टेलीफोन की घंटी घनघना उठी- “दूसरी तरफ से आवाज आई, “मैडम मिसेज जोशी आपसे मिलना चाहती हैं।”

“भेज दीजिए।”
“क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?” दो भीगी हुई आँखें कब से दरवाजे से झाँक रही थीं।
“हाँ मिसेज जोशी आइए।’’
श्रीमती जोशी सरल, सौम्य, शिक्षिका जो सेवानिवृत्त होने वाली हैं, अपने हाथों में कुछ कागज़ और पासबुक लेकर खड़ी हैं। डगमग पग धरती हुई आगे बढ़ीं ।
“बैठिए,” मैंने इशारा किया; पर वे बैठी नहीं, खड़ी रहीं ।
“मैडम, बहुत मुश्किल हो रही है, बैंक वाले मुझे चेकबुक नहीं दे रहे हैं।”
“क्यों ?’’
“जी, पहले मैं यहीं क्वार्टर में रहती थी, तो चेकबुक मिलने में कभी कोई परेशानी नहीं हुई। अब रिटायर होने जा रही हूँ, तो मैंने क्वार्टर छोड़ दिया है। आजकल बेटे के साथ रह रही हूँ।”
“तो आप बैंक को अपने आवास- परिवर्तन की सूचना दे दीजिए।
“मैडम, मकान तो बेटे के नाम है।’’
“मिसेज जोशी कुछ समय बाद आप रिटायर होने वाली हो, पेंशन के लिए भी आपको अपने स्थायी पते की सूचना तो देनी होगी, वैसे आपका पैतृक गाँव कहाँ है?”
“कर्नाटक में है मैडम।”
“तो आप रिटायरमेंट के बाद गाँव में रहोगी।”
“नहीं मैडम, गाँव में मुझे कोई नहीं जानता। शादी के बाद से बेटे की परवरिश और पढ़ाई के लिए पति के साथ यहीं रही। गाँव जाने का मौक़ा बस दो–तीन बार ही आया। पति के गुजर जाने के बाद गाँव जाने का कभी अवसर ही नहीं मिला।”
मैंने घड़ी देखी, मेरी मेज पर पड़े पत्र-परिपत्र, फाइलों से झाँककर मुझे चिढ़ा रहे थे, मुझे लगा अब श्रीमतीजी जरूर अपनी बेटे-बहू की शिकायत करेंगी, पता नहीं कितनी देर तक अपनी रामकहानी सुनाएगी। बात को बीच में काटकर मैं बोली, “ओहो मिसेज जोशी आपका स्थायी पता क्या है?”
भीगी पलकों ने झुककर गीलेपन को अन्दर ही छुपा लिया; पर आवाज भर्रा उठी, “मैडम, मेरा कोई स्थायी पता नहीं है, मैं वृद्धाश्रम ढूँढ रहीं हूँ अपने लिए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया ।
तभी टेलीफोन की घंटी ने फिर से घनघनाकर सन्नाटे को भंग कर दिया।
-0- संप्रतिः प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय हल्द्वानी छावनी
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