर्यादित ही रहता है। पुरुष शालीनता का छद्म आवरण भले ही ओढ़ ले ; लेकिन उसके भीतर का पशु कभी न छुप सकता है ,न सो सकता है। केवल यौन शोषण ही शोषण नहीं होता, वासनाजनित वैचारिक दृष्टिकोण से किया गया शोषण भी शोषण ही है।
शोचनीय बात तो यह है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो स्वयं को गाइड नहीं कर सकता, वह किसी के रिसर्च के कार्य का गाइड कैसे बन सकता है। वह केवल मिस गाइड कर सकता है। डॉ . कविता भट्ट ने ऐसे शोध निर्देश के कुकृत्य एवं रुग्ण चिन्तन को अनावृत्त किया है।
लघुकथा में प्रोफ़ेसर के कुत्सित व्यवहार से टकराने के लिए शालिनी का दमदार व्यक्तित्व के रूप में सामने आने और मर्माहत निशा से यह कहना – ” इन जैसों को सबक़ हम ही सिखाएँगे” सम्पूर्ण स्त्री जाति की बात को सही तेवर में कहा है तथा पुरुष के दंभ पर करारी चोट की है।
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1-गाइड ; डॉ.कविता भट्ट
भोजनावाकाश में भी ‘नारी स्वतन्त्रता और सम्मान’ विषय पर कुछ चर्चा चल रही थी । प्रो. शेखर कुमार कुछ बोले जा रहे थे । डायनिंग टेबल पर उनके ठीक सामने बैठी सुन्दर गौरवर्णा शालिनी ने साड़ी का पल्लू कसते हुए, उसकी ओर आग्नेय दृष्टि से घूरकर देखा। शेखर कुमार हड़बड़ा गया ।
शालिनी गुस्से में तिलमिलाती एकदम खड़ी हो गई और पास ही में बैठी अपनी सहेली निशा से बोली, “चल यार !”
“क्या हुआ”-निशा ने आश्चर्य से पूछा
“ उठो भी”-शालिनी ने उसको उठाते हुए कहा और आगे बढ़ गई । निशा हडबडाकर उठी और उसके पीछे चल पड़ी।
“शालिनी ,तुम्हें क्या हुआ अचानक !’’ निशा ने फुसफुसाकर पूछा।
“मैं तो इस प्रोफेसर से कुछ पूछना चाहती थी, लेकिन यह तो बहुत कमीना निकला।”
निशा बोली, “अरे यार अचानक तुझे क्या हुआ?बता तो सही ,कुछ किया क्या उसने?”
शालिनी बोली, “देख यार, मेरा रिसर्च में दूसरा साल है, मैंने सोचा- यह प्रोफेसर मंच से महिला स्वतंत्रता एवं सशक्तीकरण पर बड़ा अच्छा लेक्चर दे रहा था , तो इससे रिसर्च के कुछ कॉन्सेप्ट क्लियर करूँ।”
निशा बोली, “तो इसमें क्या बुराई है, बात कर लेती तू।”
शालिनी बोली, ” अरे क्या बताऊँ, तूने नहीं देखा क्या ? पहले तो वह अच्छे से बात करता रहा, लेकिन थोड़ी देर बाद ही वह मुझे कहाँ- कहाँ और किस तरह देख रहा था, यह मुझसे ज़्यादा कौन जान सकता है। फिर मेरी ओर अर्थपूर्ण ढंग से देखते हुए उसने यही तो कहा था-आप तो बहुत ही स्मार्ट हो, आपकी रिसर्च तो चुटकियों में पूरी हो जाएगी, बेहया कहीं का !!
निशा बोली, “चल यार, मैंने भी कई बार ऐसे प्रोफेसरों को झेला है , जो बहुत बड़ी -बड़ी बात करते हैं मंच से, शास्त्रों के उदाहरण देते हैं ।ये और कुछ नहीं वास्तव में भेड़िए हैं। न चाहते हुए भी सिस्टम में ऐसे ही लोगों की गाइडेंस में रिसर्च करनी पड़ती है।’’
”दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है, इन जैसों को सबक़ हम ही सिखाएँगे।” अपने कमरे में जाने से पहले शालिनी ने पीछे मुड़कर देखा, शेखर कुमार के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं ।
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पहचान:जेन्नी शबनम की लघुकथा ‘पहचान’ पुरुष की मानसिकता का बोध कराती है। पत्नी को कंप्यूटर पर उँगलियाँ चलाते देखकर उसे ऐसा महसूस करवाना, जैसे वह कोई अपराध कर रही हो। पत्नी के बताने पर कि उसे किसी पत्रिका के लिए लेख भेजना है, यह सुनकर उसका हौसला बढ़ाने के बजाय बिना अपने तलघर में झाँके ही उसे यह कहकर नीचा दिखा रहा है कि तुमसे नहीं हो पाएगा, लाओ मैं लिख देता हूँ। ऐसा कहकर वह पत्नी की अस्मिता के दायरे को घटा रहा है। यह पुरुष की मानसिकता ही तो है, जो पत्नी के लेखन को उपेक्षित कर रही है।
पत्नी का लेख पत्रिका में छपने के बाद वह पति को गर्व से बताने के लिए टेबल पर रख देती है। क्यों वह इतनी असहज है। क्या उसे अपनी पहचान बनाने का अधिकार नहीं है? क्या वह केवल पत्नी है मनुष्य नहीं? वह पत्रिका टेबल पर इसलिए रखती है कि उसका अपना भी कोई वजूद है।
मेरा मानना है कि स्त्री को अपनी निजता अपने सपने और आकांक्षाओं को व्यापक रूप देने का पूरा अधिकार है। पुरुषों की वजह से अपनी सत्ता अपने लेखन को दम नहीं तोड़ने देना चाहिए। यही काम इस लघुकथा की नायिका ने किया है।
पहचान ;डॉ.जेन्नी शबनम
मेरा लेख एक बड़ी पत्रिका में ससम्मान प्रकाशित हुआ। मैंने मुग्ध भाव से पत्रिका के उस लेख के पन्ने पर हाथ फेरा , जैसे कोई माँ अपने नन्हे शिशु को दुलारती है. दो महीने पहले का चित्र मेरी आँखों के सामने घूम गया ।
जैसे ही मैंने अपना कम्प्यूटर खोल पासवर्ड टाइप किया उसने अपना कम्प्यूटर बंद किया और ग़ैर ज़रूरी बातें करनी शुरू कर दीं। मैंने कम्प्यूटर बंद कर दिया और उसकी बातें सुनने लगी कि उसने अपना कम्प्यूटर खोलकर कुछ लिखना शुरू कर दिया और बोलना बंद कर दिया।
आधा घंटा बीत गया। मुझे लगा बातें ख़त्म हुईं। मैंने फिर कम्प्यूटर खोला और दूसरी पंक्ति लिखना शुरू ही किया कि उसने अपना कम्प्यूटर बंद कर दिया और मुझे इस तरह घूरने लगा ,मानो मैं कम्प्यूटर पर अपने ब्वायफ्रेंड से चैट कर रही होऊँ।
मैंने धीरे से कहा-“मुझे एक पत्रिका के लिए एक लेख भेजना है ।”
उसने व्यंग्य-भारी दृष्टि से मेरी तरफ़ ऐसे देखा मानो मुझ जैसे मंदबुद्धि को लिखना आएगा भला।
उसने पूछा-“टॉपिक क्या है?”
मैंने बता दिया तो उसने कहा- ”ठीक है, मैं लिख देता हूँ, तुम अपने नाम से भेज दो। यूँ ही कुछ भी लिखा नहीं जाता समझ हो तो ही लिखनी चाहिए।”
मैंने कहा– “जब आप ही लिखेंगे, तो अपने नाम से भेज दीजिए ।” फिर मैंने कम्प्यूटर बंद कर दिया।
रात्रि में मैंने लेख पूरा करके पत्रिका में भेज दिया था ।
पत्रिका अभी भी मेरी टेबल पर रखी है. क्या करूँ ! दिखाऊँ उसे !! मन ही मन कहा -कोई फ़ायदा नहीं !
जब वह इसे देखेगा तो? … सोचते ही मेरा आत्मविश्वास और भी बढ़ गया।
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