गुलाबी ठंडक ने ठिठुर रही जगती को राहत का अहसास कराना शुरू ही किया था कि वसंत पंचमी के त्योहार ने दस्तक दी।
नन्हे चिंटू के घर भी उल्लास का माहौल था।
चिंटू के मम्मी-पापा, दादा-दादी सभी स्नान आदि कर, घर के मंदिर में पूजा की तैयारियाँ कर रहे थे। चिंटू भी अपनी नन्ही कुर्सी पर बैठा यह सब देख रहा था; पर उसके जिज्ञासु मन व सजग प्रकृति ने उसे अधिक देर तक वहाँ टिकने न दिया।
उसने अपने पापा से पूछा, “पापा! आज क्या है?” बालमन को समझ नहीं आया क्योंकि रोज़ तो वो सबको अलग-अलग पूजा करते देखता था।
“बेटा! आज वसंत पंचमी है। आज के दिन ज्ञान की देवी सरस्वती माता की पूजा करते हैं।” कहते हुए उन्होंने उसके हाथ में भी मौली बांध दी।
तभी मम्मी पुस्तक, पेन, कॉपी भी ले आईं।
“पापा! आप बुक, पेन, कॉपी की भी पूजा क्यों कर रहे हो। ये भगवान जी थोड़ी न हैं?” उसने अचरज से पूछा।
“बेटा! सरस्वती देवी ज्ञान की देवी हैं और ज्ञान हमें किताबों से मलता है न, इसलिए।”
चिंटू ने अपनी ठोडी पर उँगली टिकाए पल-भर को कुछ सोचा। भागकर अगले ही पल अपना आईपेड उठा लाया, “पापा! इसकी पूजा कर दीजिए।”