मेरा आकलन है कि एक उत्कृष्ट और सफल लघुकथा वह होती है जो अपनी संक्षिप्तता में भी पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ जाए। इसमें विषयवस्तु की स्पष्टता, रचना की कसावट और पात्रों का जीवंत चित्रण अत्यंत आवश्यक होता है। ऐसी लघुकथा किसी एक सशक्त विचार, द्वंद्व या क्षणविशेष पर केंद्रित होती है और उसे अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। यह न तो अनावश्यक विवरण में उलझती है और न ही उपदेशात्मक होती है। इसके संवाद पात्रानुकूल, संक्षिप्त और अर्थगर्भी होते हैं, जो कथानक को आगे बढ़ाते हैं और पात्रों की मनोभूमि खोलते हैं। सफल लघुकथा की भाषा सरल, परिष्कृत और कलात्मक होती है, ऐसी कि पाठक के मन में चित्र खिंच जाए और पढ़ने के बाद भी उसकी गूँज बनी रहे। एक सशक्त लघुकथा में द्वंद्व का होना अत्यंत अनिवार्य है, चाहे वह पात्र के भीतर हो या बाहर, वही कथा को गति और तनाव प्रदान करता है। अंत इसका सबसे निर्णायक तत्त्व होता है। एक शक्तिशाली ‘पंचलाइन’, जो किसी पात्र द्वारा बोले गए संवाद के रूप में हो, कथा की स्मृति को अमर कर देती है। यह पंचलाइन झटका देती है, सवाल खड़ा करती है और पाठक को सोचने पर विवश करती है। शीर्षक भी प्रतीकात्मक होना चाहिए, ऐसा कि वह कथा के भीतर मौजूद न होकर भी उसका सार व्यक्त करे। सर्वोत्तम लघुकथाएँ वे होती हैं जिनका कथ्य मौलिक हो, वे पाठक को झकझोरें और अंत में एक ऐसे शून्य में छोड़ जाएँ जो भीतर तक भर जाए। ऐसी रचना ही कालजयी बनती है। ‘लघुकथा कलश’ के संपादन के दौरान गत आठ वर्षों में मुझे हज़ारों लघुकथाओं से गुज़रने का अवसर मिला। एक पाठक के रूप में, बीते चार दशकों से भी अधिक समय में अनेक रचनाओं ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।
हिंदी लघुकथा-साहित्य के व्यापक परिदृश्य में मेरी पसंदीदा रचनाओं की सूची भले ही लंबी हो, किंतु कुछ लघुकथाएँ ऐसी हैं जिन्हें विस्मृत कर पाना मेरे लिए असंभव है। इनका अविस्मरणीय होना किसी एक कारण से नहीं, बल्कि उनकी बहुआयामी उपलब्धियों से जुड़ा है। कुछ लघुकथाएँ अपने कथ्य की गंभीरता और मौलिकता के कारण विशिष्ट हैं, तो कुछ विषय चयन की अनन्यता और वैचारिक तेवर की तीक्ष्णता के कारण। कई रचनाएँ अपनी सादगी में ही गहन संवेदनाएँ समेटे हुए हैं, तो कुछ अपनी शिल्पगत ऊँचाई या प्रयोगशीलता के कारण कालजयी बन गई हैं। वहीं कुछ लघुकथाएँ अपने भावनात्मक आह्वान से पाठक के हृदय को इस प्रकार स्पर्श करती हैं कि वे स्मृति से कभी लुप्त नहीं होतीं। इन सभी रचनाओं में व्याप्त निर्णायक और मारक पंचलाइन उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। यही पंचलाइन न केवल कथाओं को प्रभावोत्पादक बनाती है, बल्कि उन्हें दीर्घजीवी और कालातीत भी कर देती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि इन लघुकथाओं का महत्व केवल कथानक तक सीमित नहीं है, बल्कि वे हिंदी-लघुकथा की कला-दृष्टि और विकास-यात्रा की अमिट धरोहर हैं।
भाई रवि प्रभाकर की अभिलाषा थी कि वे हिंदी-लघुकथा की अनेक कालजयी रचनाओं पर एक विस्तृत आलेख लिखें। इस योजना का उल्लेख उन्होंने मुझसे भी किया था और डॉ. अशोक भाटिया जी से भी। दुर्भाग्यवश, समय ने उन्हें यह संकल्प पूरा करने का अवसर नहीं दिया। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यदि वे इस आलेख को लिख पाते तो उसका स्वरूप गहन अध्ययन, सूक्ष्म विश्लेषण और प्रामाणिक दृष्टिकोण से समृद्ध होता। रवि भाई के अधूरे स्वप्न को ध्यान में रखते हुए डॉ. अशोक भाटिया ने उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप ‘हिंदी-लघुकथा का हासिल’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जो ‘लघुकथा कलश’ में प्रकाशित हुआ। इस आलेख में लगभग तीन दर्जन लघुकथा लेखकों की रचनाओं तथा उनकी रचनाधर्मिता पर विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत किया गया था। प्रस्तुत आलेख उसी की एक कड़ी है। इसमें मैंने पचास के क़रीब लघुकथाओं के विविध आयामों का गहन परीक्षण करते हुए उनके कलात्मक पहलुओं के अलावा दर्शन शास्त्र और नवरस के निकष पर भी विवेचना करने की चेष्टा की है।
जब यह आलेख पूर्ण रूप से प्रकाशित होगा तो पाठक पाएँगे कि इसमें वे लघुकथाएँ भी सम्मिलित की गई हैं, जिनका ससम्मान उल्लेख होना पूर्व से अपेक्षित था, किंतु उन्हें जानबूझकर उपेक्षित कर दिया गया था। उनके साथ ऐसा क्यों हुआ, इस प्रश्न पर विचार करना इस आलेख का उद्देश्य नहीं है। मेरा प्रयत्न केवल इतना है कि हिंदी-लघुकथा की उपलब्धियों को पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टि के साथ देखा और प्रस्तुत किया जाए। इसीलिए यह आलेख किसी प्रकार का ‘निचोड़’ या ‘दावा’ न होकर महज़ एक ईमानदार साहित्यिक विवेचना है।
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1. सलाम दिल्ली/ अशोक लव
रेलगाड़ी के डिब्बे में बैठते ही अशरफ़ ने सिगरेट सुलगाई। गाड़ी के चलने में अभी वक़्त था। उसने खिड़की से सिर टिका दिया। उसके मस्तिष्क में रह-रहकर कई स्वर गूँजने लगे।
“टी.वी. प्रोड्यूसर मेरी पहचान का है। उसकी एक कमज़ोरी है। उसका इंतज़ाम तू कर ले, मैं तेरी बात करा देता हूँ।” अब्दुल ने टी.वी. में काम कराने का आश्वासन देते हुए कहा था।
“देख, स्कॉच की बोतलें ले आ। तेरे कमरे में रातभर बैठेंगे। सतीश जिस सीरियल पर काम करने जा रहा है, उसमें तेरे रोल की बात करा दूँगा।” उमेश ने कहा था।
“हाय स्मार्टी! दिल्ली आकर भी बनारस के पंडे बने रहोगे? तुम पिक्चर दिखाने नहीं ले जा सकते तो कोई बात नहीं, मैं ले चलती हूँ। टिकट के पैसे मैं दूँगी। घबराओ मत!” बाज़ू पकड़कर उठाते हुए प्रियंका ने कटाक्ष किया था।
“अशरफ़! तुम्हारे अब्बा मेरे दोस्त हैं। इसीलिए आज तक ख़ामोश था। यह रोज़-रोज़ नाटकों की रिहर्सल के लिए मैं छुट्टी नहीं दे सकता। अब या तो थिएटर में काम कर लो या मेरी मैगज़ीन में।” आरिफ़ साहब ने फ़रमाया था।
“सीरियल के लिए तुम्हारा प्रोजेक्ट अच्छा है। नया आइडिया है। तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट भी दिला दूँगा। पर कंपनी में मेरी पत्नी का फ़िफ़्टी परसेंट हिस्सा होगा।” प्रोड्यूसर सिन्हा ने सौदेबाज़ी करते हुए कहा था।
“यार जावेद! चाय के साथ बिस्कुट भी खिला जा।” उसके अपने स्वर में भूख गिड़गिड़ा रही थी।
“अरे! अशरफ़ भाई, इतनी सर्दी में पतली-सी बनियान पर कोट पहने हो? कमी कहाँ है? बटन बंद कर लो, ठंड लग जाएगी।” मकान मालिक की बेटी सलमा ने कहा था।
सिगरेट की आँच ने उसकी उँगलियाँ झुलसा दीं। वह चौंककर बाहर देखने लगा। सामने के विज्ञापन-पट्ट पर रंगीन बत्तियाँ जल-बुझ रही थीं। प्लेटफ़ॉर्म पर लगे टी.वी. पर चित्रहार आ रहा था। हीरोइन भाग रही थी, पीछे-पीछे हीरो गाना गाते भाग रहा था। सभी कुछ बासी-बासी था।
दिल्ली आया था तो प्लेटफ़ॉर्म की इन्हीं रंग-बिरंगी जलती-बुझती बत्तियों ने उसे चकाचौंध कर दिया था। टी.वी. पर घोषणाएँ करने वाली युवतियों के शहर दिल्ली में पहुँचकर वह ख़ुश था। उसे लगा था दिल्ली उसके अभिनय की क़द्र करेगी और उसका चेहरा भी टी.वी. स्क्रीन पर होगा। वह दिल्ली के आकाश में बिना पंखों के उड़ रहा था। उसे अपनी मुट्ठियों पर विश्वास था कि वह इनमें आकाश को बाँध लेगा।
एक-एक कर उँगलियाँ मुट्ठियों से बाहर निकल गई थीं। आकाश छिटककर बहुत ऊँचे टँग गया था। उसके पास अभिनय था। उसकी क़लम में शब्दों का जादू था। उसके पास नोट नहीं थे। उसके पास बोतलें नहीं थीं। उसके पास प्रोड्यूसरों की कमज़ोरियों का इलाज नहीं था। उसके पास महानगर की मरी हुई आत्मा नहीं थी। इसलिए ढाबे का उधार बढ़ता गया था। सर्दी बढ़ती गई थी। कपड़े कम और कम होते चले गए थे।
छह महीने बाद ही ‘सलाम दिल्ली’ कह वह बनारस की गाड़ी में आ बैठा था।
गाड़ी सरकने लगी। वह चौंका। बनारस किस मुँह से जाएगा? उसे लगा, दिल्ली उसे चिढ़ा रही थी। उसे न जाने क्या हुआ? अटैची उठाकर वह प्लेटफ़ॉर्म पर कूद गया। दिल्ली फिर उसके सामने थी। वह स्टेशन से बाहर निकल आया। सामने पड़े पत्थर पर कसकर ठोकर मारी। पत्थर उछलकर दूर जा गिरा।
उसके होंठों पर मुस्कराहट तैर गई। उसने सामने जगमगाती दिल्ली से हाथ उठाकर कहा, “सलाम दिल्ली!” उसके नपे-तुले क़दम दिल्ली का सीना नापने लगे।
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अशोक लव की लघुकथा ‘सलाम दिल्ली’ आधुनिक हिंदी लघुकथा-साहित्य में संघर्ष, पलायन और जिजीविषा की गहन अभिव्यक्ति है। यह कथा न केवल एक कलाकार की विफलताओं और निराशाओं का दस्तावेज़ है, बल्कि उसके भीतर से उठती जिजीविषा और संघर्ष करने की अदम्य आकांक्षा का भी जीवंत चित्रण करती है। शिल्प की दृष्टि से यह कथा अद्वितीय है क्योंकि इसमें आत्मकथात्मकता, स्मृति और वर्तमान का मेल दिखाई देता है। कथा का आरंभ अशरफ़ के रेलगाड़ी में बैठने और सिगरेट जलाने से होता है, और इसके साथ ही उसके मस्तिष्क में बीते संवादों का सिलसिला चल पड़ता है। यह तकनीक पाठक को तुरंत ही नायक के मानसिक संसार में पहुँचा देती है। अतीत और वर्तमान के संवादों की पुनरावृत्ति ही कथा को गतिशील बनाती है।
शैली सरल, प्रवाहमयी और संवादप्रधान है। संवादों के सहारे ही नायक के संघर्ष, असफलता और आंतरिक पीड़ा का चित्रण किया गया है। भाषा कहीं-कहीं व्यंग्य और कटाक्ष से भी भरी है, जैसे प्रोड्यूसर का कहना कि कंपनी में उसकी पत्नी का पचास प्रतिशत हिस्सा होगा, या अब्दुल का कहना कि प्रोड्यूसर की कमज़ोरी का इंतज़ाम करो। ये संवाद दिखाते हैं कि कला और सृजन के क्षेत्र में प्रतिभा से अधिक महत्व पैसे, शराब और स्त्री-सौंदर्य का है। लेखक ने इस विडंबना को बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के केवल पात्रों के कथन से ही उभार दिया है।
संदेश स्पष्ट है कि महानगरों का ग्लैमर अक्सर धोखेभरा होता है। यहाँ प्रतिभा की क़ीमत तभी है जब उसके साथ पैसा, संपर्क और अवसर पैदा करने वाली अनैतिक चाबियाँ हों। अशरफ़ के पास अभिनय है, लेखन की प्रतिभा है, परंतु महानगर की माँग के अनुरूप उसके पास संसाधन और साधन नहीं हैं। यही कारण है कि वह संघर्ष करते-करते टूटने लगता है और वापस लौटने को विवश हो जाता है। परंतु अंत में जब वह पत्थर को ठोकर मारता है और मुस्कराते हुए कहता है “सलाम दिल्ली”, तो यह उसके भीतर जागी उस जिजीविषा का प्रतीक है जो असफलताओं से पराजित होने के बजाय फिर उठ खड़ी होती है।
दृश्यात्मकता कथा में अत्यंत सजीव है। रेलगाड़ी का डिब्बा, प्लेटफ़ॉर्म पर जलती-बुझती बत्तियाँ, चित्रहार का दृश्य, ठंड में काँपता हुआ कलाकार, मकान मालिक की बेटी का करुण स्वर और अंत में स्टेशन से बाहर निकलते हुए पत्थर को ठोकर मारता अशरफ़, ये सब दृश्य पाठक की आँखों में चलचित्र की तरह उभरते हैं। यह दृश्यात्मकता कथा को केवल पाठ नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव बना देती है।
पात्रों की मानसिकता का चित्रण भी उल्लेखनीय है। अब्दुल, उमेश और सिन्हा जैसे पात्र उस व्यवस्था का प्रतिनिधित्त्व करते हैं जहाँ कला केवल सौदेबाज़ी का साधन है। प्रियंका और सलमा जैसे पात्र महानगरीय सहानुभूति और कटाक्ष का मिश्रण हैं। आरिफ़ साहब की मानसिकता व्यावसायिक है, वे कला को अपने कार्यालय के अनुशासन से तौलते हैं। इसके बरअक्स अशरफ़ की मानसिकता बेहद जटिल है। वह स्वप्नद्रष्टा है, जिसे लगता है कि दिल्ली उसकी प्रतिभा को पहचान लेगी। लेकिन धीरे-धीरे उसके सपने टूटते हैं। उसके भीतर निराशा घर कर लेती है, परंतु अंततः वही मानसिकता पलटकर संघर्ष की प्रेरणा में बदल जाती है। यही मानसिक परिवर्तन कथा का शिखर है।
सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी कथा में गहरे रूप में सामने आते हैं। यह कथा महानगरीय जीवन के उस सच को उजागर करती है जिसमें प्रतिभा की क़द्र तभी है जब उसके साथ पूँजी, संपर्क और अनुकूलता जुड़ी हो। अशरफ़ जैसा कलाकार ग़रीबी और संसाधनों की कमी से जूझता है। उसका ढाबे पर बढ़ता उधार और ठंड में कपड़ों की कमी उसके आर्थिक संघर्ष का प्रतीक है। सामाजिक स्तर पर यह कथा बताती है कि कला और कलाकार को समाज में कितनी उपेक्षा झेलनी पड़ती है। कलाकार को केवल मनोरंजन का साधन समझा जाता है, उसकी रचनात्मकता का सम्मान नहीं किया जाता।
कथा का मनोवैज्ञानिक पक्ष से देखें तो अशरफ़ का चरित्र निरंतर द्वंद्व में जीता है। वह उम्मीद और हताशा के बीच झूलता रहता है। शुरूआत में वह आत्मविश्वास से भरा हुआ है कि दिल्ली उसकी प्रतिभा को पहचान लेगी, लेकिन एक-एक कर मिले अपमान और असफलताएँ उसे भीतर से तोड़ देती हैं। गाड़ी में बैठते समय उसकी मानसिकता पलायनवादी हो जाती है। परंतु जब वह पत्थर को ठोकर मारता है, तब उसके भीतर आत्मसम्मान और जिजीविषा फिर से जाग उठती है। यह मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव नायक के चरित्र को अत्यंत प्रामाणिक और प्रभावी बना देता है।
दर्शन शास्त्र के दृष्टिकोण से यह लघुकथा अस्तित्ववाद से जुड़ी है। अस्तित्ववाद कहता है कि मनुष्य अपने अस्तित्व को अपने चुनावों और कर्मों से गढ़ता है। अशरफ़ ने भी अपने अस्तित्व को हार मानकर समाप्त नहीं किया, बल्कि संघर्ष करने के चुनाव से उसे नया अर्थ दिया। साथ ही इसमें जिजीविषा और कर्मयोग का दर्शन भी है। पत्थर को ठोकर मारना केवल प्रतीकात्मक क्रिया नहीं, बल्कि यह संदेश है कि बाधाएँ चाहे कैसी भी हों, मनुष्य को संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। भगवद्गीता स्पष्ट कहती है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। अशरफ़ का चरित्र भी इसी दर्शन का प्रतिरूप है। उसने जब निराशा में ट्रेन पकड़ ली थी, तब वह मानो पलायन की राह पर था। परंतु उसके भीतर जो द्वंद्व उठा, वही गीता का संदेश है कि पलायन समाधान नहीं। गीता अर्जुन से कहती है कि युद्ध से भागना धर्म का त्याग होगा, कर्म का त्याग होगा। उसी तरह अशरफ़ का ट्रेन से उतरना और पत्थर को ठोकर मारना, वस्तुतः जीवन के कुरुक्षेत्र में उसका पुनः प्रवेश है।
रस की दृष्टि से यह कथा मुख्यतः करुण और वीर रस पर आधारित है। करुण रस अशरफ़ की असफलताओं, उसके अभावों और उसकी निराशा से उपजता है। वहीं वीर रस तब प्रकट होता है जब वह ट्रेन से उतरकर पत्थर को ठोकर मारता है और मुस्कराते हुए दिल्ली को फिर से सलाम करता है। इस तरह कथा करुण और वीर रस का संतुलन बनाकर पाठक को भावनात्मक झकझोरन के साथ प्रेरणा भी देती है।
वाक्य-विन्यास की दृष्टि से यह कथा अत्यंत संक्षिप्त और तीखी है। संवाद छोटे हैं, परंतु उनमें गहरी चोट है। “यार जावेद! चाय के साथ बिस्कुट भी खिला जा।” जैसे वाक्य नायक की दयनीय स्थिति का चित्र खींच देते हैं। वहीं “सलाम दिल्ली” जैसे संक्षिप्त वाक्य पूरे कथानक का निचोड़ प्रस्तुत कर देते हैं। वाक्य संरचना में कहीं भी बोझिलता नहीं है, हर वाक्य कथा को आगे बढ़ाता है और तनाव को गहराता है। यही संक्षिप्तता और तीखापन वाक्य-विन्यास की शक्ति है। इस कथा में अशरफ़ दो बार ‘सलाम दिल्ली’ बोलता है। पहली बार ट्रेन में बैठते समय वह निराशा में दिल्ली को अलविदा कहता है। यह पलायनवाद का प्रतीक है, क्योंकि वह हार मानकर अपने शहर लौट रहा है। उस क्षण में उसके भीतर निराशा और पराजय की भावना हावी है। लेकिन दूसरी बार जब वह ट्रेन से उतरता है और पत्थर को ठोकर मारकर फिर से ‘सलाम दिल्ली’ कहता है, तो यह उसकी जिजीविषा और संघर्ष करने की इच्छाशक्ति का प्रतीक बन जाता है। यहाँ ‘सलाम दिल्ली’ केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि एक चुनौती है, एक उद्घोष है कि वह मैदान छोड़कर भागेगा नहीं। यह द्वंद्व ही कथा की सबसे बड़ी शक्ति है। एक ओर पलायन और पराजय की मानसिकता, दूसरी ओर पुनः संघर्ष की ज्वाला। इसी विरोधाभास ने कथा को जीवन का वास्तविक दस्तावेज़ बना दिया है।
इसके अंत और पंचलाइन ‘सलाम दिल्ली’ पर एक दिलचस्प क़िस्सा जुड़ा है। अशोक लव ने स्वयं एक बार बताया था कि उन्होंने कथा का अंत वहीं कर दिया था जब अशरफ़ निराश होकर बनारस जाने वाली गाड़ी में बैठ जाता है और ‘सलाम दिल्ली’ कहकर दिल्ली को अलविदा कह देता है। लेकिन जब यह कथा उन्होंने कुमार नरेंद्र को सुनाई तो उन्होंने इस अंत से असहमति जताई। उनका कहना था कि अशरफ़ का यूँ चले जाना मैदान छोड़कर भागने जैसा होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि अशरफ़ गाड़ी से उतरे और पत्थर को ठोकर मारे, फिर से संघर्ष का संकल्प ले और ‘सलाम दिल्ली’ कहे। इस परिमार्जित अंत ने वास्तव में कथा को कालजयी बना दिया। पंचलाइन अब केवल हार का प्रतीक नहीं रही, बल्कि पुनः संघर्ष का उद्घोष बन गई। यही कारण है कि यह कथा हिंदी-लघुकथा में एक मील का पत्थर मानी जाती है।
शीर्षक ‘सलाम दिल्ली’ अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक है। यह शीर्षक दिल्ली नामक महानगर से कलाकार के रिश्ते का प्रतीक है। इसमें चुनौती भी है, पीड़ा भी और जिजीविषा भी। शीर्षक दो विपरीत मानसिक अवस्थाओं को एक साथ समेटता है, पहली निराशा और दूसरी संघर्ष। यही कारण है कि यह शीर्षक पाठक की स्मृति में लंबे समय तक गूँजता रहता है।
यह रचना दीर्घजीवी और यादगार है क्योंकि यह केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि हर उस संघर्षरत व्यक्ति की कथा है जो महानगरों में अपनी जगह बनाने आता है और असफलताओं से जूझते हुए भी हार नहीं मानता। इसकी दृश्यात्मकता, संवादप्रधान शैली और परिमार्जित अंत इसे न केवल प्रभावी बनाते हैं बल्कि कालजयी भी करते हैं। जब तक संघर्ष, असमानता और सपनों का महानगर रहेगा, तब तक यह कथा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगी।
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2. लाचारी/ पवन शर्मा
मुझे ऐसी बातों से कोफ़्त है। फिजूल बातें… जो हो चुका, उसको दुहराने से क्या लाभ? लेकिन अम्मा हैं कि हमेशा गढ़े मुर्दे उखाड़ती रहती हैं। कई बार मामाजी को पत्र में लिखवा भी चुकी हैं… मेरे द्वारा… कुसुम के द्वारा… और आज जब से मामाजी आए हैं, तब से अम्मा का मुहँ फूला हुआ है। घर में कोई मेहमान आ जाए, तब तो खुश रहना चाहिए।
मामाजी नीची नज़रें करके खाना खाते जा रहे हैं। बाबू भी पास बैठे खा रहे हैं। कुसुम अम्मा के पास बैठी है। मैं दरवाज़े के बाहर चटाई पर बैठा हूँ।
‘तोए कम-से-कम आ तो जानो थो।’ अम्मा बोलीं।
मामाजी कुछ नहीं कहते। चुपचाप खाना खाते रहे।
‘जानत है… सगो मामा होवे के बावजूद हमने दूसरे के हाथ से मामा को नेग करवाओ थो… अरे, आ तो जातो कम-से-कम… कुछ करतो चाहे नई करतो। शादी में हमाई इज़्ज़त तो बच जाती। सभी के मुँह पे जेई बात थी कि भाँजी की शादी हो रई है… मामा को कहीं पता नई है।’ अम्मा फिर से पुरानी आदत पर आती जा रही हैं। जिसके ऊपर बिगड़ जाएँ… जो भी सुनाना होता है… सुना देती हैं।
‘भौत इच्छा थी आवे की… आ नईं पाओ जिज्जी। सारी जिंदगी तोए बोलवे कूँ हो गओ।’ मामाजी बोले।
‘काए के लाने नई आ पाओ?’
‘……..’ मामाजी खाना खाते रहे।
‘बता न, काए के लाने नई आ पाओ?’ अम्मा फिर पूछती हैं।
‘बस्स, जेई मत पूछ जिज्जी!’
एकदम मामाजी के चेहरे पर लाचारी उमड़ आई। मैंने स्पष्ट रूप से देखी उनके चेहरे की लाचारी… अम्मा ने देखी या नहीं… पता नहीं !
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पवन शर्मा द्वारा रचित ‘लाचारी’ एक छोटी-सी पर बेहद सधी हुई, भीतर तक असर छोड़ने वाली लघुकथा है। इसका प्रभाव इसकी सधी हुई भाषा, अर्थपूर्ण वाक्यों और सबसे ज़्यादा उस चुप्पी में छिपा है जो कहे बिना बहुत कुछ कह जाती है। यह रचना उन रिश्तों की दरार को सामने लाती है जिनमें बहुत कुछ कहा जाना चाहिए था, लेकिन सामाजिक मर्यादा, आर्थिक मजबूरी या व्यक्तिगत दुख की वजह से कुछ भी कहा नहीं जा सका। मामाजी की चुप्पी और उनका वह एक वाक्य ‘बस्स, जेई मत पूछ जिज्जी’ एक साधारण जवाब नहीं है। यह एक ऐसी आवाज़ है जो बहुत कुछ सह चुके व्यक्ति के भीतर से निकलती है, लेकिन जिसे शब्दों में ढालना मुश्किल होता है। इसके बाद उनके चेहरे पर जो लाचारी उभरती है, वह इस लघुकथा को भावुक नहीं बल्कि करुण और गहराई से भरी हुई बना देती है। अगर लेखक की जगह कोई भावुक या अनुभवहीन लेखक होता, तो वह बहन के सामने मजबूरियों की पूरी फ़ेहरिस्त खोलकर रख देता। लेकिन पवन शर्मा ने पाठकों के लिए वह सब कुछ अनकहा छोड़ दिया, जिसे कह देने से शायद असर कम हो जाता। ‘लाचारी’ से यह सीखा जा सकता है कि लघुकथा में अनकहा क्या होता है और वह कितना कह जाता है। पवन शर्मा की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने बहुत कुछ कहने के बजाय मामाजी के न कह पाने को ही केंद्र में रखा। यही वह विशेषता है जो इस कहानी को यादगार बनाती है। पाठक उस चुप्पी को पढ़ते हुए ख़ुद भी भीतर से कुछ महसूस करता है, कुछ ऐसा जो सीधे कहा नहीं गया लेकिन पूरी तरह समझ में आ जाता है। ‘लाचारी’ इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि अगर बात को सीधे कहने के बजाय उसके आसपास की चुप्पियों को ईमानदारी से दिखाया जाए, तो रचना अधिक असर करती है। यह एक ऐसी कहानी है जो पढ़ने के बाद लंबे समय तक मन में बनी रहती है, क्योंकि यह हमें हमारे अपने रिश्तों की चुप आवाज़ों से मिलवा देती है।
‘लाचारी’ लघुकथा में दृश्यात्मकता भी सराहनीय, और वह बहुत सहज, सधी हुई और स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत की गई है। यह दृश्यात्मकता ज़ोर देकर दिखाई नहीं गई, बल्कि चुपचाप पाठक के मन में उतरती है। मामाजी का नीची नज़र करके खाना खाते रहना, बाबू और कुसुम की बैठने की स्थिति, और कथावाचक का दरवाज़े के बाहर चटाई पर बैठना – इन सब स्थितियों से एक शांत लेकिन भीतर से तनावपूर्ण घरेलू दृश्य बनता है। यह वह प्रकार की दृश्यात्मकता है जो रंगों या वस्तुओं के वर्णन से नहीं, बल्कि मौन, शरीर की भंगिमा और निगाहों की दिशा से बनती है। ख़ासकर जब मामाजी के चेहरे पर ‘लाचारी उमड़ आती है’, तो लेखक इसे सिर्फ़ शब्दों से नहीं कहता, बल्कि देखे जाने योग्य अनुभव के रूप में सामने रखता है। पाठक भी उस चेहरे को जैसे देख सकता है, महसूस कर सकता है। इस तरह ‘लाचारी’ की दृश्यात्मकता बाहरी दिखावे पर नहीं, भीतर की संवेदना पर टिकी है, जो रचना को और भी प्रभावशाली बनाती है।
लघुकथा में मुख्य रूप से करुण रस दिखाई देता है, जो मामाजी की चुप्पी, उनकी विवशता और चेहरे पर उभरती पीड़ा से पैदा होता है। इसके साथ-साथ शांत रस भी मौजूद है, जो उनके सहनशील स्वभाव और भीतर सब कुछ दबाकर रखने की प्रवृत्ति से झलकता है। अम्मा के संवादों में रौद्र रस की हल्की छाया है, जो उनके रोष और उलाहने में प्रकट होती है। हालाँकि यह रौद्र रस कथा में हावी नहीं होता, बल्कि करुण रस को और उभारने में मदद करता है। इन रसों का संतुलन कथा को गहराई और असर देता है, बिना भावनात्मक संतुलन खोए।
इस लघुकथा में मौन को शास्त्रीय अर्थ में किसी कमी की तरह नहीं, बल्कि एक गहराई और मौजूदगी की तरह देखा गया है। लेखक ने बात कहने के लिए संवाद से ज़्यादा चुप्पी और ठहराव का सहारा लिया है। भारतीय काव्य परंपरा में इसे ‘ध्वनि’ कहा जाता है, जहाँ जो सीधे नहीं कहा गया, वही सबसे ज़्यादा असर करता है। मामाजी की चुप्पी कोई खालीपन नहीं, बल्कि ऐसा मौन है जो अपने आपमें बहुत कुछ कह जाता है। मामाजी का आख़िरी संवाद एक भावनात्मक विस्फोट है। उन्होंने अपनी पूरी असमर्थता, पीड़ा और आत्मग्लानि को इसी एक वाक्य में समेट दिया है। यह वाक्य उनकी भीतर से टूटी हुई अस्मिता का संकेत देता है, जो अब किसी बहस, सफ़ाई या स्पष्टीकरण के योग्य नहीं बची है। इस लघुकथा में मनोवैज्ञानिक स्तर पर सबसे प्रभावशाली बात यह है कि कोई भी पात्र पूरी तरह सही या ग़लत नहीं है। सभी अपनी-अपनी सीमाओं, उम्मीदों और भावनात्मक ज़ख्मों के साथ खड़े हैं। यही इसे एक यथार्थपरक, मार्मिक और गहराई से स्पर्श करने वाली कथा बनाता है। इस लघुकथा को यदि ‘मौन का सौंदर्यशास्त्र कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
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3. कथा नहीं/ पृथ्वीराज अरोड़ा
वह पेशाब करके फिर बातचीत में शामिल हो गया।
दीदी ने कहा, “पिताजी को बार-बार पेशाब आने की बीमारी है, इनका इलाज क्यों नहीं करवाया?”
उसने स्थिति को समझा, फिर सहज भाव से बोला, “मैं अलग मकान में रहता हूँ, मुझे क्या मालूम इन्हें क्या बीमारी है?”
माँ बीच में बोली, “तो क्या ढिंढोरा पिटवाते?”
उसने माँ की बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, “देखो दीदी, अगर वह बताना नहीं चाहते थे तो ख़ुद ही इलाज करवा लेते।” थोड़ा रुककर आगे बोला, “इन्होंने बहुत रुपये सूद पर दे रखे हैं, पैसों की कोई कमी नहीं इन्हें।”
पिता चिढ़कर बोले, “जवान बेटे के होते इस उमर में डॉक्टर के पीछे-पीछे दौड़ता?”
इस हमले को तल्ख़ी में न झेलकर उसने गहरा व्यंग्य किया, “आप सुबह-शाम मीलों घूमते हैं, मुझसे अधिक स्वस्थ हैं, फिर डॉक्टर के पास क्यों नहीं जा सकते थे?”
दीदी ने चौंककर देखा। आनेवाली विस्फोटक स्थिति पर नियंत्रण करने की गरज़ से उसने बीच में ही दख़ल दिया, “आख़िर माँ-बाप भी अपनी संतान से कुछ उम्मीद करते ही हैं!”
वह अपनी स्थिति सोचकर दुःखी हो उठा। बोला, “तुम नहीं जानती कि मेरा हाथ कितना तंग है। ठीक से खाने-पहनने लायक़ भी नहीं कमा पाता। तुम्हारी शादी के बाद तुम्हें एक बार भी नहीं बुला पाया।” आँखों के गिर्द आए पानी को छुपाने के लिए उसने खिड़की से बाहर देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “सूद का लालच न करके मुझे कुछ बना देते तो मैं इनकी सेवा के लायक़ न बन जाता!”
पिताजी ने रुआँसे होकर बताया, “मेरे दो दाँत ख़राब हो गए थे, उन्हें निकलवाकर नए दाँत लगवाए हैं, देखो!” उन्होंने दाँत बाहर निकाल दिए।
माँ बार-बार रोने लगी, “क्या करते हो? तुम्हारा सारा जबड़ा भी बाहर निकल आए तो किसी को क्या?”
“दाँत न रहने पर आदमी ठीक से खा नहीं पाता।”
दीदी भी रोने लगी, “दीपक, क्या तुम्हें माँ-बाप पर ज़रा भी तरस नहीं आता?”
दीपक का चेहरा बुझते-जलते लट्टू की तरह होने लगा। दुख और आक्रोश में वह काँपने लगा। अगले ही क्षण उसने नक़ली दाँतों का सेट मेज़ पर रख दिया और सिसकता हुआ गुसलख़ाने की ओर बढ़ गया।
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पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथा ‘कथा नहीं’ आधुनिक लघुकथा लेखन का एक अनोखा उदाहरण है। यह कथा अपने शिल्प, शैली और भाषिक सादगी के कारण अत्यंत प्रखर व्यंग्य और मार्मिकता के साथ उभरती है। शिल्प की दृष्टि से यह कथा कहीं भी कृत्रिम नहीं लगती। घटनाओं का क्रम एकदम स्वाभाविक है। एक साधारण-सा पारिवारिक प्रसंग अचानक गहरी सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं को उभार देता है। कथा का आरंभ बिल्कुल सहज ढंग से होता है, जब बेटा पेशाब करके बातचीत में लौटता है। यह मामूली-सा दृश्य पाठक को सामान्य पारिवारिक वार्तालाप में ले जाता है, लेकिन धीरे-धीरे संवादों के माध्यम से स्थितियाँ गहराती जाती हैं और अंत में एक तीखा भावनात्मक विस्फोट प्रस्तुत करती हैं।
शैली संवादप्रधान है और यही इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता है। पात्रों के बीच होने वाले संवाद ही पूरी कथा का निर्माण करते हैं। कोई लंबा विवरण या वर्णन नहीं है, केवल पात्रों के मुख से निकले वाक्य हैं जो उनके व्यक्तित्व, मानसिकता और संबंधों को उजागर करते हैं। भाषा अत्यंत सरल और बोलचाल की है, लेकिन उसमें छिपा व्यंग्य, कटाक्ष और पीड़ा पाठक को भीतर तक झकझोरता है। उदाहरण के लिए, बेटे का वाक्य “आप सुबह-शाम मीलों घूमते हैं, मुझसे अधिक स्वस्थ हैं, फिर डॉक्टर के पास क्यों नहीं जा सकते थे?” केवल व्यंग्य नहीं बल्कि उसके भीतर दबे आक्रोश और असहायता को भी प्रकट करता है।
संदेश अत्यंत गहरा और मानवीय है। यह कथा उस पीढ़ीगत टकराव को सामने लाती है जो आज के सामाजिक परिवेश में आम है। एक ओर माता-पिता अपनी वृद्धावस्था में संतान से अपेक्षा रखते हैं कि वह उनकी देखभाल करे, दूसरी ओर संतान अपनी सीमाओं, परेशानियों और मनोवैज्ञानिक दबावों के कारण इन अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहती है। इस कथा में यह टकराव बेहद तीव्र रूप में सामने आता है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक यथार्थ की कथा है जिसमें वृद्ध माता-पिता और संघर्षरत संतान दोनों असंतोष और पीड़ा से घिरे रहते हैं।
दृश्यात्मकता भी इस कथा की ताक़त है। हर दृश्य पाठक की आँखों के सामने सजीव हो उठता है। पिता का चिढ़कर बोलना, माँ का रोना, बहन का बीच-बचाव करना और अंत में पिता द्वारा नक़ली दाँत निकालकर दिखाना, ये सब दृश्य ऐसे हैं जैसे मंच पर नाटक खेला जा रहा हो। अंत का दृश्य विशेष रूप से अविस्मरणीय है, जब बेटा दीपक नक़ली दाँतों का सेट मेज़ पर रखकर गुसलख़ाने की ओर चला जाता है। यह दृश्य उसके भीतर के टूटन, आक्रोश और असहायता का प्रतीक बन जाता है।
पात्रों की मानसिकता इस कथा की आत्मा है। पिता की मानसिकता कहीं-न-कहीं अहंकारी और आत्मगौरव से भरी है। वे मानते हैं कि जवान बेटे के रहते वे डॉक्टर के पीछे-पीछे नहीं दौड़ सकते। उनके लिए यह एक तरह की संतान से उम्मीद भी है और अपनी उम्र का अहंकार भी। माँ की मानसिकता पूरी तरह भावुक है। वह हर बात पर रोती है, लेकिन उसका रोना केवल असहायता ही नहीं बल्कि संतान से अपेक्षा का प्रतीक भी है। बहन संतुलन बनाने वाली भूमिका में है। वह टकराव को शांत करने की कोशिश करती है, लेकिन स्वयं भावुक होकर रोने लगती है। दीपक की मानसिकता सबसे जटिल है। वह एक ओर अपनी असमर्थता से दबा है, दूसरी ओर माता-पिता की अपेक्षाओं का बोझ उसे तोड़ रहा है। उसका आक्रोश इस रूप में निकलता है कि वह व्यंग्य करता है, ग़ुस्सा करता है और अंततः टूटकर नक़ली दाँतों का सेट मेज़ पर रख देता है। उसकी यह प्रतिक्रिया उसकी असहायता, दुख और आक्रोश का सम्मिलित रूप है।
सामाजिक और आर्थिक पक्ष की दृष्टि से यह कथा बहुत गहरी है। यह वर्तमान समाज में परिवारों की बदलती संरचना और समस्याओं को उजागर करती है। पहले संयुक्त परिवारों में माता-पिता की देखभाल सामूहिक ज़िम्मेदारी हुआ करती थी, परंतु आज के एकल परिवारों और सीमित आय वाले मध्यमवर्गीय जीवन में यह ज़िम्मेदारी बेहद बोझिल हो गई है। आर्थिक पक्ष और भी महत्त्वपूर्ण है। दीपक का कहना कि वह खाने-पहनने लायक़ भी नहीं कमा पाता, आज के संघर्षरत युवा की सच्चाई है। वहीं पिता के पास सूद पर दिए गए रुपये हैं, यह भी हमारे समाज की आर्थिक असमानता को दर्शाता है। एक ओर संतान असुरक्षित और अभावग्रस्त है, दूसरी ओर वृद्ध माता-पिता के पास भी संसाधन हैं, लेकिन उनका उपयोग पीढ़ियों के बीच दूरी और अविश्वास को बढ़ाता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कथा अत्यंत गहन है। वृद्धावस्था के माता-पिता मानसिक असुरक्षा से पीड़ित हैं। वे अपने जीवन के अंतिम समय में संतान पर आश्रित होना चाहते हैं। उनकी चिड़चिड़ाहट, आक्रोश और आँसू इसी मानसिक दबाव का परिणाम हैं। दूसरी ओर दीपक का मन अपराधबोध, आक्रोश और असमर्थता से भरा है। वह जानता है कि उसके माता-पिता उससे सेवा की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन वह आर्थिक और मानसिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि उनकी उम्मीदों पर खरा उतर सके। इस द्वंद्व से वह भीतर ही भीतर टूट रहा है। यही कारण है कि उसका आक्रोश व्यंग्य और उसके आँसू भीतर के संघर्ष को उजागर करते हैं।
दर्शनशास्त्रीय दृष्टि से यह कथा ज़िम्मेदारी और कर्तव्य के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें अस्तित्ववाद की छाया भी स्पष्ट है। हर पात्र अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश करता है। पिता अपने आत्मगौरव को बनाए रखना चाहते हैं, माँ भावनाओं के सहारे अपने अस्तित्व को अर्थ देती है, बहन संतुलन की कोशिश में है, और दीपक अपनी सीमाओं और विवशताओं के बीच स्वयं को खोज रहा है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या संतान का पहला कर्तव्य माता-पिता की सेवा करना है, भले ही वह स्वयं असमर्थ हो। या माता-पिता को संतान पर भार नहीं डालना चाहिए। यह द्वंद्व कथा को दार्शनिक गहराई देता है। रस की दृष्टि से यह कथा करुण रस पर आधारित है। हर पात्र की स्थिति करुणा उत्पन्न करती है। माँ और पिता का रोना, बहन का भावुक होना और बेटे का टूटना, ये सब करुणा का स्वरूप हैं। साथ ही इसमें व्यंग्य और आक्रोश से उत्पन्न रौद्र रस की छाया भी है। दीपक के व्यंग्यपूर्ण संवाद और उसका अंततः टूटना पाठक के भीतर क्षोभ और आक्रोश भी पैदा करते हैं।
वाक्य-विन्यास की दृष्टि से यह कथा अत्यंत सशक्त है। इसमें छोटे-छोटे संवादात्मक वाक्य हैं, जो तुरंत असर करते हैं। कहीं भी लंबी-चौड़ी व्याख्या नहीं है। वाक्यों की सादगी ही उनकी मारकता है। संवादों के बीच ठहराव और उनके प्रयोग से कथा का तनाव और बढ़ जाता है। “सूद का लालच न करके मुझे कुछ बना देते तो मैं इनकी सेवा के लायक़ न बन जाता” जैसे वाक्य संक्षिप्त होते हुए भी गहरे आघात करते हैं। वाक्य-विन्यास की यही संक्षिप्तता और तीक्ष्णता कथा की सबसे बड़ी ताक़त है।
कथा की पंचलाइन है दीपक का नक़ली दाँतों का सेट मेज़ पर रख देना और गुसलख़ाने की ओर बढ़ जाना। यह दृश्य केवल एक घटना नहीं बल्कि पूरे परिवारिक टकराव और टूटन का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि परिवार में अपेक्षाओं और असमर्थताओं का बोझ किस प्रकार संबंधों को तोड़ देता है। यह पंचलाइन पाठक को भीतर तक हिला देती है और लंबे समय तक याद रहती है।
शीर्षक ‘कथा नहीं’ अत्यंत सार्थक और मौलिक है। लेखक ने संकेत दिया है कि यह कोई काल्पनिक कथा नहीं बल्कि जीवन का नग्न यथार्थ है। शीर्षक यह भी इशारा करता है कि यह प्रसंग इतना आम नहीं अत: इसे सामान्य कथा कहना भी ग़लत है।
इस लघुकथा की एक विशेषता यह है कि वृद्धावस्था में माता-पिता की उपेक्षा को लेकर प्रायः संतान को ही कठघरे में खड़ा किया जाता है। अधिकांश कथाएँ संतान की निष्ठुरता और कर्तव्यहीनता पर ही केंद्रित रहती हैं। लेकिन यहाँ लेखक ने पारंपरिक दृष्टिकोण को तोड़ते हुए संतान की विवशता और उसकी असमर्थता को भी उतनी ही ईमानदारी से उजागर किया है। दीपक का चरित्र किसी निर्दयी बेटे का नहीं, बल्कि एक ऐसे संघर्षरत मनुष्य का प्रतीक है जो अपनी परिस्थितियों से जकड़ा हुआ है। उसके व्यंग्य, उसकी तल्ख़ी और उसकी अंततः टूटन सब उसी असहाय स्थिति का बयान हैं जिसमें आज का आम युवा घिरा हुआ है। इस दृष्टि से यह लघुकथा महज़ एक पारिवारिक टकराव नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का गहन दस्तावेज़ बन जाती है। यह नवाचार केवल कथा की विषयवस्तु को नया आयाम नहीं देता, बल्कि पाठक को भी इस प्रश्न से दो-चार कराता है कि क्या माता-पिता की दुर्दशा के लिए केवल संतान ही दोषी है या परिस्थितियों और पीढ़ीगत असंतुलन का भी उतना ही योगदान है। यही दृष्टि इसे विशिष्ट और दीर्घजीवी बनाती है।
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4. बिना नाल का घोड़ा/ बलराम अग्रवाल
उसने देखा कि आफ़िस के लिए तैयार होते-होते वह चारों हाथ-पैरों पर चलने लगा है। तैयार होने के बाद वह घर से बाहर निकला। जैसे ही सड़क पर पहुँचा, घोड़े में तब्दील हो गया। अपने-जैसे ही साधारण क़द और काठी वाले चमकदार काले घोड़े में। माँ, पिता, पत्नी और बच्चे—सबको उसने अपनी गरदन से लेकर पीठ तक लदा पाया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, सड़ाक् से एक हंटर उसके पुट्ठे पर पड़ा, ‘‘देर हो चुकी है, दौड़ो…!’’
वह दौड़ने लगा…ठकाठक…ठकाठक…ठकाठक…ठकाठक…।
‘‘तेज़…और तेज़…!’’ ऊपर लदे लोग एक-साथ चिल्लाए।
वह और तेज़ दौड़ा—सरपट।
कुछ ही देर में उसने पाया कि वह ऑफ़िस के सामने पहुँच गया है। ख़िरामाँ-ख़िरामाँ पहले वह लिफ़्ट तक पहुँचा, लिफ़्ट से फ्लोर और फ्लोर से सीट तक। ठीक से सीट पर अभी बैठा भी नहीं था कि पहले-से सवार घरवालों को पीछे धकेलकर बॉस उसकी गरदन पर आ लदा।
‘‘यह सीट पर बैठकर आराम फरमाने का नहीं, काम से लगने-लिपटने का समय है मूरख! दौड़…।’’ उसके पुट्ठों पर, गरदन पर, कनपटियों पर संटी फटकारता वह चीख़ा।
उसने तुरंत दौड़ना शुरू कर दिया—इस फ़ाइल से उस फ़ाइल तक, उस फ़ाइल से उस फ़ाइल तक…लगातार…लगातार…और दौड़ता रहा तब तक, जब तक कि अपनी सीट पर ढह न गया पूरी तरह पस्त होकर। एकाएक उसकी मेज़ पर रखे फोन की घंटी घनघनाई—ट्रिंग-ट्रिंग, ट्रिंग-ट्रिंग…ट्रिंग…!
उसकी आँखें खुल गईं। हाथ बढ़ाकर उसने सिरहाने रखे अलार्म-पीस को बंद कर दिया और सीधा बैठ गया। पैताने पर, सामने उसने माँ को बैठे पाया।
‘‘राम-राम अम्मा!’’ आँखें मलते हुए माँ को उसने सुबह की नमस्ते की, ‘‘पा लागूँ।’’
‘‘जीते रहो!’’ माँ ने कहा, ‘‘तुम्हारी कुंडली कल पंडितजी को दिखाई थी। ग्रह-दशा सुधारने के लिए तुम्हें काले घोड़े की नाल से बनी अँगूठी अपने दाएँ हाथ की उँगली में पहननी होगी।’’
माँ की बात पर वह कुछ न बोला।
‘‘बाज़ार में बहुत लोग नाल बेचते हैं।’’ माँ आगे बोली, ‘‘लेकिन, उनकी असलियत का कुछ भरोसा नहीं है। बैल-भैंसा किसी के भी पैर की हो सकती हैं।… मैं यह कहने को आई थी कि दो-चार जान-पहचान वालों को बोलकर काला-घोड़ा तलाश करो, ताकि असली नाल मिल सके।’’
‘‘नाल पर अब कौन पैसे ख़र्च करता है अम्मा!’’ माँ की बात पर वह कातर-स्वर में बुदबुदाया, ‘‘हंटरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोंके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं…।’’ यह कहते हुए अपने दोनों पैर चादर से निकालकर उसने माँ के आगे फैला दिए, ‘‘लो… देख लो।’’
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बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘बिना नाल का घोड़ा’ एक सशक्त व्यंग्य और यथार्थ की मिश्रित प्रस्तुति है, जो आधुनिक कामकाजी जीवन, पारिवारिक दायित्व और पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर पिसते हुए मध्यवर्गीय व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक अनुभवों को बेहद सजीव और प्रतीकात्मक रूप में चित्रित करती है। यह कथा अपने भीतर रूपक, स्वप्न, यथार्थ और सामाजिक टिप्पणी इन चारों पर्तों को एक साथ समेटे हुए है और यही इसकी सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धि है। बिना नाल का घोड़ा मुख्यतः अस्तित्ववाद के सिद्धांत पर आधारित है। अस्तित्ववाद इस विचार को केंद्र में रखता है कि मनुष्य एक अर्थहीन, कठोर और अक्सर शोषणकारी संसार में स्वयं को पाता है, जहाँ उसे अपने अस्तित्व का भार स्वयं उठाना पड़ता है। कथा का नायक, घोड़े में बदलकर, प्रतीकात्मक रूप से उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसे समाज, परिवार और पूंजीवादी व्यवस्था लगातार श्रम के लिए बाध्य करती है, बिना यह सोचे कि उसकी व्यक्तिगत इच्छाएँ या सुख कहाँ हैं। बिना नाल का रूपक इस बात को और गहरा करता है कि वह सुरक्षा, सुविधा और मानवीय गरिमा से वंचित है, फिर भी उसे निरंतर दौड़ते रहना है। अंतिम दृश्य में अपने पैरों को दिखाना अस्तित्व की उस कठोर सच्चाई का स्वीकार है, जहाँ व्यक्ति अपने संघर्ष और घिसावट को पहचानता है, पर उससे मुक्ति का मार्ग स्पष्ट नहीं दिखता। यह मानवीय जीवन की विडंबना और आत्मचेतना दोनों को उद्घाटित करता है।
कथा की शुरूआत अत्यंत प्रभावशाली है। नायक का तैयार होते होते चारों हाथ-पैरों पर चलने लगना और घर से बाहर निकलते ही घोड़े में तब्दील हो जाना, कथा को तुरंत रूपक और प्रतीक की दुनिया में ले जाता है। यह रूपांतरण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आधुनिक श्रमिक की वास्तविक स्थिति का संकेत है, जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व और मानवीय गरिमा को खोकर मात्र एक श्रम-यंत्र में बदल जाता है। घोड़े का प्रतीक यहाँ दोहरा है। एक ओर यह भार ढोने वाले श्रमिक की छवि है, दूसरी ओर वह जीव जो लगातार दूसरों के आदेशों और चाबुकों के अधीन है। ऊपर लदे परिवारजन, माँ, पिता, पत्नी और बच्चे, इस बात का प्रतीक हैं कि एक आम कामकाजी व्यक्ति केवल कार्यालय के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के आर्थिक, भावनात्मक और सामाजिक बोझ को ढोता है। यह स्थिति भारतीय मध्यवर्ग के लिए विशेष रूप से पहचानी जा सकती है, जहाँ एक व्यक्ति की कमाई पर कई आश्रितों की आजीविका टिकी होती है। परिवार के सदस्यों का तेज़, और तेज़ चिल्लाना यह दर्शाता है कि अपेक्षाओं का दबाव व्यक्ति को आराम करने का अवसर नहीं देता, बल्कि लगातार गति और उत्पादकता की माँग करता है। इसके बाद बॉस का दृश्य कथा की तीव्रता और बढ़ा देता है। बॉस का घरवालों को पीछे धकेलकर उसकी गर्दन पर सवार होना और संटी फटकारते हुए काम में झोंक देना, पूंजीवादी कार्य-संस्कृति की निर्दयता और शोषण का स्पष्ट रूपक है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बॉस और परिवार के बीच कोई मूल्यगत अंतर नहीं दिखाया गया है। दोनों ही श्रमिक से केवल और केवल श्रम की अपेक्षा रखते हैं, चाहे वह थकान, दर्द या मानसिक संताप की स्थिति में हो।
लघुकथा का पहला खंड एक अनवरत गति और तनाव से भरा हुआ है। ठकाठक की ध्वनि, सरपट दौड़, फ़ाइल से फ़ाइल तक का भागना, ये सब मिलकर पाठक को उसी थकान में डाल देते हैं जिसमें नायक स्वयं है। यहीं लेखक की चित्रात्मकता और ध्वन्यात्मक प्रयोग की शक्ति स्पष्ट होती है। इसके बाद स्वप्नभंग का दृश्य आता है। फोन की घंटी के साथ जागना और माँ की उपस्थिति में लौट आना न केवल कथा की गति को धीमा करता है, बल्कि पाठक को यह आभास भी देता है कि घोड़े का अनुभव एक स्वप्न था, हालाँकि उसका यथार्थ से गहरा नाता है। माँ का संवाद, जिसमें वह काले घोड़े की नाल से बनी अँगूठी पहनने की सलाह देती हैं, भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास और ग्रह-नक्षत्र आधारित समाधान-मानसिकता पर व्यंग्य करता है। यहाँ विडंबना यह है कि माँ असली नाल के लिए असली घोड़ा तलाशने की बात करती हैं, जबकि नायक पहले ही बिना नाल का घोड़ा बन चुका है। कथा का चरम बिंदु इसकी पंचलाइन के रूप में अंतिम संवाद में आता है, जब नायक कहता है कि अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोके ही घोड़ों को घिस रहे हैं और अपने दोनों पैर माँ के आगे फैला देता है। यह दृश्य पूरे रूपक को मूर्त कर देता है। नायक के पैर उस थकान, घिसावट और मानवीय क्षरण के साक्ष्य हैं, जो रोज़मर्रा के शोषण से पैदा होती है। लो, देख लो कहना केवल माँ से नहीं, बल्कि पूरे समाज से एक मूक प्रतिवाद है।
कथा की संरचना में दो स्पष्ट खंड हैं, पहला स्वप्न या रूपक का, और दूसरा यथार्थ या संवाद का। इन दोनों के बीच का संक्रमण सहज है, जिससे कथा न तो पूरी तरह काल्पनिक लगती है, न ही केवल यथार्थवादी, बल्कि दोनों का मिश्रण इसे गहरी प्रतीकात्मकता प्रदान करता है। भाषा का प्रवाह सरल, किंतु प्रभावशाली है। ध्वनियों का प्रयोग, जैसे ठकाठक और ट्रिंग-ट्रिंग, वातावरण को जीवंत करता है। संवाद पात्रानुकूल हैं और कथा के भाव को सीधे स्पर्श करते हैं। थीम की दृष्टि से यह लघुकथा कई स्तरों पर पढ़ी जा सकती है। यह एक श्रमिक के शोषण की कथा है, मध्यवर्गीय पारिवारिक दबाव की कहानी है, अंधविश्वास और आर्थिक यथार्थ का टकराव है, तथा मानवीय गरिमा के क्षरण का दस्तावेज़ है। बिना नाल की स्थिति केवल घोड़े के लिए नहीं, बल्कि उस हर व्यक्ति के लिए है जो बिना किसी सुरक्षा या सुविधा के लगातार श्रम करता है, जब तक कि उसका शरीर और मन पूरी तरह घिस न जाए।
कलात्मक दृष्टि से, कथा की सबसे बड़ी ताक़त इसकी प्रतीकात्मकता है। घोड़े का रूपांतरण, लदे हुए लोग, बॉस का सवार होना, और अंत में पैर दिखाने का दृश्य, ये सब पाठक के मन में गहरे अंकित हो जाते हैं। साथ ही, कथा में एक सतत् व्यंग्यात्मक लहजा मौजूद है, जो इसे केवल त्रासदी नहीं बनने देता, बल्कि सामाजिक संरचनाओं पर तीखा प्रश्नचिह्न भी खड़ा करता है। यह लघुकथा मुख्यतः करुण रस पर आधारित है। करुण रस का मूल भाव शोक है, और कथा का केंद्रीय पात्र पूरे घटनाक्रम में एक ऐसी स्थिति से गुज़रता है, जिसमें उसके श्रम, घिसावट और मानवीय असहायता का चित्रण अत्यंत मार्मिक रूप में होता है। घोड़े में रूपांतरण, परिवार और बॉस का बोझ, लगातार दौड़ते रहने की विवशता, ये सभी प्रसंग पाठक के भीतर गहरी सहानुभूति और दुख उत्पन्न करते हैं। स्वप्न से जागने के बाद भी उसकी वास्तविकता नहीं बदलती, बल्कि माँ के संवाद के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि उसकी थकान और घिसावट स्थायी है। बिना नाल का रूपक करुण रस को और तीव्र करता है, क्योंकि यह उस सुरक्षा और देखभाल की कमी को दर्शाता है जो किसी भी श्रमिक के लिए न्यूनतम होनी चाहिए। अंतिम पंक्तियों में पैरों को आगे बढ़ाना न केवल शारीरिक थकान का प्रमाण है, बल्कि जीवनभर की पीड़ा और अवसाद का मूक चित्र भी है, जो पाठक के मन में देर तक गूँजता रहता है।
यह लघुकथा अपने क्रमिक विकास और बुनावट के कारण विशेष रूप से प्रभावशाली बनती है। कथा की शुरूआत यथार्थ और स्वप्न की धुँधली रेखा से होती है, जब नायक को अचानक लगता है कि वह चारों हाथ पाँवों पर चल रहा है और फिर घोड़े में तब्दील हो जाता है। यह आरंभ ही पाठक को असामान्य अनुभव की ओर खींच लेता है। इसके बाद धीरे-धीरे कथा का विकास उस दिशा में होता है जहाँ परिवारजन, पत्नी और बच्चे, पिता और माँ तक उसकी पीठ पर सवार हो जाते हैं। यह क्रमिक बोझ पहले व्यक्तिगत स्तर पर आता है और फिर सामाजिक आर्थिक संरचना का रूप ले लेता है। ऑफ़िस पहुँचने पर बॉस का उसकी गरदन पर चढ़ जाना इस विकास का चरम है, जहाँ नायक का श्रम और अस्तित्व पूरी तरह मशीननुमा बना दिया जाता है। कथा की बुनावट इस तरह की है कि उसमें प्रतीक और यथार्थ सहजता से गुँथ जाते हैं। दौड़ते घोड़े की ठक-ठक, हंटर की चोट, बॉस की फटकार, ये सब प्रतीकात्मक हैं लेकिन वे किसी भी श्रमिक या नौकरीपेशा व्यक्ति के वास्तविक जीवन की तस्वीर भी हैं। स्वप्न और यथार्थ के बीच का यह आवागमन कथा की संरचना को परतदार बनाता है और पाठक को गहरे तक सोचने के लिए बाध्य करता है। अंत में जब सपना टूटता है और माँ का धार्मिक कर्मकांड सामने आता है, तो पूरा कथ्य सामाजिक आर्थिक शोषण के साथ-साथ सांस्कृतिक अंधविश्वास पर भी प्रहार कर देता है। यह क्रमिक विकास कथा को साधारण-से असाधारण बनाता है और उसकी बुनावट को अद्वितीय।
भाषिक संरचना पर दृष्टि डालें तो यह कथा संक्षिप्त, सघन और प्रभावकारी भाषा की मिसाल है। लेखक ने छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया है जो न केवल गति बनाए रखते हैं बल्कि दौड़ते घोड़े की लयात्मक ध्वनि का आभास भी कराते हैं। ‘ठकाठक ठकाठक,’ ‘दौड़ सरपट,’ ‘लो देख लो’ जैसे वाक्य ध्वन्यात्मकता और दृश्यात्मकता दोनों की सृष्टि करते हैं। संवाद चुस्त और सीधे हैं, जिनमें अनावश्यक विस्तार नहीं है। भाषा का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष उसका प्रतीकात्मक होना है। घोड़ा, हंटर, नाल और सवार जैसे शब्द केवल वस्तुगत नहीं रहते, वे पूरे पूँजीवादी समाज और पारिवारिक बोझ का रूपक बन जाते हैं। यही भाषिक संरचना इस कथा को तीखे व्यंग्य और गहरे करुण भाव दोनों से संपन्न करती है।
यह लघुकथा दर्शन शास्त्र के कर्मवाद और अस्तित्ववाद, दोनों ही सिद्धांतों पर आधारित दिखाई देती है। कर्मवाद का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों से बँधा है और जीवन में हर अनुभव उसकी भूमिका का अनिवार्य हिस्सा है। यहाँ नायक का घोड़े में बदल जाना प्रतीक है उस मनुष्य का, जो अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले पिसता है। घरवालों का उसकी पीठ पर लदा होना और दफ़्तर में बॉस का चाबुक चलाना कर्म के उस अविच्छिन्न बंधन का रूपक है, जहाँ जीवन निरंतर श्रम और दबाव की चक्की में पिसता रहता है। वहीं, अस्तित्ववाद की दृष्टि से यह लघुकथा मनुष्य की उस स्थिति को दिखाती है, जहाँ उसका जीवन केवल बाहरी अपेक्षाओं और सामाजिक संरचनाओं का दास बनकर रह जाता है। नायक का सपने से जागना और नाल की बात पर कटाक्ष करना अस्तित्ववाद की उस चेतना की ओर संकेत करता है, जिसमें वह समझता है कि नियति या ग्रह-दशा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढाँचे ही उसके जीवन की कठिनाइयों के असली कारण हैं। इस प्रकार लघुकथा दर्शन की दृष्टि से मनुष्य की पराधीनता और उसके जीवन-संघर्ष को गहरी व्यंजना के साथ सामने लाती है।
यह लघुकथा मुख्यतः करुण रस से ओत-प्रोत है। नायक का घोड़े में बदल जाना, घरवालों और बॉस का बोझ ढोना और अंततः थककर ढह जाना एक ऐसी त्रासदी है जो पाठक को भीतर तक व्यथित करती है। करुण रस यहाँ व्यक्ति की असहायता और श्रम की विवशता से जन्म लेता है। साथ ही इसमें व्यंग्यात्मक तत्त्वों के कारण हास्य-व्यंग्य का एक हल्का प्रवाह भी मौजूद है, जब माँ उसे नाल पहनने की सलाह देती है और वह कटाक्ष करता है कि अब मालिक लोग बिना नाल ही घोड़ों को घिस रहे हैं। यह व्यंग्य पाठक को चौंकाता है और हँसी में भी पीड़ा का बोध कराता है। इसके अतिरिक्त इसमें अद्भुत रस भी देखा जा सकता है क्योंकि इनसान का अचानक घोड़े में बदल जाना और उसपर घर-परिवार तथा बॉस का सवार हो जाना अस्वाभाविक होते हुए भी जीवन की कठोर सच्चाई का प्रतीकात्मक रूप ले लेता है। इस विचित्रता से कथा में गहरा प्रभाव पैदा होता है और यह पाठक के मन में लंबे समय तक बनी रहती है। इस प्रकार यह लघुकथा करुण, व्यंग्य और विचित्र रसों का अद्भुत संयोग प्रस्तुत करती है।
लघुकथा का शीर्षक ‘बिना नाल का घोड़ा’ अत्यंत प्रतीकात्मक और प्रभावशाली है। सामान्यतः नाल घोड़े के पैरों की सुरक्षा और उसकी स्थायित्त्व का प्रतीक होती है, किंतु यहाँ नाल का न होना सीधे उस श्रमिक या आम आदमी की स्थिति को दर्शाता है जो लगातार हंटर और चाबुक के बल पर दौड़ता चला जा रहा है, पर उसे सुरक्षा या संबल कहीं नहीं मिलता। यह शीर्षक केवल नायक की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे श्रमिक वर्ग की स्थिति का रूपक है। शीर्षक की संक्षिप्तता और तीखी प्रहारकता पाठक को तुरंत कथा के गहरे आशय से जोड़ देती है। यहाँ घोड़ा नायक का प्रतीक है और नाल उसकी गरिमा और सुरक्षा का, जिसका अभाव उसे असुरक्षित और शोषित बनाता है। इस प्रकार शीर्षक केवल कथा का नाम नहीं, बल्कि उसका निचोड़ है जो व्यंग्य और करुणा को एक साथ समेटे हुए है और लंबे समय तक स्मृति में बना रहता है।
इसकी पंचलाइन, ‘हंटरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोंके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं… लो… देख लो।’ पूरे कथ्य का सार है। कथा में नायक का स्वप्न उसकी वास्तविक जीवन स्थितियों का रूपक है, और अंत में जब वह अपने पैरों को माँ के आगे फैलाकर यह बात कहता है, तब कथा एक तीखे यथार्थ-बोध के साथ समाप्त होती है। पंचलाइन केवल व्यक्तिगत थकान और शोषण का बयान नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है। यह पंचलाइन पाठक को झकझोर देती है क्योंकि इसमें एक साथ करुणा, व्यंग्य और विद्रोह का स्वर है। यही कारण है कि यह लघुकथा अपने अंतिम वाक्य से स्मृति में अटकी रह जाती है और हर पाठक को अपने जीवन और समाज की कठोर सच्चाइयों पर गहन चिंतन करने को बाध्य करती है।
कुल मिलाकर बिना नाल का घोड़ा आज के कामकाजी जीवन का ऐसा रूपक है, जिसमें नायक अकेला नहीं, बल्कि अनगिनत लोग ख़ुद को देख सकते हैं। यह कथा उन सभी के लिए आईना है जो सुबह से रात तक अपने-अपने मालिकों और सवारों को ढोते रहते हैं और फिर भी अपने पैरों पर जमी घिसावट को केवल चुपचाप देख सकते हैं। बलराम अग्रवाल ने इस लघुकथा में प्रतीक और यथार्थ का जो संतुलन रचा है, वह इसे समकालीन हिंदी-लघुकथा में एक स्मरणीय स्थान देता है।
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5. शिखर/ माधव नागदा
मगध और रोमा एक-दूसरे को ख़ूब पसंद करते थे। मगध अक्सर रोमा के यहाँ पहुँच जाता। फिर तो वक़्त का पता ही नहीं चलता। घंटों बातें करते रहते । रोमा थी ही ऐसी । मगध मुग्ध था। उसे रोमा की एक-एक हरकत में कई-कई मोहक अदाओं के दर्शन होते। वह अपना आपा खोने लगता। उसका जी चाहता कि सारे शिष्टाचार को भुलाकर वह रोमा को बाँहों में कस ले। होठों को चूम ले और अगर रोमा की स्वीकृति हो तो इससे आगे भी बढ़ चले।
परंतु इतनी घनिष्ठता के बावजूद, रोमा और मगध के बीच झिझक की पतली झिल्ली बरक़रार थी। मगध को विश्वास था कि यदि साहसपूर्वक इस झिल्ली को तोड़ दिया जाए तो रोमा को हासिल किया जा सकता है। रोमा जैसी सुंदरी को । उस दिन जब दोनों के मध्य बहुत ही आत्मीय क्षण तैर रहे थे, मगध ने अपना अभीप्सित प्राप्त करने की चेष्टा की। थरथराते होठों से बोला, ‘रोमा, अगर मैं तुमसे कोई चीज़ माँगूँ तो दोगी? बुरा तो नहीं मानोगी?’
‘ओह मगध! यह भी कोई पूछने की बात है? तुम्हारे लिए मैं प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार हूँ।’ रोमा ने संजीदगी से जवाब दिया ।
मगध को ऐसे जवाब की तनिक भी आशा नहीं थी। वह देखता रह गया। उसे लगा कि रोमा बहुत ऊँचाइयों पर खड़ी है।
‘बोलो, क्या माँगते हो?’ रोमा की गहरी आवाज़ आई।
मगध कुछ नहीं बोल सका। उसने हौले-से रोमा का हाथ थाम लिया । उसे लगा कि वह ऊँचा उड़ता जा रहा है। शिखर की ओर। शरीर को पार करता हुआ, प्राणों की ओर। वह भूल गया कि उसे क्या माँगना था?
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माधव नागदा की लघुकथा शिखर मानवीय संबंधों में निहित सूक्ष्म मनोविज्ञान, भावनाओं की पर्तें और आत्मसंयम के सौंदर्य को बारीकी से पकड़ने वाली रचना है। आकार में लघु होते हुए भी यह कथा अपने संकेतों, आंतरिक द्वंद्व और अंतर्निहित प्रतीकवाद के कारण एक व्यापक अनुभव देती है। कथानक की सतह पर देखें तो यह एक स्त्री-पुरुष के आकर्षण, सान्निध्य और संभावित अंतरंगता की कहानी है, परंतु गहराई में उतरते ही यह रचना संबंधों की गरिमा, आत्मनियंत्रण और भावनात्मक ऊँचाई के शिखर की खोज में बदल जाती है। मगध और रोमा का संबंध सहज आत्मीयता और पारस्परिक आकर्षण से बुना हुआ है। लेखक ने आरंभ में ही मगध की दृष्टि से रोमा का चित्रण करते हुए उस आकर्षण को मूर्त कर दिया है कि हरकतों में छिपी मोहक अदाएँ, शिष्टाचार की सीमाएँ तोड़ने की चाह और उस चाह के साथ मौजूद झिझक। यह झिझक केवल सामाजिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक सीमा का प्रतीक है, जिसे पार करना दोनों के संबंधों की प्रकृति को बदल सकता है।
कथा का केंद्रीय बिंदु वह क्षण है, जब मगध अपने मन की इच्छा व्यक्त करने के लिए पहल करता है। ‘अगर मैं तुमसे कोई चीज़ माँगूँ तो दोगी?’ यह प्रश्न अपने आपमें संकेतों और संभावनाओं से भरा है। रोमा का उत्तर, ‘तुम्हारे लिए मैं प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार हूँ’, कथानक को एक अप्रत्याशित ऊँचाई देता है। यह उत्तर न केवल मगध को अचंभित करता है, बल्कि उसे यह अहसास भी कराता है कि रोमा की सोच और समर्पण का स्तर भौतिक आकर्षण से कहीं ऊपर है। यहाँ लेखक ने रोमा के चरित्र को एक नैतिक और भावनात्मक शिखर पर स्थापित किया है, जहाँ उसका ‘हाँ’ किसी भी साधारण इच्छा के लिए नहीं, बल्कि किसी उच्चतर उद्देश्य के लिए है। मगध का रोमा के हाथ को हल्के-से थाम लेना और उस क्षण में अपने मूल उद्देश्य को भूल जाना कथा का भावनात्मक चरम है। यह क्रिया किसी शारीरिक सीमा को पार करने से अधिक आत्मिक स्पर्श का संकेत है। वह भूल जाता है कि उसे क्या माँगना था, क्योंकि उस क्षण उसकी चेतना भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठकर किसी ऊँचे, निर्मल अनुभव से भर जाती है। यही अनुभव कथा के शीर्षक शिखर का वास्तविक अर्थ प्रकट करता है, यह शिखर केवल प्रेम या आकर्षण का नहीं, बल्कि आत्मसंयम, परिष्कृत भावनाओं और पारस्परिक सम्मान का है। कथा की सबसे बड़ी शक्ति इसकी भाषा और लय है। माधव नागदा ने संवादों को संक्षिप्त, सटीक और अर्थगर्भित रखा है। हर पंक्ति कथा की गति और भावनात्मक वातावरण को आगे बढ़ाती है। ‘थरथराते होंठ’, ‘गहरी आवाज़’, ‘हौले-से हाथ थाम लेना’ ये बिंब दृश्यात्मकता के साथ-साथ पात्रों की आंतरिक अवस्था को मूर्त कर देते हैं।
संरचना की दृष्टि से, कथा एक साधारण-से प्रसंग को लेकर उसे भावनात्मक उत्कर्ष तक ले जाती है। प्रारंभिक आकर्षण से लेकर अंतिम आत्मिक उन्नयन तक का यह सफ़र क्रमबद्ध है और कहीं भी अनावश्यक मोड़ नहीं लेता। यही सघनता इसे लघुकथा की परिभाषा के अनुरूप पूर्ण बनाती है। थीम के स्तर पर, शिखर आधुनिक संबंधों की उस दुर्लभ अवस्था को रेखांकित करती है, जहाँ भावनाओं का गाढ़ापन शारीरिकता से अधिक महत्त्व रखता है। यह एक प्रकार का आदर्श भी प्रस्तुत करती है कि प्रेम का सर्वोच्च रूप वही है, जिसमें सम्मान और आत्मनियंत्रण हो। मगध का अपने मूल उद्देश्य को भूल जाना हार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जीत है, एक ऐसी जीत, जो उसे और रोमा, दोनों को, संबंधों की एक नई ऊँचाई पर पहुँचा देती है।
लघुकथा शिखर का मनोवैज्ञानिक पक्ष प्रेम संबंधों के भीतर छिपे आकर्षण, झिझक और आत्मीयता की जटिलताओं को उद्घाटित करता है। कथा में मगध का मनोविज्ञान दो पर्तों में दिखाई देता है। पहली पर्त वह है जहाँ वह रोमा की सुंदरता, उसकी अदाओं और उसकी निकटता से प्रभावित होकर उसे पाना चाहता है। उसकी इच्छा मूलतः शारीरिक है, जो स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति का परिणाम है। वह अपने भीतर उस झिल्ली को तोड़ने का साहस खोज रहा है जो अब तक उसे रोक रही है। यहाँ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उसके भीतर दबी हुई दबी हुई वासना और साहस के बीच का द्वंद्व स्पष्ट होता है। दूसरी पर्त में अचानक परिवर्तन आता है जब रोमा अपने समर्पण की ऊँचाई को व्यक्त करती है। “प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार हूँ” जैसे शब्द मगध की चेतना को झकझोर देते हैं। वह देखता है कि रोमा की भावभूमि केवल देह तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मा और प्रेम की ऊँचाइयों तक पहुँची हुई है। यही बिंदु मगध के मनोविज्ञान में क्रांति लाता है। उसकी दृष्टि शारीरिक आकर्षण से हटकर आत्मीयता और प्राणिक स्तर पर पहुँच जाती है। उसे लगता है कि वह केवल रोमा को पाने की इच्छा नहीं रखता, बल्कि उस ऊँचाई को छू रहा है जहाँ प्रेम शुद्ध और आध्यात्मिक हो जाता है। यह कथा दर्शाती है कि प्रेम में आकांक्षाएँ हमेशा देह तक सीमित नहीं रहतीं। जब सामने वाला साथी आत्मीयता और त्याग की चरम सीमा दिखाता है तो व्यक्ति का मनोविज्ञान बदल जाता है और वह शारीरिकता से परे जाकर आत्मा के स्तर पर प्रेम को जीने लगता है। यही मनोवैज्ञानिक रूपांतरण कथा को शिखर बनाता है।
‘शिखर’ का मुख्य भाव शृंगार रस है, किंतु यह रस यहाँ केवल लौकिक या शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं है। इसमें माधुर्य और संयम का विशेष संतुलन है। कथा की शुरूआत में मगध के मन में रोमा के प्रति प्रबल आकर्षण है, जो उसकी हर हरकत में सौंदर्य देखता है और उसके समीप आने की इच्छा करता है। यह प्रारंभिक भाव संपूर्ण शृंगार का आलंबन है, जिसमें शृंगार का स्थायी भाव रति होता है। किंतु कथा का उत्कर्ष इस रति को शारीरिक पराकाष्ठा तक नहीं ले जाता, बल्कि आत्मिक ऊँचाई पर पहुँचा देता है। जब रोमा अपने समर्पण को ‘प्राण तक उत्सर्ग करने’ के स्तर पर रखती है, तो शृंगार रस एक गरिमामय रूप धारण कर लेता है। मगध का अपने मूल उद्देश्य को भूल जाना इस रस को आध्यात्मिक शृंगार के रूप में रूपांतरित करता है, जहाँ प्रेम का शिखर आत्मिक मिलन में है, न कि शारीरिक मिलन में। इस प्रकार, कथा में शृंगार का सौंदर्य संयम और सम्मान से परिपूर्ण होकर पाठक के मन में गहरे संस्कार छोड़ता है।
दर्शनशास्त्र की दृष्टि से देखें तो इस लघुकथा में अद्वैत वेदांत और अस्तित्ववाद दोनों के संकेत मिलते हैं। अद्वैत के अनुसार, सर्वोच्च अनुभव वह है जहाँ आत्मा अपने सीमित, भौतिक अहं को पार करके उच्चतर, एकीकृत चेतना का अनुभव करती है। मगध का क्षणिक रूप से शारीरिक इच्छा से ऊपर उठकर आत्मिक आनंद की अनुभूति करना इसी बोध का प्रतीक है। वह ‘शिखर’ केवल रूप-रंग का नहीं, बल्कि चेतना का शिखर है। अस्तित्ववाद के परिप्रेक्ष्य में देखें तो मगध अपनी स्वतंत्रता और चुनाव के क्षण में है — वह अपनी इच्छा पूरी कर सकता है, किंतु वह उस निर्णय को बदलता है, अपने संबंध को नए अर्थ देने का चुनाव करता है। यह चुनाव उसे ज़िम्मेदारी, सम्मान और आत्मिक परिपक्वता की ओर ले जाता है। रोमा की ‘प्राण तक उत्सर्ग’ वाली बात मगध के लिए मूल्य-बोध का क्षण है, जो उसे आत्मनियंत्रण की ऊँचाई तक पहुँचा देता है। इस प्रकार, यह कथा एक साधारण भावनात्मक प्रसंग को गहन दार्शनिक अर्थ प्रदान करती है, जहाँ ‘शिखर’ आत्मा के उत्थान का प्रतीक बन जाता है। वेदांत के अनुसार, जब मनुष्य देह और इंद्रियों की सीमाओं को पार करके आत्मा की अनुभूति करता है, तभी वह ‘शिखर’ पर पहुँचता है। मगध का अनुभव इसी ‘आत्मिक शिखर’ की झलक है।
इसका वाक्य-विन्यास और भाषिक संरचना अत्यंत सधी हुई और प्रभावकारी है। यह रचना अपने छोटे आकार के बावजूद गहरे भाव और जटिल मनोवैज्ञानिक स्थितियों को सहजता से व्यक्त करती है। इसका बड़ा कारण है लेखक की भाषा का सरल, प्रवाहमयी और संवादप्रधान होना। कथा की शुरूआत ही एक सहज गति से होती है। ‘मगध और रोमा एक-दूसरे को ख़ूब पसंद करते थे।’ यह वाक्य सीधा, सरल और बिना किसी अलंकारिक जटिलता के पात्रों के संबंध को पाठक के सामने रख देता है। यहाँ भाषा में कोई कृत्रिमता नहीं है, बल्कि जीवन के वास्तविक संवादों की सी गंध है। यही यथार्थपरकता कथा को पाठक से सीधे जोड़ देती है। वाक्य-विन्यास में छोटे और लंबे वाक्यों का संतुलन दिखाई देता है। जहाँ मगध की आंतरिक उधेड़बुन और आकर्षण का चित्रण है, वहाँ वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं। उदाहरणस्वरूप ‘उसका जी चाहता कि सारे शिष्टाचार को भुलाकर वह रोमा को बाँहों में कस ले, होठों को चूम ले और अगर रोमा की स्वीकृति हो तो इससे आगे भी बढ़ चले।’ यह वाक्य उसकी आकांक्षा और आवेग को लयात्मक ढंग से प्रकट करता है। इसके विपरीत, जहाँ निर्णयात्मक क्षण आते हैं, वहाँ छोटे और सटीक वाक्य प्रयोग हुए हैं। जैसे ‘उसने हौले-से रोमा का हाथ थाम लिया।’ यह संक्षिप्त वाक्य पूरे कथानक को एक ऊँचाई पर पहुँचा देता है।
इस लघुकथा का एक विशिष्ट गुण इसका क्रमिक विकास है। कथा की शुरूआत साधारण मानवीय आकर्षण और सहज घनिष्ठता से होती है, जहाँ मगध रोमा की सुंदरता और उसकी निकटता से मुग्ध है। धीरे-धीरे यह आकर्षण बढ़कर इच्छा और आकांक्षा का रूप लेता है, जो उसे झिझक तोड़ने के लिए प्रेरित करता है। यह दूसरा चरण है, जहाँ मानवीय संबंध का आधार शारीरिक आकांक्षा बनता दिखता है। लेकिन कथा का वास्तविक विकास तब होता है जब रोमा अपने उत्तर से मगध के लिए एक ऊँचाई रच देती है। ‘प्राण तक उत्सर्ग करने’ जैसी बात सुनकर मगध की दृष्टि स्थूल से सूक्ष्म की ओर उठती है। यही क्षण उसके मनोविज्ञान का रूपांतरण कर देता है और वह देह से ऊपर आत्मा की ओर उड़ने लगता है। इस क्रमिक विकास की प्रक्रिया कथा को साधारण प्रेमकथा से उठाकर एक गहन और शाश्वत मानवीय अनुभव बना देती है।
भाषिक संरचना में कहीं भी अनावश्यक जटिलता नहीं है। लेखक ने साधारण शब्दों का प्रयोग करके गहरी भावनाओं को उकेरा है। ‘थरथराते होंठ,’ ‘गहरी आवाज़,’ ‘ऊँचा उड़ता जा रहा है’ जैसे शब्द संयोजन संवेदनाओं को पाठक के सामने मूर्त रूप में रखते हैं। यहाँ भाषा भावनाओं का सहचर बन जाती है, सजावट का उपकरण नहीं। संवादों की भाषा भी उल्लेखनीय है। रोमा का यह कहना ‘तुम्हारे लिए मैं प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार हूँ’ कथा की चरम ऊँचाई पर पाठक को ले जाता है। इस संवाद की सादगी ही उसका प्रभाव है। इसमें कोई दार्शनिकता या अलंकारिक बोझ नहीं, बल्कि सीधा सरल समर्पण का भाव है। कुल मिलाकर शिखर की भाषिक संरचना और वाक्य-विन्यास इस बात का प्रमाण हैं कि लघुकथा अपनी सटीकता, संक्षिप्तता और प्रवाहपूर्ण भाषा से गहनतम भावनाएँ व्यक्त कर सकती है। भाषा की यह सादगी और वाक्य संरचना की कसावट ही कथा को ऊँचाई देती है और उसके भावनात्मक तथा मनोवैज्ञानिक प्रभाव को स्थायी बनाती है।
अंततः, शिखर एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे लघुकथा सीमित शब्दों में भी गहन मानवीय भावनाओं को व्यक्त कर सकती है। यह रचना पाठक को न केवल मगध और रोमा के क्षण में सहभागी बनाती है, बल्कि उसे यह सोचने पर भी विवश करती है कि संबंधों का सच्चा शिखर कहाँ है, भौतिक उपलब्धि में या आत्मिक उन्नयन में। यही इस कथा की साहित्यिक और भावनात्मक उपलब्धि है।
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6. सूअर/ रमेश बत्तरा
वे हो-हल्ला करते हुए एक पुरानी हवेली में जा पहुँचे। हवेली के अहाते में सभी घरों के दरवाजे बंद थे, सिर्फ एक कमरे का दरवाज़ा खुला था। सब दो-दो, तीन-तीन में बँटकर दरवाज़े तोड़ने लगे और उनमें से दो जने उस खुले कमरे में घुस गए।
कमरे में एक ट्रांजिस्टर हौले-हौले बज रहा था और एक आदमी खाट पर सोया हुआ था।
“यह कौन है?” एक ने दूसरे से पूछा।
“मालूम नहीं,” दूसरा बोला, “कभी दिखाई नहीं दिया मुहल्ले में।”
“कोई भी हो,” पहला ट्रांजिस्टर समेटता हुआ बोला, “टीप दो गला!”
“अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?”
“पूछ लेते हैं इसी से।” कहते-कहते उसने उसे जगा दिया।
“कौन हो तुम?”
वह आँखें मलता, नींद में ही बोला, “तुम कौन हो?”
“सवाल-जवाब मत करो। जल्दी बताओ, वरना मारे जाओगे।”
“क्यों मारा जाऊँगा?”
“शहर में दंगा हो गया है।”
“क्यों… कैसे?”
“मस्जिद में सूअर घुस आया।”
“तो नींद क्यों खराब करते हो भाई! रात की पाली में कारखाने जाना है।” वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, “यहाँ क्या कर रहे हो?… जाकर सूअर को मारो न!”
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स्व. रमेश बत्तरा की लघुकथा सूअर एक सशक्त और मार्मिक सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है, जो दंगे, सांप्रदायिकता और भीड़-मानसिकता के भीतर छिपी हुई विसंगतियों को बेहद तीखी और प्रतीकात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। यह लघुकथा आकार में छोटी होते हुए भी अपने प्रभाव में गहरी है, और यह गहराई मुख्यतः इसके वातावरण-निर्माण, संवाद-शैली और अंत में आने वाली तीखी पंचलाइन से उत्पन्न होती है। कथानक सरल है, पर उसमें निहित भाव और संदेश जटिल। भीड़ एक पुरानी हवेली में घुसती है, जिसमें सभी दरवाज़े बंद हैं, सिवाय एक कमरे के। भीड़ का रवैया शुरू से ही हिंसक और संदेहपूर्ण है। वे दरवाज़े तोड़ते हैं, लूट-पाट के भाव में हैं और जैसे ही खुले कमरे में पहुँचते हैं, वहाँ सोए व्यक्ति के प्रति उनकी भाषा और सोच स्पष्ट रूप से हिंसा से भरी हुई है। “टीप दो गला” जैसे वाक्य केवल हत्या की मंशा नहीं दिखाते, बल्कि भीड़-मानसिकता की निर्ममता का सटीक प्रतीक बन जाते हैं, जिसमें व्यक्ति की पहचान, निर्दोषता या परिस्थिति का कोई महत्व नहीं रह जाता। भीड़ का अगला प्रश्न, “अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?” कथा को सांप्रदायिक विभाजन की दिशा में ले जाता है। यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भीड़ के नैतिक पैमाने को उजागर करती है; हिंसा उनके लिए स्वीकार्य है, बशर्ते कि शिकार ‘अपनी जाति’ का न हो। यह सोच इस विडंबना को रेखांकित करती है कि इनसान की हत्या का औचित्य केवल उसकी जाति, धर्म या पहचान पर आधारित कर दिया जाता है। नायक (या कहें सोया हुआ व्यक्ति) के साथ भीड़ का संवाद काफ़ी रोचक और वास्तविक है। उसकी पहली प्रतिक्रिया, “तुम कौन हो?” एक उल्टा प्रश्न है, जो न केवल जिज्ञासा बल्कि भय और संदेह के माहौल में पैदा होने वाले उलझाव को भी दिखाता है। जब भीड़ उसे बताती है कि “शहर में दंगा हो गया है” और “मस्जिद में सूअर घुस आया”, तो यह सूचना अचानक से पूरी कथा के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को स्पष्ट कर देती है। यह एक क्लासिक दंगाई अफ़वाह है, जो हिंसा और द्वेष को भड़काने के लिए प्रयुक्त होती रही है। यहाँ पर लेखक का कौशल यह है कि वह इस घटना को बिना किसी नाटकीय विस्तार के, सीधी और सटीक भाषा में रखता है, जिससे उसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है।
कथा का चरम और सबसे यादगार हिस्सा इसका अंत है, यानी पंचलाइन। सोया हुआ व्यक्ति कहता है, “तो नींद क्यों ख़राब करते हो, भाई! रात की पाली में कारख़ाने जाना है… यहाँ क्या कर रहे हो? जाकर सूअर को मारो न!” यह वाक्य कई स्तरों पर व्याख्यायित हो सकता है। एक स्तर पर, यह आम आदमी की थकान, उदासीनता और बेगानी-सी लाचारी को दिखाता है। वह दंगे, अफ़वाह और हिंसा के इस उन्माद में भी अपने व्यक्तिगत जीवन और रोज़गार को प्राथमिकता दे रहा है। दूसरे स्तर पर, यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। वह यह भी कह रहा है कि अगर दंगे का कारण सूअर है, तो उसी को निपटाओ, निर्दोष लोगों को क्यों निशाना बना रहे हो। तीसरे स्तर पर, यह पंक्ति भीड़ की सोच पर सीधा वार है। यह याद दिलाती है कि असली समस्या किसी व्यक्ति या समुदाय में नहीं, बल्कि उस ‘सूअर’ में है जो प्रतीकात्मक रूप से अफ़वाह, नफ़रत और हिंसा का जनक है। इस पंचलाइन की ताक़त इसकी सादगी और अप्रत्याशितता में है। पूरी कथा का माहौल तनावपूर्ण और हिंसक है, लेकिन अंत में एक सीधा, लगभग साधारण-सा वाक्य इस तनाव को एक तीखे व्यंग्य में बदल देता है। यह पाठक के मन में एक झटका पैदा करता है, जैसे किसी ने अचानक सच को सामने रख दिया हो।
भाषा की दृष्टि से, कथा में संवाद-प्रधान संरचना अपनाई गई है, जो इसे जीवंत और गतिशील बनाती है। संवाद छोटे, चुटीले और पात्रों की मानसिकता को उजागर करने वाले हैं। “टीप दो गला” या “अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?” जैसे वाक्य न केवल पात्रों के मानस को खोलते हैं, बल्कि यथार्थ का एक कड़वा चित्र भी प्रस्तुत करते हैं। संरचना की दृष्टि से, कथा दो भागों में बँटी है। पहला भाग भीड़ के प्रवेश और सोए व्यक्ति को पहचानने का है, दूसरा भाग संवाद और पंचलाइन का। यह विभाजन स्वाभाविक है और कथा की गति को बनाए रखता है। लेखक ने किसी भी प्रकार की अनावश्यक व्याख्या या वर्णन से बचते हुए सीधे घटना और संवाद पर ध्यान केंद्रित किया है। थीम की दृष्टि से, यह लघुकथा भीड़-मानसिकता, सांप्रदायिकता, अफ़वाह, हिंसा और आम आदमी की स्थिति जैसे गंभीर मुद्दों को छूती है। विशेष रूप से, यह दिखाती है कि कैसे हिंसा का औचित्य अक्सर जाति, धर्म और अफ़वाहों पर आधारित होता है, और कैसे असली कारण से निपटने के बजाय निर्दोषों को निशाना बनाया जाता है। कलात्मक दृष्टि से, इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह बिना उपदेश दिए, बिना भारी-भरकम भाषा के, अपने संदेश को प्रभावी ढंग से पहुँचा देती है। इसका असर इसलिए भी गहरा है क्योंकि यह पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भीड़ की तरह असली समस्या से नज़रें चुराकर ग़लत लक्ष्य पर हमला करते हैं।
लघुकथा में ‘सूअर’ को बहु-स्तरीय प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है, जो केवल दंगे का बहाना भर नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और मानसिक विकारों का प्रतिनिधित्व करता है। यह भीड़-मानसिकता का प्रतीक है, जहाँ व्यक्ति का विवेक सामूहिक उन्माद में डूब जाता है और वह बिना तथ्यों की पुष्टि किए हिंसक हो उठता है। यह पूर्वाग्रह और विभाजनकारी सोच का भी द्योतक है, जिसमें किसी की जान का मूल्य उसकी जाति या धर्म से तय होता है। ‘सूअर’ जिम्मेदारी से पलायन का प्रतीक भी है, जब लोग असली कारण से निपटने की बजाय आसान और गलत लक्ष्य चुन लेते हैं। यह नैतिक पतन की उस स्थिति को भी दर्शाता है, जहाँ निर्दोष पर हिंसा करने में हिचकिचाहट नहीं होती। अंततः, यह विवेकहीन क्रूरता का रूपक है, जिसमें सही-गलत का भेद मिट जाता है। कथा की पंचलाइन ‘जाकर सूअर को मारो न!’ इसी मानसिकता को जड़ से खत्म करने का सीधा और साहसिक आह्वान है, जिससे असली समस्या पर प्रहार हो सके।
लघुकथा सूअर मुख्यतः वीभत्स रस और व्यंग्यात्मक करुण भाव के सम्मिश्रण पर आधारित है। कथा में जो दृश्य है, उसमें भीड़ की हिंसक मंशा, जातिगत पहचान के आधार पर हत्या करने की मानसिकता, और निर्दोष व्यक्ति को मारने की तत्परता वीभत्स रस का निर्माण करती है। वीभत्स रस का स्थायी भाव घृणा है, और पाठक को भीड़ के व्यवहार, उनकी भाषा और सोच से यही भाव अनुभव होता है। साथ ही, कथा की पृष्ठभूमि में दंगा, अफ़वाह और सांप्रदायिक उन्माद है, जो घृणा और अस्वीकृति की भावना को और तीव्र करता है। पंचलाइन में आने वाला व्यंग्य इस रस को नया आयाम देता है। पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली समस्या उस ‘सूअर’ में है, न कि निर्दोष इनसान में। इस तरह कथा का रस केवल घृणा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी खड़े करता है, जो इसे सामान्य वीभत्स चित्रण से ऊपर ले जाता है। इस लघुकथा को दर्शनशास्त्र में मुख्यतः अस्तित्ववाद के भाव से जोड़ा जा सकता है। अस्तित्ववाद यह मानता है कि मनुष्य का जीवन मूलतः असुरक्षित, अनिश्चित और निरर्थक परिस्थितियों में फँसा हुआ है, जहाँ उसे अपने चुनाव और कर्मों के परिणाम स्वयं भुगतने होते हैं। कथा में सोया हुआ व्यक्ति दंगे, अफ़वाह और भीड़ की हिंसा के बीच है, पर उसका दृष्टिकोण व्यावहारिक और आत्मकेंद्रित है। वह अपने श्रम, समय और थकान को प्राथमिकता देता है। उसके लिए बाहरी उन्माद से अधिक महत्वपूर्ण अपनी रोज़ी और रात की पाली है। अंत में उसका यह कहना, “जाकर सूअर को मारो न!” अस्तित्ववादी दृष्टि से यह दिखाता है कि मनुष्य अराजकता में भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अर्थ और तर्क खोजने की कोशिश करता है। यहाँ वह असली समस्या (सूअर) और झूठे लक्ष्य (निर्दोष लोगों पर हमला) के बीच स्पष्ट भेद करता है, जो अस्तित्ववाद के व्यक्तिगत निर्णय और ज़िम्मेदारी के सिद्धांत से मेल खाता है।
अंततः, सूअर एक ऐसी लघुकथा है जो अपनी तीखी पंचलाइन और बिना लाग-लपेट के कही गई सच्चाई के कारण लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती है। यह न केवल साहित्यिक दृष्टि से सफल है, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है। इसमें लेखक ने जो प्रतीक और व्यंग्य का संतुलन साधा है, वह समकालीन हिंदी-लघुकथा में इसे विशिष्ट स्थान दिलाता है और इसे चिरजीवी बनाता है।
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7. इक्कीस जूते/ रामकुमार आत्रेय
बादशाह ने ढिंढोरा पिटवाया कि उसने अपने पूरे राज्य में ऐसे अवसर उत्पन्न कर दिए हैं कि अब किसी भी व्यक्ति को भूखा नहीं रहना पड़ेगा… पूरा राष्ट्र खुशहाल हो चुका है… यदि कोई व्यक्ति अब भी भूखा रह गया हो तो उसके दरबार में हाज़िर हो जाए ताकि उसके भूखा रह जाने का कारण जानकर इसके लिए उत्तरदायी राजकीय कर्मचारी को दंड दिया जा सके।
ढिंढोरा पिटवाकर बादशाह निश्चिंत हो गया था कि कोई भी भूखा व्यक्ति उसके समक्ष उपस्थित नहीं होगा और उसकी कीर्ति दसों दिशाओं में फैल जाएगी। लेकिन बादशाह के इस सुखद स्वप्न को तोड़ता हुआ एक मरियल-सा व्यक्ति उसके सामने हाथ जोड़े उपस्थित हो गया।
“तुम भूखे हो?” बादशाह ने गुर्राते हुए पूछा।
“जी, मालिक!” गिड़गिड़ाहट भरा स्वर उस व्यक्ति का।
“क्यों… क्यों? आखिर क्यों?” आग की तरह भड़क उठे थे बादशाह।
“मेरी ईमानदारी के कारण, भगवन्!” व्यक्ति ने गर्व के साथ बादशाह से आँखें मिलाते हुए कहा। उसे आशा थी कि बादशाह प्रसन्न होकर उसकी पीठ थपथपाएँगे और पुरस्कार देंगे।
“क्या तुमने मेरे कर्मचारियों को तथा दूसरे लोगों को बेईमानी करते नहीं देखा था? क्या तुमने उन्हें अपनी बेईमानी के कारण पुरस्कृत होते नहीं देखा था?” अगला प्रश्न था बादशाह का।
“हाँ, सरकार, देखा था।”
“क्या तुम्हें किसी ने बेईमानी करने से रोका था?”
“नहीं, प्रभु, नहीं।”
“तो फिर भी बेईमानी करके तूने अपना पेट क्यों नहीं भरा?”
“मैं अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहता हूँ, स्वामी।”
“बहुत अच्छा! फिर तो भूखा रहने के उत्तरदायी तुम स्वयं हो।” फिर अपने मंत्री की ओर उन्मुख होते हुए उसने आदेश दिया, “इस व्यक्ति को इक्कीस जूते लगाए जाएँ, जो कि ईमानदारी व सिद्धांतों जैसी गली-सड़ी चीज़ों से खुद को चिपकाए हुए है।”
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रामकुमार आत्रेय की लघुकथा ‘इक्कीस जूते’ आधुनिक सत्ता और समाज की सबसे तीखी सच्चाई को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखती है। यह कहानी हमें दिखाती है कि किस तरह सत्ता अपने प्रचार और आडंबर में सच्चाई को ढकने का प्रयास करती है और किस प्रकार ईमानदार और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति को व्यवस्था में जगह नहीं मिलती। शिल्प की दृष्टि से कथा अत्यंत सघन और प्रहारक है। लेखक ने घटनाओं को धीरे-धीरे नहीं बल्कि सीधे एक झटके में पाठक के सामने रखा है। ढिंढोरा पिटवाना, दरबार में व्यक्ति का पहुँचना और बादशाह का संवाद, ये तीन ही बिंदु पूरे कथानक को विकसित करते हैं। संवाद शैली अत्यंत जीवंत है और हर संवाद में व्यंग्य की तलवार छिपी हुई है। शैली व्यंग्यप्रधान और यथार्थवादी है। बादशाह की भाषा में घमंड और आडंबर है, वहीं ग़रीब व्यक्ति की भाषा में विनम्रता और गर्व दोनों हैं। लेकिन यह गर्व अंततः उसकी पीड़ा बन जाता है। भाषा सहज और तीक्ष्ण है। छोटे-छोटे वाक्य कथा को धारदार बनाते हैं। संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि एक ऐसी व्यवस्था में जहाँ बेईमानी पुरस्कृत हो रही हो, वहाँ ईमानदारी अपराध मानी जाती है। यह व्यवस्था का विडंबनापूर्ण चेहरा है जो व्यक्ति की नैतिकता को दंडित करती है।
कथा की दृश्यात्मकता भी उल्लेखनीय है। दरबार का दृश्य, बादशाह का ग़ुस्से से लाल चेहरा, ग़रीब व्यक्ति का गिड़गिड़ाता स्वर और अन्त में आदेश देना, ये सब दृश्य पाठक के सामने चलचित्र की तरह उभरते हैं। विशेषकर “इसे इक्कीस जूते लगाए जाएँ” का दृश्य पाठक के मन में गहरे तक चुभ जाता है। यहाँ बादशाह की मानसिकता पूरी तरह सामंती और मुजारावादी है। वह जनता की भूख और पीड़ा को अपनी सत्ता की छवि सुधारने के लिए ढकना चाहता है। उसके लिए ईमानदारी और सिद्धांत किसी काम के नहीं बल्कि उसकी सत्ता के लिए चुनौती हैं। दूसरी ओर ग़रीब व्यक्ति की मानसिकता भी उसी ढाँचे में ढली है। उसने यह मान लिया है कि भूखा रहना पड़े तो रह लेगा लेकिन सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा। यह उसका आत्मगौरव है किंतु उसकी पराधीनता भी है क्योंकि वह सत्ता से दया और ईनाम की आशा करता है। इस मानसिकता का टकराव ही कहानी की मूल शक्ति है।
सामाजिक और राजनैतिक पक्ष इस कथा में गहराई से उभरता है। सामाजिक स्तर पर यह कथा दिखाती है कि समाज में बेईमानी और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। ईमानदार लोग हाशिए पर हैं और उन्हें उपहास या दंड मिलता है। राजनीतिक स्तर पर यह कथा सत्ता की ढोंगपूर्ण राजनीति का पर्दाफ़ाश करती है। बादशाह जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी छवि के लिए योजनाएँ बनाता है। भूख, ग़रीबी और असमानता की वास्तविक समस्या को नज़रअंदाज़ करके सत्ता केवल प्रचार और दिखावे में मग्न है। यह आलोचना सिर्फ़ किसी ऐतिहासिक बादशाह की नहीं बल्कि हर उस शासन और सत्ता की है जो जनता की तकलीफ़ को अनदेखा करती है और अपने हित साधती है।
ग़रीब व्यक्ति भीतर से सिद्धांतनिष्ठ है, उसके लिए ईमानदारी एक आत्मिक सहारा है। लेकिन साथ ही वह सत्ता के सामने गिड़गिड़ाता भी है क्योंकि उसकी परिस्थिति उसे विवश कर देती है। उसका गर्व और उसकी विवशता का यह टकराव गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाई है। दूसरी ओर बादशाह का मन सत्ता के अहंकार और असुरक्षा से भरा है। वह यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसकी व्यवस्था में कोई कमी है। इसलिए वह ज़िम्मेदारी को ग़रीब व्यक्ति पर डाल देता है और दंड देकर अपने अहंकार को सुरक्षित करता है।
यह कथा नियतिवाद, नैतिकता और सत्ता-दर्शन से जुड़ती है। नियतिवाद इस रूप में कि व्यक्ति अपने भाग्य और सिद्धांतों को जीता है, चाहे उसका परिणाम भूख हो। नैतिकता का दर्शन इसमें निहित है कि ईमानदारी और सिद्धांत अपने आपमें मूल्य हैं, भले ही वे समाज में दंड का कारण बनें। सत्ता-दर्शन की दृष्टि से यह कथा बताती है कि सत्ता का स्वरूप अक्सर जनहित से नहीं बल्कि छवि और अहंकार से निर्धारित होता है। यहाँ सत्ता न्याय नहीं करती, बल्कि ख़ुद को बचाने के लिए न्याय का उपहास करती है।
इस कथा का भावात्मक धरातल करुणा से भरा है। ग़रीब व्यक्ति की दुर्दशा और उसकी विवशता करुणा उत्पन्न करती है। साथ ही इसमें व्यंग्य का भी प्रबल प्रभाव है। जब ईमानदारी को अपराध मानकर दंडित किया जाता है तो पाठक हँसता नहीं बल्कि व्यवस्था की विडंबना पर हतप्रभ रह जाता है। इसमें आक्रोश की अनुभूति भी है क्योंकि बादशाह का ग़ुस्सा और निर्णय पाठक के मन में क्रोध और क्षोभ जगाते हैं। कथा की पंचलाइन “इस व्यक्ति को इक्कीस जूते लगाए जाएँ” कथा की आत्मा है। यही वाक्य पूरी कहानी के व्यंग्य और संदेश को समेट लेता है। यह सिर्फ़ एक आदेश नहीं बल्कि पूरे समाज का आईना है जहाँ ईमानदारी और सिद्धांत जैसी बातें बेकार समझी जाती हैं। यह पंचलाइन पाठक को झकझोर देती है और व्यवस्था की निष्ठुरता और विडंबना को तीखे व्यंग्य के साथ उजागर करती है।
शीर्षक ‘इक्कीस जूते’ अत्यंत सार्थक है। यह शीर्षक कथा की चरम परिणति को सीधे प्रकट करता है। शीर्षक सुनते ही पाठक का ध्यान सजा, अपमान और व्यंग्य की ओर जाता है। यही शीर्षक कहानी को यादगार बना देता है।
लेखक की कल्पनाशीलता और कथानक की विशिष्टता उल्लेखनीय है। रामकुमार आत्रेय ने एक साधारण-सी घटना, सत्ता का ढिंढोरा और एक ग़रीब व्यक्ति की उपस्थिति से एक कालजयी व्यंग्य रचा है। कल्पनाशीलता इस बात में है कि उन्होंने ईमानदारी और सिद्धांत जैसे गहरे विषय को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। कथानक की विशिष्टता यह है कि इसमें घटनाएँ बहुत कम हैं लेकिन हर संवाद तीखी चोट करता है। बादशाह और ग़रीब व्यक्ति के बीच का संवाद ही पूरी कथा को विकसित करता है। इसमें जो विडंबना है, वह इसे सामान्य कथा से अलग बनाती है। यहाँ कोई लंबी कहानी, पात्रों की भीड़ या घटनाओं की शृंखला नहीं, बल्कि केवल एक प्रतीकात्मक प्रसंग है जो संपूर्ण समाज और राजनीति पर व्यंग्य कर देता है। यही कथानक की सबसे बड़ी विशिष्टता है कि थोड़े से शब्दों में पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी गई है।
यह रचना समय की कसौटी पर इसलिए क़ायम रहेगी क्योंकि इसमें न केवल यथार्थ की सटीक चोट है बल्कि सत्ता और समाज की गहरी विडंबना को भी उजागर करने का साहस है। इसके तीखे व्यंग्य, मारक शैली और गहन प्रतीकात्मकता ने इसे हिंदी-लघुकथा के परिदृश्य में एक अविस्मरणीय पहचान प्रदान की है।
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8. बनैले सूअर/ विक्रम सोनी
दिसा-मैदान से फारिग होकर पंडित रामदयाल मिश्र और रघुनाथ चौबे लौट रहे थे कि रास्ते में पोस्टमैन चिट्ठी पकड़ाकर चला गया। हाथ में पत्र लिये दोनों एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। चौबे बोले, पंडित जी, चलो चुल्लू भर पानी में डूब मरें। अरे, हम कहलाते पंडित हैं, मगर इस कागज का चेहरा तक नहीं बाँच सकते। धिक्कार है हमारी पंडिताई पर ।’
‘पता नहीं, बेटे की चिट्ठी है, बहू की है, समधी की है या किसी रिश्तेदार की । पोस्टमैन भी ससुरा कारड पकड़ाकर सट्ट से भाग गया। अब किससे पढ़वायें।’
रामदयाल पर घड़ों पानी पड़ चुका था।
तभी शहर की तरफ से बिसुआ चमार का बेटा झोला टाँगे आते दिखा। पंडित रामदयाल ने उसे करीब बुलाकर कहा, ‘बेटा तू तो शहर में पढ़ता है न? ले कारड तो बाँच दे।’
बिसुआ के बेटे ने पत्र पढ़कर हाल सुना दिया। पंडित रामदयाल खुशी से उछल पड़े। उनकी बहू को बेटा हुआ है। कल वह गाँव आ रही है। अब उनके घर पर भी एक पढ़ता बेटा होगा। उनका सीना गज-भर का हो गया।
पत्र लौटाकर बिसुआ चमार का बेटा अभी बीच-पच्चीस कदम ही आगे बढ़ा होगा कि चौबे अपना लोटा हथेली पर ठोंकते हुए बोले, ‘पंडित जी, धिक्कार है हमारी कौम पर। अरे, पंडित जाति की चिट्ठी चमार पढ़े। इसकी इतनी हिम्मत…?
और दोनों ने बिसुआ के बेटे को लोटों से ही मार-मारकर वहीं खत्म कर दिया ।
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यह लघुकथा जातिगत अहंकार, सामाजिक विसंगति और मानवीय संवेदनहीनता का बेहद तीखा और असहज करने वाला चित्र प्रस्तुत करती है। लेखक ने कथा को किसी जटिल संरचना या भारी भाषा के सहारे नहीं, बल्कि सीधी और साधारण लगने वाली घटनाओं के माध्यम से गढ़ा है, जिससे इसका प्रभाव और भी तीव्र हो जाता है। कथानक की शुरुआत सामान्य ग्रामीण जीवन के एक छोटे से प्रसंग से होती है। दो बुजुर्ग पंडित, दिशा-मैदान से लौटते समय पोस्टमैन से पत्र प्राप्त करते हैं। यह दृश्य बेहद साधारण प्रतीत होता है, पर इसमें छिपी विडंबना यही है कि वे पंडित होने के बावजूद पत्र पढ़ने में असमर्थ हैं। चौबे का ‘चुल्लू भर पानी में डूब मरें’ कहना आत्मस्वीकृति जैसा लगता है, जो क्षणभर के लिए आत्म-आलोचना का संकेत देता है। यह वह पल है, जहाँ पाठक को लगता है कि शायद यह कहानी आत्मबोध की ओर जाएगी। परंतु मोड़ तब आता है जब बिसुआ चमार का बेटा, जो शहर में पढ़ता है, सामने आता है। पंडित रामदयाल की झिझक पल भर में दूर हो जाती है और वे उससे पत्र पढ़ने का आग्रह करते हैं। पत्र का संदेश प्रसन्नता का है, पोते के जन्म का। लेखक ने यहाँ एक सूक्ष्म संकेत दिया है कि शिक्षा के कारण खुशी का वाहक वही लड़का है, जिसे जातिगत दृष्टि से निचला माना जाता है। यह घटना मानो यह बताती है कि ज्ञान और शिक्षा जाति-सीमा को पार कर चुके हैं। लेकिन यह सकारात्मक संकेत तुरंत ही एक भयानक मोड़ में बदल जाता है। बिसुआ का बेटा चिट्ठी पढ़कर आगे बढ़ ही रहा था कि चौबे का संवाद ‘पंडित जाति की चिट्ठी चमार पढ़े, इसकी इतनी हिम्मत?’ पूरी कथा का सामाजिक और राजनीतिक केंद्र बन जाता है। यह वाक्य केवल जातिगत घृणा का परिचायक नहीं, बल्कि उस गहरे असुरक्षा-बोध का भी प्रमाण है जो ऊँची जातियों में तब पैदा होता है जब पारंपरिक सत्ता-ढांचा चुनौती का सामना करता है। कथानक का अंतिम दृश्य, जिसमें दोनों पंडित लोटों से पीट-पीटकर बिसुआ के बेटे की हत्या कर देते हैं, सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि शिक्षा, समानता और मानवीय रिश्तों की हत्या का प्रतीक है। यह हिंसा अचानक नहीं, बल्कि सदियों से पाले गए जातिगत पूर्वाग्रह और असमानता के ढांचे की स्वाभाविक परिणति के रूप में सामने आती है।
भाषायी दृष्टि से, लेखक ने अत्यंत सादी और बोलचाल की शैली अपनाई है, जिसमें संवाद स्वाभाविक और पात्रानुकूल हैं। ‘पोस्टमैन भी ससुरा कारड पकड़ाकर सट्ट से भाग गया’ जैसे वाक्य ग्रामीण जीवन की सहज लय और यथार्थ को सामने लाते हैं। इस भाषा में बनावट या कृत्रिमता नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा हुआ सच है। कथा का प्रभाव दो स्तरों पर काम करता है। पहला, यह तत्कालीन घटनाक्रम के माध्यम से पाठक को झकझोरता है। दूसरा, यह एक व्यापक सामाजिक टिप्पणी के रूप में हमारे सामने आता है। यह दिखाता है कि कैसे जातिगत अहंकार व्यक्ति को न केवल अंधा बना देता है, बल्कि उसकी नैतिकता को भी नष्ट कर देता है। पंडित रामदयाल की खुशी का क्षण, जो ज्ञान के आदान-प्रदान से जुड़ा था, क्षणभर में नफ़रत और हिंसा में बदल जाता है। यह परिवर्तन अचानक लग सकता है, लेकिन सामाजिक यथार्थ में यह परिवर्तन बहुत सहज और आम है। इस कथा में ‘चुल्लू भर पानी’, ‘ससुरा’, ‘कारड’, ‘बाँचना’, ‘गज-भर का सीना’ जैसी देसज शब्दावली प्रयोग हुई है, जो ग्रामीण बोलचाल की सहजता और प्रामाणिकता को उभारती है। ये शब्द पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि और कथा के यथार्थ को जीवंत बनाते हैं।
इसका क्रमिक विकास अत्यंत स्वाभाविक और प्रभावकारी है। इसकी शुरुआत एक साधारण घटना से होती है जब पंडित रामदयाल और रघुनाथ चौबे घर लौटते समय एक पत्र पाते हैं जिसे वे पढ़ नहीं पाते। इस छोटे से प्रसंग से लघुकथा का आधार बनता है और धीरे-धीरे इसमें तनाव गहराता जाता है। इसके बाद बिसुआ चमार का पढ़ा-लिखा बेटा आता है और पत्र पढ़कर सुनाता है कि पंडितजी के घर पोते का जन्म हुआ है। यहाँ पर लघुकथा एक मधुर मोड़ लेती है और वातावरण खुशी तथा गर्व से भर उठता है। पंडितजी अपने घर में पढ़े-लिखे बेटे की कल्पना से गद्गद हो जाते हैं। लेकिन यहीं से घटनाओं की दिशा पलटती है जब चौबे को लगता है कि पंडितों की चिट्ठी चमार के बेटे ने पढ़ी है जो उनकी जातीय प्रतिष्ठा के खिलाफ है। धीरे-धीरे यह भावना गुस्से और जातीय अहंकार में बदल जाती है और अंततः वही खुशी का क्षण भयावह त्रासदी में बदल जाता है जब दोनों पंडित मिलकर बिसुआ के बेटे की हत्या कर देते हैं। इस प्रकार लघुकथा का क्रमिक विकास पहले साधारण स्थिति से खुशी तक और फिर खुशी से हिंसा व त्रासदी तक पहुँचता है और यही विकास इसे गहरी मारकता और तीखा प्रभाव प्रदान करता है। यही कथा की आत्मा है, जो पाठक को अंदर तक झकझोर देता है।
कथा की सबसे बड़ी ताकत इसकी पंचलाइन है, जहाँ खुशी से हिंसा में बदलते पंडित और चौबे का चेहरा किसी प्रतीक से कम नहीं। यहाँ लेखक किसी तरह का उपदेश नहीं देते और न ही पात्रों के मनोविज्ञान को विस्तार से समझाते हैं। घटनाएँ स्वयं अपना बयान देती हैं और पाठक को असहज चुप्पी में छोड़ देती हैं। यही चुप्पी असल में सबसे बड़ी टिप्पणी है, हमारे समाज पर, हमारी सोच पर और हमारी असंवेदनशीलता पर। यह लघुकथा वीभत्स रस और क्रूर यथार्थवाद का अद्वितीय मिश्रण है। वीभत्स रस का स्थायी भाव घृणा यहाँ पूरी तरह प्रकट होता है। पाठक को न केवल पात्रों से घृणा होती है, बल्कि उस मानसिकता से भी, जो इस कृत्य को संभव बनाती है। साथ ही, यह कथा एक दस्तावेज़ की तरह है, जो हमें याद दिलाती है कि जातिगत भेदभाव महज इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी हमारे सामाजिक ताने-बाने में गहरे पैठा हुआ है।
यह लघुकथा मुख्यतः वीभत्स रस पर आधारित है, जिसमें घृणा, विकर्षण और असहजता का भाव केंद्र में है। वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा यहाँ जातिगत हिंसा के रूप में प्रकट होता है। कथा में पंडित और चौबे का बिसुआ के बेटे को मारना केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक पतन का प्रतीक है। प्रारंभ में खुशी का प्रसंग, पोते के जन्म का समाचार, पाठक में हल्का सा हास्य और शांत रस का आभास देता है, लेकिन अचानक यह भाव वीभत्स में परिवर्तित हो जाता है। यही विरोधाभास इस रस को और तीव्र बना देता है। अंततः, पाठक के मन में पात्रों और उनकी मानसिकता के प्रति घृणा और आक्रोश उत्पन्न होता है, जिससे कथा अपना भावात्मक लक्ष्य पूर्ण रूप से साध लेती है। दार्शनिक दृष्टि से यह लघुकथा सामाजिक यथार्थवाद और नैतिक दर्शन (Ethics) पर आधारित है। नैतिक दर्शन का मूल सिद्धांत है कि मनुष्य के कर्मों का मूल्यांकन उनके नैतिक परिणामों से होना चाहिए, न कि जाति, धर्म या पहचान के आधार पर। इस कथा में पंडित और चौबे का आचरण नैतिक दृष्टि से पूर्णतः अधम है; क्योंकि वे एक निर्दोष की हत्या केवल जातिगत अहंकार के कारण करते हैं। कथा यह प्रश्न उठाती है कि क्या शिक्षा और ज्ञान वास्तव में समाज को बदल सकते हैं, यदि जातिगत मानसिकता इतनी गहरी पैठी हुई है। यह अस्तित्ववादी दृष्टिकोण से भी जुड़ती है, क्योंकि यहाँ पात्र अपने चुनाव में पूर्ण स्वतंत्र हैं, लेकिन उनका चुनाव अमानवीय और विनाशकारी है। लेखक इस घटना के माध्यम से यह दिखाते हैं कि नैतिक पतन केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज को कलंकित करता है।
शीर्षक ‘बनैले सूअर’ अत्यंत गहन और प्रतीकात्मक है। बनैला सूअर, अर्थात जंगली सूअर, अपने स्वभाव में उग्र, जिद्दी और प्रतिशोधी होता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यदि कोई उस पर आक्रमण करे, तो वह भयभीत होकर भागने के बजाय पलटकर वार करता है, और ऐसा वार प्रायः प्राणघातक सिद्ध होता है। इस लघुकथा में यह प्रतीकात्मकता अद्भुत ढंग से रूपायित हुई है। यहाँ ‘वार करने वाला’ प्रत्यक्षतः कोई हथियार उठाए व्यक्ति नहीं, बल्कि बिसुआ चमार का पढ़ा-लिखा बेटा है, जो अनजाने में और अनिच्छापूर्वक उन दो तथाकथित कुलीन पंडितों के जातिगत अहंकार पर आघात कर देता है। उसका अपराध केवल इतना है कि उसने उनकी चिट्ठी पढ़ दी और इस प्रकार ज्ञान तथा शिक्षा के माध्यम से उनके आत्मसम्मान की खोखली नींव को छू लिया। यह वार न तो जानबूझकर किया गया था और न ही किसी शत्रुता से प्रेरित था, किंतु जातिगत दंभ से अंधे हो चुके दोनों पंडित इसे अपने वर्चस्व पर हमला मान लेते हैं। परिणामस्वरूप वे भी बनैले सूअरों की भाँति पलटवार करते हैं। पर उनका यह पलटवार शाब्दिक नहीं, घातक और हिंसक है, जो सीधे उस निर्दोष युवक के प्राण हर लेता है। इस प्रकार, शीर्षक केवल कथा की घटना का सूचक नहीं, बल्कि उसकी अंतर्धारा में प्रवाहित क्रूर प्रवृत्ति और प्रतिहिंसा की वृत्ति का सजीव और तीखा प्रतीक बनकर उभरता है।
संक्षेप में, यह लघुकथा उच्चकोटि की जो अपनी सरलता में गहरी मार करती है। इसमें नाटकीयता नहीं, पर असर नाटकीय है। इसमें भारी भाषा नहीं, पर संदेश भारी है। यह केवल एक घटना का बयान नहीं, बल्कि उस सोच की परतें खोलने वाली रचना है, जो शिक्षा और प्रगति के बावजूद बदलने को तैयार नहीं। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है कि यह पाठक को असहज करके सोचने पर विवश कर देती है।
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9. छूटा हुआ सामान/ शील कौशिक
विवाह के बाद ससुराल से पहली बार मायके लौटी तनुजा का मन उड़ा जा रहा है। पहले दिन वह माँ-बाबूजी के ढेरों प्रश्नों के उत्तर देती रही, कुछ छुपाती रही, कुछ मन खोलकर बताती रही। आस-पड़ोस की ताई-चाची से आसीसें बटोरती रही। सुबह उठते ही माँ शुरू हो गई, “तनु बेटा! आज दामाद जी आने वाले हैं, अपने बैग में सामान जमा लो, जल्दी में कुछ छूट जाएगा।”
तनुजा को शीघ्रता से दरवाज़े से बाहर निकलते देख माँ ने टोका, “कहाँ जा रही है तनु?”
“अभी आई माँ,” यह कहकर वह निकल गई अपने मोहल्ले में रह रही सहेली मीना के घर की ओर। रास्ते में पड़ोस की ताई ने रोक लिया, “बिटिया कल तो तू ससुराल चली जाएगी…आ…मैंने खीर बनाई है…तुझे तो बहुत पसंद है न…” कहते हुए ताई हाथ पकड़कर ले गई।
मीना उसे देखते ही फूल सी खिल उठी। खट्टी-मीठी बातें करते कब में दो घंटे बीत गए, पता ही न चला। घर वापस आई तो माँ रसोई में उसकी पसंद की हरी मेथी वाली मट्ठियाँ बना रही थी।
“बेटी अपना सामान इकट्ठा कर लो, कुछ छूट गया तो तुम्हें ही परेशानी होगी।”
“माँ एक बार बाज़ार से ज़रूरी सामान लेने जा रही हूँ,” कहकर तनुजा बिना उत्तर सुने घर से बाहर निकल ही गई। बाज़ार में उन दुकानों पर पहुँची जहाँ से वह हेयर पिन व क्लिप, रबर बैण्ड, रिबन, चूड़ियाँ आदि खरीदती थी।
“अरी बिटिया! बहुत दिन बाद दिखाई पड़ी हो, लगता है तुम्हारी शादी हो गई है, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?” दुकानवाले काका बोले।
“हाँ काका, दो क्लिप, हेयर बैण्ड दे दीजिए।”
“बस यही, यह लो। और ये चूड़ियाँ हमारी ओर से शादी का तोहफ़ा समझो बिटिया।”
उसके बाद तनुजा ने सामने वाली दुकान से वही पेन ख़रीदा जो वह कॉपी-किताबों के साथ यहाँ से अक्सर ख़रीदा करती थी। वापस लौटी तो माँ ने फिर याद दिलाया, “बेटी अपना सामान अटेची में जमा लो, दामाद जी ज़्यादा देर नहीं रुकने वाले।”
“अच्छा माँ!” कहकर वह तुरंत पलटी और फिर दरवाज़े से बाहर हो गई। उन गलियों से गुज़रती हुई जहाँ वह छुपम-छुपाई व उछल-कूद करती थी, नीम के उस विशाल वृक्ष के पास पहुँची। यहाँ वह सहेलियों संग झूला झूलती और सबसे ऊँची पींघ लेने के लिए मचल जाया करती थी। कितनी ही देर तक निहारती रही उस ख़ामोश खड़े पेड़ को और यादों के झूलों में झूलती रही तनुजा । माँ के कठोर चेहरे की याद आते ही वह फिर घर की ओर भागी।
रसोई से उठती हुई ख़ुशबू से पता लगा कि माँ रसोई में दामाद के लिए ज़रूर कोई पकवान बना रही है। वह चुपके-से रसोई में गई। माँ साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। उसे देखते ही माथे पर त्योंरियां चढ़ाकर ग़ुस्से में बोली, “तेरे पाँव में टिकाव न हैं, यहाँ-वहाँ उड़ती फिर रही है छोरी!”
फिर उसके मासूम से चेहरे को देखकर माँ की आँखें नम हो गई व भर्राए स्वर में बोली, “कितनी बार कहा है तुझे, अपना सामान समेट ले बेटा!”
“माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ,” कहकर वह फफक-फफककर रो पड़ी तनुजा और माँ के गले में झूल गई।
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लघुकथा ‘छूटा हुआ सामान’ एक नवविवाहिता स्त्री के मानसिक और भावनात्मक द्वंद्व को अत्यंत सहज, सौम्य और दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। यह कथा न केवल एक लड़की की ससुराल से मायके लौटने की घटना का वर्णन है, बल्कि उससे कहीं अधिक गहराई में उतरकर उस सूक्ष्म असंतुलन को छूती है जो हर विवाह के बाद एक स्त्री के भीतर जन्म लेता है। जड़ें छोड़ने और पंख थामने के बीच की अदृश्य कशमकश को यह कहानी बेहद संवेदनशीलता से सामने लाती है। कथा का शीर्षक अत्यंत प्रतीकात्मक है। यहाँ “छूटा हुआ सामान” केवल भौतिक वस्तुओं की सूची नहीं, बल्कि उन स्मृतियों, उन स्पर्शों, उन रिश्तों का नाम है जिन्हें तनुजा बार-बार समेटने निकलती है और हर बार कुछ-न-कुछ उसके भीतर रह जाता है।
लघुकथाकार ने माँ-बेटी के रिश्ते को अत्यंत मार्मिकता के साथ उकेरा है। माँ का व्यावहारिक और अनुशासनप्रिय पक्ष इस तथ्य को उजागर करता है कि उसने बेटी को विदा कर तो दिया है, पर उसके जाने की पीड़ा अभी भी भीतर कहीं कुंडली मारकर बैठी है। वहीं तनुजा का घर से बार-बार बाहर जाना, कभी सहेली के घर, कभी बाज़ार, कभी नीम के पेड़ तक, सिर्फ़ यात्रा नहीं बल्कि एक अंतर्मुखी अन्वेषण है। वह उन बिखरे टुकड़ों को जोड़ना चाहती है जिनमें उसका बचपन, उसकी मित्रता, उसकी अपनी दुनिया बसती थी। इन स्थलों के चयन में भी कथाकार की दृष्टि उल्लेखनीय है। सहेली का घर, बाज़ार की परिचित दुकानें, नीम का पेड़, हर एक स्थान एक स्मृति की डोरी में बँधा हुआ है। यह क्रमिक स्मरण यात्रा ही उसे माँ की उस अंतिम पुकार तक वापस लाती है, जो कठोरता में ढकी हुई ममता की सघन परछाई है।
कथावाचन में संवादों की भूमिका अत्यंत स्वाभाविक और सीमित है, जो पात्रों की मनोदशा और स्थिति को संक्षेप में प्रकट कर देते हैं। माँ की बार-बार दोहराई जाने वाली चिंता, “अपना सामान जमा कर लो”, सिर्फ़ एक निर्देश नहीं बल्कि एक गूढ़ संकेत है कि अब वह अपने भावनात्मक घर से भी कूच करे। वहीं तनुजा का मासूम प्रतिवाद, “माँ, सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ”, पूरे कथ्य का सार एक ही वाक्य में उघाड़ देता है। यह अंतिम संवाद मात्र नहीं बल्कि एक भावनात्मक विस्फोट है, जो पाठक को भीतर तक हिला देता है।
‘छूटा हुआ सामान’ मुख्यतः करुण रस पर आधारित है। पूरी कथा में एक हल्की-सी उदासी और बिछोह का भाव है, जो रस की स्थायी भावना ‘शोक’ से मेल खाता है। तनुजा का मायके में बिताया गया समय, पुरानी दुकानों से मुलाक़ात, बचपन के खेलों की याद और सहेली से बातें, ये सब सुखद स्मृतियाँ हैं, लेकिन उनके पीछे यह अहसास भी है कि अब वे केवल स्मृतियों तक सीमित रह जाएँगी। माँ का बार-बार ‘सामान समेटने’ का कहना सतही तौर पर व्यावहारिक है, पर प्रतीकात्मक रूप से यह बेटी के जीवन के बदलते स्वरूप का संकेत है। अंत में जब तनुजा कहती है, ‘माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ’, तो यह पंक्ति करुण रस का चरम बन जाती है। पाठक इस क्षण में नायक और उसकी माँ दोनों की भावनाओं में भीग जाता है।
यह कथा दर्शन शास्त्र में अनित्य (अस्थिरता) के सिद्धांत पर आधारित है, जो बताता है कि जीवन में कोई भी अवस्था स्थायी नहीं होती। विवाह के बाद तनुजा के जीवन में एक नया अध्याय खुला है, और मायका अब उसके लिए केवल कुछ दिनों का पड़ाव बन गया है। ‘छूटा हुआ सामान’ यहाँ प्रतीक है उन स्मृतियों, रिश्तों और आदतों का, जो समय के साथ पीछे छूट जाते हैं, पर मन उन्हें संजोकर रखना चाहता है। कथा यह भी रेखांकित करती है कि भौतिक वस्तुएँ मात्र प्रतीक हैं, असली ‘सामान’ वे अनुभव, लोग और स्थान हैं जिनसे भावनात्मक जुड़ाव होता है। अंत में माँ के सामने फूट पड़ना इस बात का संकेत है कि मनुष्य भले ही नई परिस्थितियों में ढल जाए, लेकिन उसके भीतर का लगाव और अपनापन उसे बार-बार अतीत से जोड़ने की कोशिश करता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कथा ‘नॉस्टेल्जिया’ और ‘ट्रांज़िशनल एडजस्टमेंट’ की स्थिति को दर्शाती है। विवाह के बाद स्त्री को एक नए परिवेश में ढलना पड़ता है, जबकि उसके मन का एक हिस्सा पुराने परिवेश से गहरे जुड़ा रहता है। तनुजा का बार-बार बाहर निकलना और बचपन के स्थानों व लोगों से मिलना उसके भीतर के लगाव और अधूरे बिछोह का परिणाम है। यह व्यवहार वस्तुतः भावनात्मक पूर्ति का प्रयास है, वह उन स्मृतियों को ताज़ा कर रही है जो नए जीवन में उसके लिए सुरक्षा और आत्मीयता का स्रोत हैं। माँ का ‘सामान समेटने’ का आग्रह और तनुजा का उत्तर दोनों पीढ़ियों के दृष्टिकोण का अंतर दर्शाते हैं, माँ व्यावहारिक है, बेटी भावनात्मक। इस कथा में भावनात्मक रिलीज़ (फफककर रोना) मनोवैज्ञानिक रूप से तनाव और दबे हुए भावों को मुक्त करने का क्षण है, जो रिश्ते को और भी मज़बूत करता है।
यह लघुकथा छूटा हुआ सामान अपने क्रमिक विकास और बुनावट की दृष्टि से अत्यंत सशक्त और गहन रचना है। कथा की बुनावट इतनी कसावदार है कि यह पाठक को शुरू से अंत तक बाँधे रखती है और अंत में पंचलाइन पर गहरी भावनात्मक अनुभूति कराती है। कथा का विकास एक साधारण घरेलू प्रसंग से शुरू होता है। विवाह के बाद मायके लौटी तनुजा माँ-बाबूजी और रिश्तेदारों के प्रश्नों व आशीर्वादों में उलझी रहती है। यहाँ से कथा का पहला स्तर खुलता है, जहाँ बेटी के लौटने की सामान्य ख़ुशी और घर का आत्मीय वातावरण सामने आता है। इसके बाद माँ का लगातार यह कहना कि ‘अपना सामान समेट लो’ कथा की रीढ़ बन जाता है। यही वाक्य सतह पर एक साधारण-सा निर्देश है, किंतु धीरे-धीरे इसका अर्थ बदलने लगता है और कथा का क्रमिक विकास भावनात्मक गहराई की ओर बढ़ता है। तनुजा का बार-बार घर से बाहर जाना और पुराने स्थलों, सहेली के घर, ताई की रसोई, पुरानी दुकानों, बचपन के नीम के पेड़ की ओर लौटना, कथा में उसकी मानसिक यात्रा को मूर्त करता है। यह बिखराव ही उसके ‘सामान’ का रूप ले लेता है। वस्त्र, आभूषण या क्लिप-रिबन जैसे साधारण सामान दरअसल उसके बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियों के प्रतीक हैं। माँ का हर बार टोकना और तनुजा का बार-बार निकल जाना, कथा की गति को एक लय और संरचना देता है। अंत में माँ का वाक्य ‘अपना सामान समेट ले बेटा’ अपने चरम रूप में आता है और तनुजा का उत्तर ‘माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ’ कथा की पराकाष्ठा है। यहाँ क्रमिक विकास अपने पूर्ण आकार में पाठक के सामने खुलता है। पहले सामान केवल कपड़े और बैग थे, पर अब वे स्मृतियाँ, रिश्ते, मोह और बचपन का संसार बन जाते हैं। इस प्रकार कथा की बुनावट सरल किंतु गहन है। सतही स्तर पर यह घर लौटती बेटी की दिनचर्या है, लेकिन गहरे स्तर पर यह जीवन की स्मृतियों, भावनाओं और संबंधों की पुनर्रचना है। प्रत्येक प्रसंग पिछले से जुड़कर आगे बढ़ता है और कथा का विकास एक शिखर तक पहुँचकर पंचलाइन में विस्फोट करता है। यही कसावट और क्रमिक विकास इसे एक सशक्त, संवेदनशील और यादगार लघुकथा बनाता है।
‘छूटा हुआ सामान’ की असली शक्ति उसकी पंचलाइन में निहित है। “माँ, सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ”, एक साधारण वाक्य प्रतीत होता है लेकिन इसमें गहन प्रतीकात्मकता और भावनात्मक विस्फोट समाया है। पूरी कथा में माँ लगातार समझाती है कि अटेची में कपड़े और ज़रूरी चीज़ें रख लो, वरना कुछ छूट जाएगा। तनुजा हर बार बाहर निकलती है और अपने पुराने संसार से मिलती है, सहेलियों से बातें करती है, ताई की खीर खाती है, दुकानदार काका से हेयर क्लिप लेती है, नीम के पेड़ को निहारती है। दरअसल वह अपनी स्मृतियों, अपने बचपन और उन आत्मीय रिश्तों को समेट रही होती है जो विवाह के बाद छूट जाने वाले हैं। जब वह माँ से कहती है कि वह तो सुबह से छूटा हुआ सामान बटोर रही है, तो यह वाक्य पूरी कथा को साधारण घरेलू प्रसंग से उठाकर गहन मानवीय अनुभव में बदल देता है। यही वह क्षण है जब पाठक समझता है कि यह कहानी केवल तनुजा की नहीं, हर बेटी की है। यही अंतिम वाक्य कथा की जान है, उसकी अमिट पहचान और उसकी सबसे सशक्त पंचलाइन।
इस लघुकथा की भाषा की एक अन्य विशेषता उसकी सहजता और दृश्यात्मकता है। पाठक को प्रतीत होता है मानो वह स्वयं उन गलियों से गुज़र रहा हो, नीम के पेड़ को निहार रहा हो, या फिर माँ की आँखों में छिपी नमी को देख रहा हो। कथा में कोई नाटकीयता नहीं, कोई अतिरिक्त रंग नहीं, फिर भी हर दृश्य जीवित, हर भाव सजीव प्रतीत होता है। कथा का शिल्प इस बात का प्रमाण है कि यदि लेखन सच्चे अनुभव से उपजता है तो वह बिना किसी आडंबर के भी हृदय को स्पर्श कर सकता है। कुल मिलाकर, ‘छूटा हुआ सामान’ एक ऐसी लघुकथा है जो बहुत धीमे स्वर में, बहुत कोमल ढंग से, लेकिन बहुत गहरी बात कह जाती है। यह नारी-अंतःजगत की उन पर्तों को खोलती है जिन्हें न आँसू व्यक्त कर सकते हैं, न शब्द पूरी तरह बाँध सकते हैं, लेकिन लघुकथा की चुप्पी उन्हें कह जाती है। यह लघुकथा दीर्घजीवी है क्योंकि यह हर पाठक को कहीं-न-कहीं छूती है। हर बेटी का मायका पीछे छूटता है, हर माँ-बेटी इस विदाई के क्षण से गुज़रती है। परिस्थितियाँ, रीति-रिवाज़, समय भले बदल जाए, पर इस अनुभव की करुणा और गहराई कभी नहीं बदलती। यही कारण है कि “छूटा हुआ सामान” आज भी उतनी ही ताज़गी और मर्मस्पर्शिता से पढ़ी जाती है जितनी लिखे जाने के समय थी।
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10. धरती में गड़ी स्त्रियाँ/ हरभगवान चावला
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आसमान में खूब गहरे बादल थे। घनघोर बारिश होने की संभावना थी। घने जंगल में सिर पर लकड़ियों का गट्ठर लादे तेज़ी से चलती स्वी अचानक चौंककर रुक गई। ठीक उसी समय सामने की दिशा से आते एक ऋषि भी ठिठक कर रुके। दोनों की दृष्टि जंगल में गाड़ दी गई उन स्त्रियों पर ठहर गई, जिनकी देह धरती के भीतर थी, मुख बाहर।
ऋषि ने उस स्त्री की ओर देखते हुए कहा, “अवश्य हो, ये चरित्रहीन स्त्रियाँ हैं, पातिव्रत्य को खो चुकी कुलटाएँ । शास्त्रों के अनुसार इनको उचित दण्ड मिला है। अभी बारिश आएगी और ये स्वयं दलदल में समा जाएँगी।”
ऋषि के होठों पर एक वितृष्ण मुस्कान तैरने लगी।
श्रमिक स्त्री ने ऋषि को देखा और कहा, “मुझे तो ये स्वयं धरती से फूटते अंकुरों जैसी दिखती हैं। इन स्त्रियों ने निश्चय ही दासत्व से मुक्ति का प्रयास किया होगा। अभी बारिश आएगी, मिट्टी पोली हो जाएगी। ये पेड़ों को पकड़कर बाहर आ जाएंगी। हवा इनके बालों से अठखेलियाँ कर रही होगी और देवताओं के नियमशास्त्र पानी में बह जाएँगे।”
ऋषि उपहास में हँसे और बोले, “इनकी परिणति तय है… निश्चित मृत्यु। प्रलयंकारी वर्षा बस प्रारंभ होने को है। तुम अपने घर जाओ।”
“तुम जाओ, ऋषि, और अपने देवताओं तथा शास्त्रों को इस प्रलय से बचाओ। इन स्त्रियों के निमित्त मैं यहाँ रहूंगी। तुम देखना, यही प्रलय हम स्त्रियों का मुक्ति-गीत बनेगी।”
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वरिष्ठ साहित्यकार हरभगवान चावला द्वारा लिखित लघुकथा ‘धरती में गड़ी स्त्रियाँ’ समकालीन हिंदी लघुकथा लेखन में एक अत्यंत प्रभावशाली और प्रतीकात्मक रचना के रूप में सामने आती है, जो मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक है। यह लघुकथा स्त्री-विमर्श, पितृसत्ता के धार्मिक तंत्र, और प्रतिरोध के सौंदर्यबोध को गहनता से एक साथ पिरोती है। कथा का आरंभ एक भरे-पूरे दृश्य से होता है। घना जंगल, उमड़ते बादल और बारिश की संभावना केवल दृश्यात्मक पृष्ठभूमि नहीं बनाते, बल्कि आगे घटने वाली प्रतीकात्मक घटनाओं की भूमिका भी रचते हैं। श्रमिक स्त्री का जंगल में लकड़ियाँ लादे चलना उस वर्ग और लिंग-समूह का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सदियों से सामाजिक व्यवस्था के बोझ तले दबाया गया है। फिर आता है वह दृश्य जो कथा की केंद्रीय परिघटना बन जाता है। धरती में गड़ी हुई वे स्त्रियाँ, जिनकी देह मिट्टी के नीचे है और चेहरा बाहर। यह छवि हिला देने वाली है और पाठक के मन में तुरंत अनेक सवाल और प्रतीक उभरने लगते हैं। यहाँ लेखक केवल दृश्य नहीं रचते, बल्कि सभ्यता की कब्र में दबी स्त्री की चुप चीख को दृश्य में ढालते हैं। इन स्त्रियों का जीवित होना, साँस लेना और केवल मुख का बाहर होना उनके दमन, जीवट और अस्तित्व की त्रासदी को एक साथ प्रस्तुत करता है।
कथा में प्रवेश करता है एक ऋषि, जो स्पष्ट रूप से पितृसत्तात्मक धार्मिक व्यवस्था का प्रतीक है। वह गड़ी हुई स्त्रियों को चरित्रहीन, कुलटा और दंडित घोषित करता है। उसके संवादों में केवल व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि वह समूची वह व्यवस्था बोलती है जिसने स्त्री की आजादी को अपराध और उसकी इच्छा को दोष कहा है। इसके बरअक्स खड़ी होती है श्रमिक स्त्री की आवाज, जो शास्त्र नहीं जानती, लेकिन मिट्टी और जीवन की भाषा समझती है। वह गड़ी स्त्रियों को अंकुरों की तरह देखती है। यह तुलना अत्यंत मर्मस्पर्शी और सारगर्भित है। अंकुर जो मिट्टी में दबे होते हैं, बारिश और संघर्ष से ऊपर आ जाते हैं। यह स्त्री का आस्था नहीं, प्रतिरोध है और यही प्रतिरोध इस कथा का नैतिक और भावनात्मक केंद्र बन जाता है। कथा का अंत प्रेरणादायक और निर्णायक है। जब ऋषि कहता है कि इन स्त्रियों की निश्चित मृत्यु होगी, तब श्रमिक स्त्री का उत्तर उसे ही पलटकर व्यवस्था पर खड़ा कर देता है। वह कहती है कि प्रलय देवताओं के लिए भय हो सकता है, पर स्त्रियों के लिए वह मुक्ति का गीत बनेगा। यह पंक्ति किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि एक सहज उद्घोष की तरह आती है, जो पाठक के भीतर देर तक गूंजती है।
शिल्प की दृष्टि से यह कथा अत्यंत सघन है। संवादों में संतुलन है, दृश्य प्रतीकात्मक हैं और पात्र गहराई से गढ़े गए हैं। लेखक ने कथा को बौद्धिक न बनाकर उसे भावनात्मक स्पर्श और सांकेतिक शक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। ‘धरती में गड़ी स्त्रियाँ’ शीर्षक अपने आप में एक तीव्र और बहुआयामी प्रतीक है। यह न केवल स्त्रियों के दमन को चित्रित करता है, बल्कि उनके भीतर उपस्थित जीवट, प्रतिरोध और पुनर्जन्म की संभावना को भी उभारता है। यह शीर्षक उन स्त्रियों की ओर संकेत करता है जिन्हें सामाजिक, धार्मिक और नैतिक व्यवस्थाओं ने दबा दिया है, पर वे अब भी जीवित हैं, साँस ले रही हैं और बाहर आने की ताक में हैं। वे मिट्टी में दबी हैं, मगर मरी नहीं हैं। यह शीर्षक पराजय का नहीं, प्रतीक्षा और उगने की तैयारी का बिंब है। कथा का यही भाव, शीर्षक में संपूर्णता से प्रतिबिंबित होता है। इस लघुकथा की पंचलाइन. “… तुम देखना, यही प्रलय हम स्त्रियों का मुक्ति-गीत बनेगी”, केवल संवाद नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना का उद्घोष है। यह स्त्री की शाश्वत यातना को समाप्त कर पुनर्जन्म की घोषणा है। जहाँ ऋषि प्रलय को अंत मानता है, वहीं स्त्री उसे एक शुरुआत के रूप में देखती है। यह वाक्य स्त्री प्रतिरोध का सौंदर्यपूर्ण, आत्मविश्वासपूर्ण और कालजयी स्वर बन जाता है।
इस लघुकथा का क्रमिक विकास अत्यंत सघन और प्रभावशाली है। आरंभ में आसमान में घने बादलों और घनघोर बारिश की संभावना का वर्णन एक प्रतीकात्मक पृष्ठभूमि रचता है, जो वातावरण को रहस्यमय और तनावपूर्ण बना देता है। इसके तुरंत बाद श्रमिक स्त्री और ऋषि का आमना-सामना कथा को द्वंद्वात्मक संरचना प्रदान करता है। धरती में गड़ी स्त्रियों का दृश्य कथा का केंद्रीय बिंदु है, जिससे पूरी रचना की संवेदना और संघर्ष फूटता है। ऋषि पहले स्त्रियों को दोषी ठहराकर पारंपरिक व्यवस्था का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और श्रमिक स्त्री उसके प्रतिपक्ष में प्रतिरोधी स्वर रखती है। धीरे-धीरे कथा एक विचार-विन्यास से सामाजिक विमर्श में बदलती है। प्रारंभ में ऋषि की हँसी और उपहास से स्त्रियों की नियति को निश्चित बताने की कोशिश होती है, लेकिन इसके विपरीत श्रमिक स्त्री बारिश, मिट्टी और हवा को मुक्ति का माध्यम मानकर स्त्रियों के पुनरुत्थान की संभावना व्यक्त करती है। अंत में उसका घोषणा-भरा संवाद कथा को चरम पर पहुँचाता है और यह सिद्ध करता है कि वही प्रलय स्त्रियों का मुक्ति-गीत बनेगी। इस प्रकार कथा का क्रमिक विकास वातावरण से दृश्य, दृश्य से संवाद, संवाद से द्वंद्व और अंततः द्वंद्व से उद्घोष तक पहुँचता है, जो लघुकथा को स्मरणीय और प्रभावशाली बना देता है।
इस लघुकथा का शीर्षक ‘धरती में गड़ी स्त्रियाँ’ अत्यंत सार्थक और गहन है। यह शीर्षक सीधे-सीधे कथा की सबसे मार्मिक और प्रतीकात्मक छवि को सामने लाता है। स्त्रियों का धरती में गड़ा होना केवल शारीरिक स्थिति का वर्णन नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक और सामाजिक परंपरा का रूपक है, जिसने स्त्रियों को दबाकर उनके अस्तित्व को आधा-अधूरा बना दिया। यह शीर्षक एक ओर स्त्रियों की त्रासदी और बेबसी का उद्घाटन करता है, तो दूसरी ओर उनके प्रतिरोध और पुनर्जन्म की संभावना को भी इंगित करता है। बारिश, मिट्टी और हवा जैसे तत्त्वों के सहारे यह शीर्षक बताता है कि दबाई गई स्त्रियाँ भी एक दिन धरती की गोद से अंकुरित होकर बाहर आएँगी। इस शीर्षक की विशेषता यह है कि यह कथा के समूचे प्रतिपक्ष और संदेश को एक ही प्रतीक में समेट लेता है। पाठक को शीर्षक पढ़ते ही कथा की पीड़ा, प्रतिरोध और मुक्ति का बोध हो जाता है। इस प्रकार ‘धरती में गड़ी स्त्रियाँ’ केवल शीर्षक नहीं बल्कि पूरी लघुकथा का प्राण है जो इसे गहन प्रभाव और स्थायित्व प्रदान करता है।
यह लघुकथा मुख्य रूप से वीर रस पर आधारित है, जिसमें एक स्त्री की अंदरूनी शक्ति, उसका साहस और विरोध की भावना साफ दिखाई देती है। जब श्रमिक स्त्री अकेले ऋषि के सामने खड़ी होकर जवाब देती है, प्रलय को “मुक्ति-गीत” कहती है, और यह कहती है कि वह इन गड़ी हुई स्त्रियों के लिए वहाँ रुकी है, तो इन सब बातों में उसका आत्मसम्मान, हिम्मत और विरोध साफ झलकता है, जो वीर रस की ऊँचाई को छूता है। किंतु उसकी पृष्ठभूमि में करुण रस की गहरी छाया भी मौजूद है। इन दोनों रसों का सामंजस्य इस कथा की शक्ति और प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ा देता है। हरभगवान चावला की यह लघुकथा यह प्रमाणित करती है कि जब रचनाकार सामाजिक विमर्श को कलात्मक गहराई से जोड़ता है, तो वह साहित्य केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि स्मरण रखने योग्य बन जाता है। यह कथा पाठक को भीतर तक झकझोरती है और यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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