(लघुकथा के नियम और स्वरूप तय करने वाले विद्वानों को सादर समर्पित)

सड़क किनारे की उस दुकान में देवी-देवताओं की, ग्रामीण एवं शहरी स्त्रियों की बहुत सी मूर्तियाँ थीं। सब की सब साँचे में ढली सुंदर मूर्तियाँ। एक ग्राहक काफ़ी देर से उन मूर्तियों को देख रहा था। दुकान की मालकिन ने पूछा, “आपको कुछ पसंद आया सर?”
“वो मूर्ति दिखा सकती हैं आप?” ग्राहक ने सबसे पीछे लगभग छुपाकर रखी एक अनगढ़ सी मूर्ति की ओर इशारा किया।
“वो! वो मूर्ति आपके काम की नहीं है सर। वो साँचे में से नहीं निकली है। वो तो बस यूँ ही…”
“यूँ ही क्या मैम?”
“एक दिन मूर्तियाँ बनाते हुए मन में आया कि कोई मूर्ति साँचे से अलग बनाऊँ। अच्छी हो या बुरी पर सबसे अलग हो। सो बना दी वो बेडौल सी दिखने वाली मूर्ति। “
“क्या आप मुझे वह दिखा सकती हैं प्लीज़?”
दुकान की मालकिन उसे उठाकर काउंटर पर ले आई। वह ग्राहक बहुत ध्यान से उसे देख रहा था। उस मूर्ति की युवती का रंग बाक़ी मूर्तियों की तरह उजला नहीं था, शेष अंग भी आदर्श अनुपात में नहीं थे। आँखों की जगह काँच नहीं लगा था, बल्कि कौड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।
“पसंद नहीं आई न सर! मैंने कहा था…”
“मुझे यही मूर्ति पसंद है, इसकी क़ीमत बताइए। “
“अच्छा! कुछ दिन पहले तक यह मूर्ति यहीं रखी रही थी, सब मूर्तियों के बीच, किसी ने इसकी तरफ़ देखा भी नहीं। आख़िर मैंने इसे उठाकर सबसे पीछे रख दिया। मुझे यह प्रिय थी क्योंकि इसे मैंने बनाया था, साँचे ने नहीं। “
“इसीलिए, कला जब बने बनाए साँचे को तोड़ती है, तभी प्राणवान होती है। यही सृजन है। कला को सृजन होने के लिए साँचे तोड़ने ही होते हैं, वरना कला ख़ुद साँचा बनकर रह जाती है। “
दुकान की मालकिन ने उस मूर्ति को अच्छी तरह पैक किया और कला के उस अद्भुत क़द्रदान को पकड़ाते हुए मुस्कुरा दी, “मुझे ख़ुशी है कि मेरी कला आपके पास हमेशा ज़िंदा रहेगी। और हाँ, मुझे साँचे तोड़ सकने की हिम्मत देने के लिए धन्यवाद। “
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