सुबह सोकर उठा, सिगरेट सुलगाई और चाय पीने के लिए डायनिंग टेबल पर आ गया।चाय पीने के लिए कप की तरफ हाथ बढाया ही था कि एक चौंकाने वाला दृश्य सामने था।चाय के कप की साइड में मेरा दिल और दिमाग दोनों झगड़ रहे थे।
“क्यों झगड़ रहे हो सुबह-सुबह ? और कोई काम नहीं है तुम्हारे पास ? क्यों मेरा सण्डे खराब करने पर तुले हो ?” मैं नाराज होने लगा।
“हमारा झगड़ा इस बात पर है कि कोई भी अहम फैसला ये लेगा या मैं?” दिल ने नाराजगी भरे स्वर में कहा।
दिमाग को बुरा लगा,उसने अपना तर्क दिया-“देखिए, जबसे आपने बड़े पैमाने पर व्यापार शुरू किया, तबसे जो भी फैसला दिल ने लिया, वहीं आपको मुँह की खानी पड़ी।लेकिन जो फैसला मैंने लिया, वहीं सफलता हासिल हुई और नुकसान से बचे….”
“लेकिन तुम्हारे हर फैसले में मानवता की हार हुई, संवेदनाओं को रौंद दिया गया…….”
तुरन्त दिल ने आपत्ति की और कहा-“आज आपको फैसला करना ही पड़ेगा कि कोई भी अहम निर्णय दिमाग लेगा या मैं लूँगा?”
“बुरे फँसे सुबह-सुबह……”मैं असमंजस में था।मैंने अलसाते हुए सिगरेट होठों में दबाई और मेज के कोने पर पड़ी माचिस उठाने लगा कि एकाएक दोनों ने मेरी अँगुलियाँ पकड़ लीं और चौंकाने वाला निर्णायक स्वर सुनाई दिया-“आज से आप सिगरेट नहीं पीयेंगे….यह आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है……”
“क्यों भई,क्यों नहीं पीऊँ ? अच्छा….. किसका फैसला है ये,दिल का या दिमाग का ?”
“ये हम दोनों का संयुक्त फैसला है……”
“यानी ‘करैक्ट’ फैसला……”मैं चहक उठा। तभी पत्नी का स्वर सुनाई दिया-“आज सण्डे है तो क्या सारा दिन सोते ही रहोगे ? चलो उठो अब,चाय बन गई है।”
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