जून 2026

पाठकीयसूर्यकांत नागर की दो लघुकथाएँ     Posted: July 1, 2025

लघुकथा हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट विधा है। अपने लघु रूप में अपने विराट अस्तित्व के लिए प्रसिद्ध लघुकथा थोड़े शब्दों में व्यापक अर्थ, और गहन विचारों का प्रस्तुतीकरण करती है अर्थात्  गिनी- चुनी पंक्तियों में एक पूरी की पूरी कहानी प्रस्तुत करती है, परंतु यह कार्य सरल नहीं! क्योंकि कहानी एक राजमार्ग है और लघुकथा एक पतली पगडंडी है, जिस पर सावधानी से सधे हुए कदमों से अपने मंतव्य को लेकर चलते हुए लघुकथाकार को अपने लेखकीय गंतव्य तक पहुँचना पड़ता है। लेखक को कम से कम शब्दों में कथ्य को अधिक से अधिक प्रभावी बनाने हेतु प्रवीण होना होता है। लघुकथा- लेखन में कथ्य की संरचना, पात्र, परिस्थिति, भाषा और संवाद का सटीक चयन वे अनिवार्य तत्त्व हैं, जो लेखकीय उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हैं।

  हिन्दी के प्रख्यात लेखक डॉ. सूर्यकांत नागर की लघुकथाएँ मंतव्य से गंतव्य तक पहुँचकर हिंदी साहित्य में अपना एक अलग स्थान बना चुकी हैं। उनकी लघुकथाएँ मानवीय संवेदना, पारिवारिक, सामाजिक सम्बन्धों के ताने- बाने, सामाजिक विषमता इत्यादि विविध पहलुओं को छूती हैं। उनकी लघुकथाएँ अपने भाषा सौष्ठव, शिल्प कौशल एवं प्रभावी संवाद द्वारा अपने अंतर्निहित सन्देश को पाठक तक पहुँचाकर उसमें एक नवीन बोध का संचार करती हैं।

उनकी लघुकथाओं के पात्र यथार्थ के प्रतिनिधि हैं, जो आम जीवन की समस्याओं का सामना करते हैं और जीवन के वास्तविक संघर्षों और संवेदनाओं का

प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी लघुकथाओं में संवेदनशीलता और यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, जो उन्हें लघुकथा के क्षेत्र में एक विशिष्ट दर्जा देता है। अपने बारे में वे कहते हैं- जहाँ तक मेरी लघुकथाओं का ताल्लुक है, मेरा भरोसा मानवीय मूल्य, सकारात्मक सोच और मनुष्य के मनोविज्ञान में है। कला, कल्पना, भाषा, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति कौशल से ही एक सार्थक लघुकथा की सृष्टि होती है।”

डॉ. नागर का यही रचनात्मक दृष्टिकोण उन्हें अन्य लघुकथाकारों से अलग बनाता है। डॉ. नागर का साहित्यिक योगदान आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।

विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में शामिल डॉ. नागर की लघुकथाएँ जीवन- जगत के जटिल पहलुओं का सरलीकरण कर उनका गहन विश्लेषण करती हैं। उनकी लघुकथाएँ छात्रों के लिए अनिवार्य अध्ययन सामग्री हैं, क्योंकि वे सभ्य समाज के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए छात्रों को नैतिक शिक्षा प्रदान कर उनमें विचारशीलता का संचार और संवेदनशीलता का संचयन करती हैं और उन्हें मानवीय मूल्यों का बोध कराकर मानवता के प्रति जागरुक करती हैं।

प्रस्तुत लेख में डॉ. सूर्यकान्त नागर की दो प्रमुख लघुकथाओं का अनुशीलन है-

आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में भागता- दौड़ता व्यक्ति अपने मानवीय मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। सफल होने के लिए आज वह अनैतिक रास्ते पर चलने में भी नहीं हिचकता।

डॉ. सूर्यकांत नागर की लघुकथा ‘लघुता’

भारतीय शिक्षा प्रणाली में परीक्षा का दबाव झेलते छात्र और छात्रों से सफलता की अपेक्षा रखते अभिभावकों के विषय पर गहन विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत करती है। शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में यह लघुकथा इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि यह छात्र को सही और गलत के बीच चुनाव करना सिखाती है।

पात्र विमल शिक्षक के हाथ से गलती से गिरा अगले दिन होने वाली परीक्षा का प्रश्नपत्र उठाता है, और फिर उसे शिक्षक को सौंपकर अपनी ईमानदारी का परिचय देता है। घर आकर वह अपने पिता को इसके बारे में बताता है। इस बात का पता चलने पर उसके पिता के चेहरे का बदलता रंग और विमल को ‘मूर्ख’ कहना यह दर्शाता है कि आज समाज में अवसरों की खोज में ईमानदारी को मूर्खता के रूप में देखा जाता है। एक मासूम बच्चा, जो अपनी ईमानदारी के कारण अवसर को खोकर भी अपनी खुशी जाहिर करता है; वहीं उसके पिता की प्रतिक्रिया प्रमाण देती है कि समाज में कैसे अवसरों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है! पिता का अफसोस सिद्ध करता है कि वे अपने बेटे को किसी भी तरह से मिली सफलता के पैमाने पर आंकते हैं, न कि उसके नैतिक मूल्यों के आधार पर। लघुकथा ईमानदारी की महत्ता को रेखांकित करने के साथ- साथ यह भी दिखाती है कि कैसे समाज में सफलता के लिए अनुचित तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

‘लघुता’ हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि किस प्रकार अवसरवादी सोच व्यक्ति को अपने नैतिक मूल्यों से दूर कर सकती है! इस अवसरवादी सोच के चलते क्या हम अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा कर पाएँगे, या हम भी अवसरवादिता की चकाचौंध में अपनी ईमानदारी को त्याग देंगे? बहती गंगा में हाथ धोने के लिए अपनी ईमानदारी का विसर्जन कर देंगे? आज पेपर लीक जैसे अपराध इसी अवसरवादिता का उदाहरण हैं। परीक्षा प्रणाली हमारी शिक्षा व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो छात्रों के ज्ञान और कौशल का उचित मूल्यांकन करती है। लाभ की चाह और प्रतिस्पर्धा के दबाव के चलते कुछ लोग गलत रास्ता अपनाते हैं और मेहनती छात्रों की प्रतिभा का हनन करते हैं। यह लघुकथा छात्रों में नैतिकता और ईमानदारी के महत्त्व को समझाते हुए इस बात पर बल देती है कि हमें नैतिकता और ईमानदारी को प्राथमिकता देनी होगी, तभी हम एक स्वस्थ शिक्षा प्रणाली की स्थापना कर सकते हैं।

डॉ. सूर्यकांत नागर ने विमल के माध्यम से यह संदेश दिया है कि हमें केवल ईमानदारी से ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिए, भले ही सफलता के लिए अन्यान्य रास्ते दिखाई देते हों। नैतिक मूल्यों पर मंथन करने हेतु प्रेरित करती ‘लघुता’ एक सशक्त लघुकथा है।

लघुकथा ‘ममता’ में डॉ. सूर्यकान्त नागर ने मातृत्व और उसके अतिरेक को शब्दों में बाँधा है। इस कथा में एक संघर्षरत युवा लड़के और उसकी वृद्ध माँ के बीच का भावनात्मक सेतु है, जो विपरीत समय और दूरी के बावजूद मजबूती से दोनों को जोड़े हुए है। अपनी पढ़ाई और जीवन को जैसे- तैसे सँभालने की जद्दोजहद में लगा लड़का जब आर्थिक तंगी के कारण अपने गाँव नहीं जा पाता, तो माँ बेटे को देखने के लिए बेचैन होती है। माँ का तीर्थ- यात्रा से लौटने के दौरान बेटे से मिलने आना और बेटे के कमरे पर पहुँचने पर उसकी चिंता और सवालों में सीमाओं से परे माँ के प्रेम का प्रकटीकरण है।

कमरे में प्रवेश करते समय माँ की भावनाएँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, जहाँ माँ भौतिक वस्तुओं के बीच केवल अपने बेटे के अस्तित्व को महसूस करती है। यहाँ बिस्तर और तकिया बेटे के आराम के नहीं, बल्कि बेटे के परिश्रम और संघर्ष के प्रतीक हैं। माँ के बिस्तर को सहलाने और चीकट तकिए को चूमने में लघुकथा का मर्म निहित है। अपने अथाह प्रेम को प्रदर्शित करती माँ बेटे के तकिए को चूमकर असल में उसके संघर्षों को चूम रही है। यह भावनात्मक क्षण पाठक को गहरे प्रभावित करता है।

यह लघुकथा समाज में आर्थिक तंगी के प्रभावों को भी दर्शाती है। लघुकथा सामाजिक संदर्भ में माँ की भूमिका को रेखांकित करते हुए यह दिखाती है कि कैसे एक माँ हर परिस्थिति में अपनी संतान को हमेशा पहली प्राथमिकता देती है और मातृत्व की अद्वितीयता के दर्शन कराते हुए हमें यह याद दिलाती है कि एक माँ का प्रेम हमेशा अपने बच्चे के साथ होता है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

मातृत्व वह शक्ति है, जो भावनात्मक सम्बन्धों को सशक्त बनाती है। मातृत्व की इस शक्ति को अगर आज की संतान समझ लेगी, तो दुनिया के किसी कोने में एक भी वृद्धाश्रम नहीं होगा।

अवलोकन हेतु दोनों लघुकथाएँ-

1-लघुता/ डॉ. सूर्यकांत नागर

रविवार था और बतियाने के लिए पड़ोसी खन्नाजी के यहाँ चला गया। यू.पी. के चुनाव-परिणामों पर चर्चा चल रही थी कि खन्नाजी का बेटा विमल स्कूल से लौटा। ‘‘कैसा रहा तुम्हारा आज का पर्चा?” खन्ना साहब ने पूछा।

“पापा! बहुत बढ़िया।” बेटे ने कहा। उसकी खुशी समा नहीं रही थी। कुछ रुककर कहा, “पापा, आज एक मजेदार घटना घटी। हमारे सर जब प्रश्नपत्रों का बंडल लेकर जा रहे थे, तो उसमें से एक प्रश्नपत्र खिसककर फर्श पर गिर गया। सर को उसका पता नहीं था। मैं उनके पीछे-पीछे जा रहा था। मैंने पर्चा उठाकर देखा, तो वह अगले दिन होने वाले गणित का पर्चा था। मैं कुछ देर ठिठका-सा खड़ा रहा। फिर दौड़कर पर्चा मास्टरजी को थमाते हुए कहा, “सर! ये पर्चा पीछे गिर गया था।” पर्चा देख सर घबरा गए, पूछा, “तुमने इसे पढ़ा तो नहीं?”

“बिल्कुल नहीं”- मैंने कहा, तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और चल दिए। कहते हुए वह एक फिर प्रसन्नता से भर आया। पर मैंने देखा, खन्नाजी के चेहरे का रंग एकाएक बदल गया। अफसोस की रेखा चेहरे पर खिंच गई, जैसे कोई सुनहरा अवसर विमल के हाथ से छूट गया। ‘मूर्ख है साला!’ वे बुदबुदाए।

“हाँ सचमुच मूर्ख है। बच्चा है; इसलिए खुद अपनी आँखों में धूल झोंक ली। बड़ा होता, तो टीचर की आँखों में धूल झोंक आता”- मैंने कहा।

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2-ममता / डॉ. सूर्यकान्त नागर

सुदूर प्रदेश से आगे की पढ़ाई के लिए आया मामूली हैसियत का वह लड़का, मेरे यहाँ एक कमरा किराए पर लेकर रह रहा है। ट्यूशनें कर जैसे-तैसे अपना काम चलाता है। हाथ तंग होने से साल भर से अपने गाँव भी नहीं गया है; पर उसकी वृद्धा माँ से न रहा गया। तीर्थ-यात्रा से लौटते हुए वह बीच में यहाँ उतर गई और पूछते हुए बेटे के घर तक पहुँच गई। बेटा ट्यूशन पर गया हुआ था। मैंने वृद्धा को अपने घर में बिठाया। बैठते ही वह बेटे के बारे में पूछने लगी- कैसा है वह? दुबला तो नहीं हुआ? कब कॉलेज जाता है, कब आता है? कहाँ खाता है? क्या करता है? आदि-आदि। उसकी हर बात से बेटे के प्रति चिंता और उससे मिलने-देखने की उत्सुकता प्रकट हो रही थी। आखिर उससे न रहा गया, सहसा पूछ बैठी, “कौन- सा कमरा है मेरे बेटे का?”

चूँकि लड़का कमरे की चाबी हमारे यहाँ ही छोड़ जाता था, ताला खोलकर उसे उसके बेटे के कमरे में ले गया। भरपूर नजर से वह कमरे की एक-एक चीज देखने लगी। देखने क्या लगी, तोलने लगी। अजीब- सी जिज्ञासा थी उसकी आँखों में।

“बैठो, मैं तुम्हारे लिए पानी लेकर आता हूँ।”

फर्श पर बिछे अस्त-व्यस्त बिस्तर के एक छोर पर वह बैठ गई। लौटकर आया तो भौंचक रह गया। देखा, आत्मविभोर माँ चीकट हो आए उस तकिए को चूम रही है, जिसे उसका बेटा सिरहाने रखकर सोता है। फिर आहिस्ता- आहिस्ता वह बिस्तर को सहलाने लगी। उसकी आँखों से टपके आँसू न केवल बिस्तर को, बल्कि मुझे भी अंदर तक भिगो गए। लगा, बिस्तर को नहीं, वह अपने बेटे को सहला रही है।

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