कितनी बार समझाया है इनको, थोड़ा धीरज से काम लिया करो। अब बेटे की शादी हो गई है, घर में बहू है, उनका बच्चा है। वो तो अच्छा है आज विभा गोलू को नानी से मिलवाने लेकर गई हुई थी, नहीं तो क्या सोचती बाप-बेटे की लड़ाई देखकर ‘बाल सारे सफ़ेद हो गए हैं, लेकिन अकड़ वैसी की वैसी है। क्या फ़र्क पड़ जाता दो बात नीतिन की मान लेते।’
सुशीला के मन में विचारों की रेलमपेल चल रही थी। उसे दो पल चैन नहीं पड़ रहा था, बैचेन होकर रसोई में लगी रही।
पता नहीं कब आएँगे दोनों, कुछ खाकर भी नहीं गए। नीतिन भी पूरी अपनी चलाना चाहता है अभी से, यही नहीं कि कभी पापा की भी सुन ले। विचारों के मंथन के साथ रसोईघर से पकवानों की महक़ उठने लगी।
अकेला इंसान ज्यादा सोचता है, क्योंकि विचारों की शृंखला में कोई बाधा देने वाला नहीं होता। बड़ी मुश्किल से शाम हुई।
दरवाज़े की घंटी बजी। नीतिन आया पर उसका मुँह अभी भी फूला हुआ देखकर कुछ नहीं कहा, चुपचाप उसकी टेबल पर दही-भल्ले रखकर मुड़ने लगी तो पीछे से नीतिन का स्वर आया- ‘सॉरी मॉम मुझे पापा से ऐसे बात नहीं करनी थी।’
पीछे मुड़कर नीतिन से बात करने की भूमिका सोच ही रही थी, इतने में दुबारा दरवाजे की घंटी बजी।
माथे में बल डाले हुए राजेश को देखकर उनसे बात करने की इच्छा नहीं हुई। दाल का हलवा चुपचाप उनकी टेबल पर रखकर मुड़ी तो हाथ थामकर बोले – ‘सुनो मुझे लगता है नीतिन को उसके फैसले खुद लेने का मौका देना चाहिए न मुझे अब !!’
राजेश की बात सुनकर सुशीला आँखों के आँसू छिपाने के लिए साड़ी के पल्लू से पोंछने लगी।
टोकते हुए राजेश बोले ‘अरे रे !ये क्या, तुम तो हमारा सेतु हो, सेतु की बुनियाद में इतनी नमी ठीक नहीं भई।’
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