जून 2026

मेरी पसन्दसामाजिक सन्दर्भों से जुडी रचनाएँ     Posted: October 1, 2019

       लगभग चार दशक से भी ज्यादा समय से मैं लघुकथा विधा से जुड़ा हूँ । पत्र पत्रिकाओं में 1966 से कहानियां व  1971 से लघुकथाएँ  प्रकाशित होती रही । कृष्ण कमलेश ने मेरी एक लघुकथा ‘संतोष ‘को ‘मिनी अन्तरयात्रा 3’ में मई 1972 में प्रकाशित किया । रमेश भागीरथ द्वारा 1974 में प्रकाशित प्रथम लघुकथा संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर  में भी मेरी दो लघुकथाएँ  ‘परिवर्तन ‘ व ‘ संतोष ‘ को सम्मिलित  किया गया । अनेक पत्रिकाओं गल्प भारती ,कात्यायनी ,एकांत ,सारिका ,शीराजा ,कृति परिचय ,कथालोक आदि में मेरी कहानियां व लघुकथाएँ  समय समय पर प्रकाशित हुईं । इस बीच समय के साथ लघुकथा के बदलते तेवरों को अनुभूत किया । लघुकथाकार,सुकेश साहनी , बलराम अग्रवाल ,कमल चोपड़ा ,रामेश्वर कम्बोज , अशोक जैन , अशोक भाटिया ,कमलेश भारतीय ,राम कुमार आत्रेय ,सतीश राज पुष्करणा , योगराज प्रभाकर आदि की रचनाएँ विभिन्न पत्रिकाओं में पढ़ी ,जो मन में कहीं गहरे तक उतर गईं व चिन्तन के नए आयाम छोड़ गई । यही नहीं मुकेश शर्मा ,राम कुमार घोटड़ ,कृष्ण मनु ,जगदीश रॉय कुलरिया ,रतन चंद रत्नेश व सुरेन्द्र अरोड़ा की लघुकथाएँ  भी मन को उद्वेलित करती रहीं ।

        यूँ तो न जाने कितनी लघुकथाएँ  हैं, जो स्मृति पटल पर रची बसी हैं । उन में से दो का चयन करना बहुत ही दुष्कर कार्य है । कुछ घटनाएँ  सहज ही हमारे जीवन में घटती रहती है ,उनको केन्द्रित कर लिखी लघुकथाएँ  हमारे मन पर अधिक देर तक स्मृति बनाए रखती हैं । उनमें स्वाभाविकता होती है ,सहजता होती है व  लगता है कि हम भी इस लघुकथा के किसी स्तर पर पात्र हैं । चयनित लघुकथाओं में एक है कमलेश भारतीय की ‘कुछ खास नहीं ‘ व  दूसरी है सुकेश साहनी की ‘बेटी का ख़त ‘।

        ‘कुछ खास नहीं ‘ में कमलेश भारतीय ने पति पत्नी के संबंधों को नई ऊँचाई प्रदान करते हुए एक साधारण सी घटना को खास बना दिया है । पति पत्नी के बीच देह सामीप्य से उपजा मोह कालान्तर में प्रेम का रूप धारण करता है । तब एक दूसरे के सुख के लिए समर्पण की भावना उत्पन्न होती है । व्यक्ति दूसरे के सुख के लिए अपने दुःख को भूलकर सभी अर्जित सुविधाओं को अपने साथी को समर्पित कर देता है । इसी में उसे सुख ,संतोष व  आनंद की अनुभूति होती है । शायद यही निस्वार्थ प्रेम है । इस लघुकथा में पति व  पत्नी दोनों ही दर्द से पीड़ित हैं ,पति दाँत दर्द से तो पत्नी पीठ दर्द से । दोनों ही प्रौढ़ अवस्था में हैं ; इसी कारण एक  दूसरे को अकेला छोड़ना नहीं चाहते कि न जाने कब किसको दूसरे की सहायता की आवश्यकता पड़ जाए ;अत; बेटी के आने पर ही पत्नी बाज़ार से पति के दाँत-दर्द की दवाई खरीदने जाती है । दाँत- दर्द से पीड़ित पति ,पत्नी को अपने पीठ दर्द की दवाई लाने का भी स्मरण करता है । परिवार आर्थिक अभाव से भी पीड़ित है ;इसी कारण पत्नी दवाई खरीदते समय पति के दर्द की दवाई को प्राथमिकता देती है । अपने लिए दवाई नहीं खरीदती । पति को पत्नी के दर्द का एहसास है ,इसलिए घर लौटने पर पत्नी से कहता है कि वह अपनी दवाई भी पानी के साथ खा ले ; पर पत्नी उसे बताती है कि उसके कोई खास दर्द नहीं है इस कारण वह अपनी दवाई  नहीं लाई। यहाँ प्रेम त्याग के रूप में परिलक्षित होता है। प्राय: देखा यही गया है कि पुरुष की अपेक्षा नारी में त्याग की भावना अधिक रहती है । इस लघु कथा में आर्थिक अभावों से ग्रस्त परिवार में पत्नी की दोनों की दवा न खरीद पाने की असमर्थता ,पति कहीं अपराध- बोध से ग्रस्त न हो जाए, इस कारण पत्नी का अपने दर्द को ही नकार जाना जैसे भावों को कम शब्दों में कथाकार ने कुशलता से अभिव्यक्त किया है । यही लघुकथा का सौन्दर्य है ,जो इसको सार्थक व  हृदयस्पर्शी बनता है ।

        लघुकथा ‘बेटी का ख़त ‘ सुकेश साहनी की आज के समकालीन समाज के संदर्भ में एक बेहतरीन मर्मस्पर्शी लघुकथा है ,जो आज की विवाह व्यवस्था व  दहेज़ प्रथा के कारण लडकियों के ससुराल में उत्पीडन का मार्मिक चित्रण करती हुई मन में गहरे उतरती है व  समाज में नारी की स्थिति पर चिन्तन को बाध्य कर देती है । ज्यादातर घरों में ऐसे ही मिट्टी के चूल्हें हैं । पुरुष प्रधान समाज में अधिकतर नारी ही नारी की प्रताड़ना का निमित्त बनती है । बेटी को दुखी देखकर माँ बाप की रातों की नींद उड़ जाती है। सांकेतिक भाषा में लिखा बेटी का ख़त जब बाप को मिलता है ,तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगती हैं। ख़त पदने के बाद बाप के चेहरे की बदली रंगत देख माँ घबरा कर बेटी की खैरियत पूछती है। स्पष्ट उत्तर न मिलने पर वह स्वयं ख़त पढती है ;पर परेशानी की बात संकेत में लिखी होने के कारण वह कुछ समझ नहीं पाती और अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त हो जाती है । कुछ समय बाद ही  पति का बेटी के पास जाने की बात कहना ,,उसे फिर से दुविधा में डाल देता है । माँ आखिर माँ होती है ! आशंका के बादल उसके मन में घुमड़ते है । सच्चाई जानने के लिए वह भी आम औरतों की तरह ‘मेरी कसम’ के अस्त्र का प्रयोग करती है । तब पति उसे बताता है कि गत बार जब वह बेटी के घर गया था ,तो वह बता रही थी कि उसके ससुराल वाले उसका कोई भी ख़त बिना पढे पोस्ट नहीं होने देते ।इस कारण वह बेटी को बता कर आया था कि यदि उसे ससुराल में ज्यादा ही परेशानी लगे और वह हमें बुलाना चाहे ,तो ख़त के आखिर में बस इतना लिख दे ‘राजू भैया की बहुत याद आती है’। ससुराल में लड़की का यह दर्द आज आम बात हो गई है । इस लालची समाज में हर कोई बिना परिश्रम किए ही रातों रात अमीर बन जाना चाहता है । यही बात लड़कियों के ससुरालों में प्रताड़ना का मूल कारण है । एक साधारण परिवार की लड़की की ससुराल की व्यथा , उस चारदीवारी में उसकी बेबसी व  घुटन , उससे उबरने के लिए उसकी छटपटाहट व सामाजिक व्यवस्था के आगे नतमस्तक माँ बाप का बेटी का दुःख जानकर उनकी वेदना व बेटी को  उससे बाहर निकालने के प्रयास का कथाकार ने कुशलता से जीवंत चित्रण कर पाठक के मन को सहज ही छुआ है । चित्रण इतना सजीव बन पड़ा है कि लगता है अपनी ही बेटी का ख़त आया है , जिसने मन को अंदर तक भिगो दिया है ।यही रचना की सार्थकता है ।

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1-कुछ खास नहीं /कमलेश भारतीय

   मैं  दाँत के दर्द के कारण निढाल लेटा था ।दिन भर पत्नी की पीठ में भी दर्द था । कह रही थी –बुदापे के लक्षण दिखने लगे हैं ।

             शाम को बेटी आई । पत्नी ने पैसे उठाए और दवा लेने चली । मैंने याद दिलाया अपनी दवा भी लेते आना ।

  दवा लेकर लौटी । गर्मी में  हाँफती हुई पानी का गिलास लाई और दवा खिला दी । मैंने पूंछा,’’अपनी दवा ले आई ?’’

बोली ,  “नहीं ।’’

“क्यों ?’’मैंने प्रश्न पूछा ।

“कुछ खास दर्द नहीं ।’’

मैं नए ज़माने में भी अपनी पुरानी दुल्हन को प्यार से ताकता रह गया ।**

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2-बेटी का ख़त / सुकेश साहनी

  बेटी का ख़त पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं ।

“खैरियत तो है न ?’’ पत्नी ने पूंछा ,’’ क्या लिखा है ?’’

“सब कुशल मंगल है !’’ आवाज में कम्पन था ।

“फिर पढ़ते ही घबरा क्यों गए ?’’-पत्नी बोली । फिर उसके हाथ से चिट्ठी लेकर खुद पढने लगी ।

  ख़त खैरियत वाला ही था । बेटी ने माँ- बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राज़ी ख़ुशी लिखी थी ,अंत में लिखा था –राजू भैया की बहुत याद आती है । पत्र पढ़ने के बाद पत्नी निश्चिंत होकर रसोई में चली गई ।

   जब लौटी तो देखा पति अभी भी उस ख़त को घूरे जा रहा है ,चेहरा ऐसा मानो  किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो ।

    पत्नी को देखते ही उसने सकपकाकर ख़त एक ओर रख दिया । सहज होने का असफल प्रयास करते हुए बोला –  “सोचता हूँ कल रजनी बेटी के पास हो ही आऊँ ।’’

पत्नी ने उसके पीले उदास चेहरे की ओर ध्यान से देखा ,फिर रूँधे गले से बोली ,’’ आखिर हुआ क्या है ?अभी कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थे ,फिर अचानक ऐसा क्या जो ….तुम्हें मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ !’’

    इस बार वह पत्नी से आँख नहीं चुरा सका ,भर्राई आवाज में बोला ,’’ पिछली बार रजनी ने मुझे बताया था कि ससुरालवाले उसकी लिखी कोई चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देते ,तब मैंने उससे कहा था कि भविष्य में अगर वे लोग उसे तंग करें और वह हमें बुलाना चाहे तो ख़त में लिख दे –राजू भैया की बहुत याद आ रही है । इस बार उसने ख़त में यही तो लिखा है । कहते हुए बूढ़े बाप की आँखें छलछला आई ।  -0-

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