गढ़वाली-अनुवाद: डॉ कविता भट्ट
वे नयां बण्यां मोर परैं दिनोंदिन भीड़ बढणी लगीं छै। चौबीसों घंटा भगतू का रौण सि मंदिरौ कु भितर जाणौं कु मोर कभी बंद नि ह्वे सकणू छौ। पूजा–पाठा बाद वापस आंदी बगत इतगा संतुष्टि,आज सि पैलि दुनिया का कै भी धरमस्थान सि निकल्दि बगत पैलि कबि नि दिखे। खास बात त या छै कि ये मंदिर म सब्बि धर्मों अर समुदायूूं का लोग आणा–जाणा छा।
कई से पुछदा कि ये मंदिर म कैकी मूर्ति धरीं चा, त लोग एक ही उत्तर दींदा, ‘सर्वशक्तिमान की,’ अर श्रद्धा–भक्ति सि आँखा बूजी लीन्दा।
सरकार एक दिन अफी फुंकार भोरि मंदिर म घुसि गे । आखिर ऊं से जादा ताकतवर यु कु सर्वशक्तिमान अवतरित ह्वे कि एक धर्म राज काज पर फौड़ा चलाणु चा? वु पौंछिन। दर्शन होंदू ई उंकी धौण झुकि गे। वु मिलोटा म मूंण टेकिक बरड़दु, ‘‘हे सर्वशक्तिमान, मि गरीब आदिम छौं मी पर कृपा करा।’’ दरअसल वुख सोना का सिंहासन पर चाँदी कु एक गोळ सिक्का रख्यूं छौ।
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