जून 2026

देशसृजनहार     Posted: July 1, 2024

 ‘इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ’ अपनी लय और गायन क्षमता का उपयोग करते हुए वो भूखे बच्चे को छाती लिपटाए,दिलासा देकर सुलाने की कोशिश कर रही थी। 

“माई.. चाँद नाहीं..रोटी..” बच्चा हिंचुका।

“अभी बाबू आते होंगे रोटी लेके…तू सो न, जब आएँगे तो जगा दूँगी।” माँ जानती थी , दो दिन से बाढ़ राहत में बँटने वाले खाने के कैंप से वो छीना झपटी के कारण खाली हाथ आ रहा था। आज भी खाना मिलेगा, इसका कोई भरोसा नहीं।

“इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ।” माँ ने फिर लय लगाने की कोशिश की ताकि बच्चा सो जाए और अगर बाप खाली हाथ लौटे तो रोए ना , तभी दरवाजे पर आहट हुई। 

“बाबू आए गए…बाबू आए गए…” बच्चा किलक उठा। अखबार के टुकड़े में लिपटे नुची हुई डबलरोटी का टुकड़ा देख बच्चा और भी खुश हो गया। माँ कभी बच्चे को , कभी बच्चे के पिता को देख रही थी।

“मुझे तो आज भी पैकेट नहीं मिल पाया पर एक कुत्ते को पता नहीं कैसे…” लघुकथा के आखिरी के ये संवाद पढ़ते ही लघुकथाकार का कंठ अवरुद्ध हो गया और श्रोताओं के तालियों से सभागार गूँज उठा। कुछ संवेदनशील हृदय तालियाँ  बजाते हुए ऑंसू भी पोंछ रहे थे। इस कथा वाचन के उपरांत अधिवेशन का भोजनावकाश था, सभी हॉल की तरफ बढ़ चले। 

“वाह भाई साब..आपकी कथा ने आज सबको द्रवित कर दिया। जैसा लेखन, वैसा ही वाचन, उम्दा।”

“शुक्रिया.. शुक्रिया। यार ये अधिवेशन वाले पैसे तो लेते हैं पर खाना ढंग का नहीं बनवाते। देखो ये ठंडी पूड़ियाँ , आलू-गोभी से टकटक ताकता आलू, न तेल न मसाला और मीठे में तो कुछ है ही नहीं। मुझसे तो नहीं चबाया जाएगा ये..” लेखक ने मुँह बनाते हुए कहा।

“यहाँ  पास में ही एक रेस्टोरेंट है, वहाँ  के छोले-भटूरे मशहूर हैं। चले?” मित्र ने फुसफुसाते हुए कहा।

“चल यार..वैसे भी मेरा कुछ चटपटा खाने का मन है! लेखक ने मुस्कराते हुए कहा।

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