मानवीय अनुभव की जटिलताओं को समाहित करने की क्षमता के कारण, लघुकथाएँ पाठकों को मंत्रमुग्ध करने में कामयाब रही हैं। अपनी संक्षिप्तता में सामाजिक जागृति से सम्बन्धित प्रेरक एवं विचारोत्तेजक कथ्य एवं भाषा-शैली के कारण लघुकथा एक लोकप्रिय विधा बन पड़ी है। लघुकथाएँ, अन्य छोटी कहानियों से इसलिए भिन्न हैं; क्योंकि वे विशेष रूप से समसामयिक सामाजिक मुद्दों की बारीकियों की खोज के लिए और एक गहन संदेश देने और पाठकों से भावनात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं। लघुकथाओं में ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डालने के साथ-साथ, पाठकों के मन-मस्तिष्क को उत्तेजित करने तथा उन्हें अपनी धारणाओं व पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करने की क्षमता निहित है। लघुकथा की प्रासंगिकता सामाजिक संदर्भों में है और यह समाज, साहित्य और मीडिया के अंतर्संबंधों को चित्रित करने में विशेष रूप से प्रभावी है। यही कारण है कि लघुकथा आज नियमित आधार पर समाचार पत्रों और अन्य पत्रिकाओं में जगह पाती है। लघुकथा विभिन्न समसामयिक सामाजिक सन्दर्भों एवं राजनीतिक गतिविधियों पर सशक्त टिप्पणियाँ करती है। मीडिया, सोशल मीडिया और सिनेमा के साथ-साथ साहित्य की भूमिका पर अपने स्पष्ट और तीखे संकेतों के साथ, लघुकथा सामाजिक जागृति के लिए एक शक्तिशाली विधा के रूप में उभरी है। हिंदी लघुकथा के कई लेखकों ने इस विधा में अत्यधिक शक्तिशाली रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जो साहित्य और मीडिया के बीच संबंधों और जनता पर उनके प्रभाव को दर्शाती हैं। हिंदी लघुकथा विभिन्न प्रतिक्रियाओं, व्यंग्यों, कटाक्षों और प्रश्नों के माध्यम से महत्वपूर्ण विचारों के साथ-साथ कई समाधान भी पाठकों के सामने लाती है।
शरद जोशी की लघुकथा ‘चौथा बंदर’ व्यंग्यपूर्ण ढंग से समाज और राजनीति के सदर्भ में मीडिया की भूमिका पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है। कुछ पत्रकार और फोटोग्राफर महात्मा गाँधी के आश्रम में पहुँचकर उनके तीन बंदरों को देखते हैं – एक आँख बंद किए, दूसरा कान बंद किए, तीसरा मुँह बंद किए। ‘एक बुराई नहीं देखता, दूसरा बुराई नहीं सुनता, तीसरा बुराई नहीं बोलता। पत्रकारों को स्टोरी मिली, फोटोग्राफरों ने तस्वीरें लीं और वे आश्रम से चले गए।’ शरद जोशी चौथे बंदर की पहचान करते हैं। पत्रकारों के जाने के बाद वह चौथा बंदर आश्रम में आया। वह पास के गाँव में भाषण देने गया था। ‘यह बुराई देखता था, बुराई सुनता था, बुराई बोलता था।’ उसे जब पता चला कि आश्रम में पत्रकार आये थे, फोटोग्राफर आये थे तो वह बड़ा दुखी हुआ और गाँधीजी से बोला, ‘आपने मुझे ख़बर भी न की। यह मेरे साथ आपने बड़ा अन्याय किया है बापू।’ गाँधीजी ने चरखा चलाते हुए कहा, “ज़रा देश को आज़ाद हो जाने दे बेटे, फिर तेरी ही ख़बरें छपेंगी, तेरी ही फोटू छपेगी। इन तीन बंदरों के जीवन में तो यह अवसर केवल एक बार आया है। तेरे जीवन में तो यह रोज़-रोज़ आएगा।” शरद जोशी का यह कथानक भारत के भावी समाज और राजनीति जगत् में फैलने वाले भ्रष्टाचार, मिथ्याचार, स्वार्थपरता और आपाधापी के साथ-साथ पत्रकारिता की बढ़ने वाली जिम्मेदारी की पूर्वकल्पना व भविष्यद्वाणी करता है।
रामकुमार आत्रेय की लघुकथा ‘दो बूँद ज़िंदगी’ समाज पर मीडिया के प्रभाव को रेखांकित करती है। विशेषकर दूरदर्शन का प्रभाव बालमन पर कितना गहरा होता है, इस तथ्य को उजागर करती है: “अंकल,अंकल ! दो बूँद जिंदगी की देना।” एक मैले–कुचैले अधनंगे बच्चे ने दो रुपये कैमिस्ट के सामने रखते हुए कहा। ‘‘दो बूँद जिंदगी की! . . .इस नाम की कोई दवाई नहीं है। पगला कहीं का।. . .’’ कैमिस्ट ने हँसते हुए दो रुपये का सिक्का बच्चे की हथेली पर रखते हुए उत्तर दिया। फिर बच्चे ने भोलेपन से कहा: ‘‘अंकल, यह वही दवाई है, जिसे पीने के लिए अमित (अभिताभ बच्चन) अंकल हम बच्चों को समझाया करते हैं। आप टी.वी. नहीं देखते क्या?. . .’’ कैमिस्ट समझ गया और बोला: ‘‘अच्छा, तो तुम पोलियो ड्रॉप्स के विषय में कह रहे हो। वह तो कल मुफ्त में मिल रही थी। तब तुम कहाँ गए थे?’’ ‘‘कल इतवार था न अंकल। छुट्टी थी। मम्मी मुझे भी अपने साथ काम पर ले गई। वहाँ मज़दूरी करती है न मम्मी। मैं दिनभर वहीं रहा। . . .ऐसे में मुझे दो बूँद जिंदगी की पीने को नहीं मिली। अब यदि मैं ये दो बूँद नहीं पिऊँगा, तो अमित अंकल मुझसे नाराज़ हो जाएँगे। रात वे टी.वी. पर खुद कह रहे थे कि वे उस बच्चे के साथ कभी बात नहीं करेंगे, जो दो बूँद जिंदगी की नहीं पिएगा! बच्चा रोने को हो आया था।’’ यह लघुकथा बहुत ही मार्मिक एवं संवेदनशील ढंग से जनमानस पर मीडिया के प्रभाव के बारे में बताती है और साथ ही हमारे सामाजिक दायित्व को भी समझाती है।
मीडिया का प्रभाव जनसाधारण के मानस पर कितना गहन होता है, सूर्यकांत नागर की लघुकथा ‘मूल्यांकन’ में देखा जा सकता है। इस अत्यन्त संक्षिप्त लघुकथा में नागर बड़ी दक्षता के साथ इस तथ्य को उकेरते हैं कि समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाले व्यक्ति का महत्त्व एक सधारण व्यक्ति से कहीं अधिक हो जाता है। ऐसा व्यक्ति राजनीति से सम्बन्ध रखता हो तो वह समाज में अपना अलग प्रभाव और रुआब रखता है। लेखक ने एक लड़के और उसके अफ़सर पिता के संवाद के माध्यम से इस सामाजिक यथार्थ को कहा है: “पापा! सुबह-सुबह आप कहाँ जा रहे हैं?” . . . “दफ़्तर में मेहरा बाबू हैं न? उन बेचारे के बड़े बेटे की डेथ हो गई है।” . . . “ओह. . . मैं समझा आप चीफ़ मिनिस्टर वाले मेहरा अंकल के यहाँ जा रहे हैं।”
“क्यों?”
“अख़बार नहीं देखा आपने? . . . उनके भाई की लड़की की डेथ हो गई है। आठ बजे फ़्युनरल है।” इस पर पिता कह उठते हैं : “तूने पहले क्यों नहीं बताया! आठ तो बज रहे हैं। चलता हूँ, देर जाएगी।”
“पर पापा. . . ” अख़बार में छपी ख़बर व्यक्ति के दृष्टिकोण को ही बदल देती है, सामाजिक दायित्व की प्राथमिकता को भी बदल देती है, मानवीय मूल्यों के बोध को भी बदल देती है।
ऋता शेखर मधु की लघुकथा ‘दर्द’ सोशल मीडिया के साथ-साथ सिनेमा के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों पर केन्द्रित है। सिनेमा को मनोरंजन की वस्तु माना जाता है; किन्तु लेखिका ने उसे केवल मनोरंजन की वस्तु न मानकर सामाजिक जागृति एवं मानवीय मूल्यों का संवाहक भी माना है। यह शोचनीय विषय है कि आज के अधिकतर सिनेमा में मानवीय मूल्यों की ओर उदासीनता अथवा उपेक्षापूर्ण रवैया देखने को मिल रहा है। लघुकथा दर्द में एक फ़िल्म की कथावस्तु पर अपनी टिप्पणी को सुमित्रा फ़ेसबुक पर साझा करती है, जिससे एक पाठक-मित्र तुषार की भावना आहत हो जाती है: ‘फेसबुक पर सुमित्रा ने लिखा, ‘‘कल मैंने एक सिनेमा देखा― ‘हाउसफुल-3’, जिसमें लँगड़ा, गूँगा और अन्धा बनकर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया…’’ बस पाँच मिनट ही बीते थे यह लिखे हुए कि इनबॅाक्स की बत्ती जली। ये तो तुषार का मेसेज है, सोचती हुई सुमित्रा ने मैसेज खोला। ‘‘दीदी जी, विकलांग क्या मनोरंजन की वस्तु हैं?’’. . . सुमित्रा का फ़ेसबुक मित्र तुषार दोनों पैरों से लाचार था। का संदेश पढ़कर सुमित्रा व्याकुल हो जाती है और आत्मग्लानि से भर जाती है। इससे पहले कि उत्तर में वह उसे कुछ लिख पाती कि तुषार का दूसरा मैसेज आ गया। ‘‘दीदी जी, स्वस्थ इंसान विकलांगों के दर्द कभी महसूस नहीं कर सकते, तभी तो उनके किरदार निभाकर हास्य पैदा करते हैं।’’ सुमित्रा ने कुछ सोचकर एक फोटो पोस्ट किया, जिसमें वह एक प्यारी -सी लड़की के साथ खड़ी थी। उस लड़की की आँखें बहुत सुन्दर थीं। ‘‘बहुत प्यारी बच्ची है दीदी, ये कौन है?’’ ‘‘मेरी छोटी बहन, जो देख नहीं सकती। . . . मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देखकर मुझे मज़ा आया।’’ यह बात जानकर तुषार भी विचलित हो जाता है “सॉरी कहकर क्षमा याचना करता है। किन्तु सुमित्रा बात को सँभालते हुए, समाज के रवैये पर तंज कसती हुए तुषार को कुछ इस प्रकार समझाती है: ‘‘सॉरी की बात नहीं तुषार, दर्द से हास्य पैदा करना ही तो दुनिया की आदत है। अब बताओ तो, विकलांग कौन है?’’
महेश शर्मा की लघुकथा “नेटवर्क” भी सोशल मीडिया के जाल में फँसे आज की पीढ़ी पर कटाक्ष करती है। इस लघुकथा के पात्र को कई दिनों से सोशल नेटवर्क पर न ज्यादा लाइक मिल रहे थे, न कमेंट्स। हर पोस्ट औंधे मुहँ गिर रही थी। छुट्टी के दिन देखकर बहुत सोच कर उसने एक ब्रह्मास्त्र चलाया और स्टेटसअपडेट किया – “डाउनविद हाई फीवर!!” . . . इस बीच, लाइक्स और कमैंट्स की रिसीविंगटोन बार-बार बजती रही। तीर निशाने पर लग चुका था। – लंच के बाद, अपना फोन लेकर वो इत्मीनान से बिस्तर में लेट गया। – “गेट वेल सून”, – “ओ बेबी ख्याल रखो अपना”, – “अबे क्या हो गया कमीने” – वगैरह-वगैरह-!!” टिप्पणियों की संख्या गिनते हुए, और प्रत्येक कमेंट को सौ-सौ बार पढ़ते हुए, और इस बीच टीवी देखते-देखते कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। वह चौंककर उठा तो देखा कि शाम गहरा गयी थी, और कोई दरवाज़ा खटखटा रहा था। “जी, कहिए?” उसने उलझन भरे स्वर में पूछा। . . . “न – नहीं, कुछ खास नहीं” -दरवाज़े पर खड़े उस अधेड़ उम्र के शख्स ने कहा, “वो तुम आज सुबह से बाहर नहीं निकले, तो सोचा पूछ लूँ! – मैं सामने वाले वन रूम सेट में ही तो रहता हूँ. . .” जो फ़ेसबुक पर दुनिया भर से जुड़ा था, वह अपने पड़ोस के व्यक्ति से सर्वथा अनभिज्ञ था। नि:सन्देह यह लघुकथा एक आभासीय दुनिया में जी रहे वर्तमान के समाज में मानवीय रिश्तों की निरन्तर बढ़ती अशिष्टता एवं उदासीनता को उजागर करती है।
हिंदी साहित्य के कोश में ऐसी कई लघुकथाएँ हैं जो भारत में समकालीन सामाजिक वास्तविकता से संबंधित कई मुद्दों और समस्याओं को उठाती हैं। इन लघुकथाओं से पाठक समाज को साहित्य और मीडिया से जोड़ने में इस विधा के महत्व को अच्छी तरह समझ सकते हैं।