परिवार समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है। परिवार के उद्भव एवं विकास के संबंध में विचारकों में मत वैभिन्न्य हो सकता है पर यह निर्विवाद है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में परिवार की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। परिवार ही वह पाठशाला है, जिसमे बच्चा जीवन के प्रारम्भिक पाठ पढ़ता है, जहाँ उसके अंदर संस्कारों का बीजारोपण होता है और संस्कारों के वही बीज आजीवन फलते-फूलते और उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। समाजशास्त्रियों की दृष्टि में विवाह संस्था की उत्पत्ति के मूल में स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंध रहे हैं; पर शनैः-शनैः उसके स्वरूप और चरित्र में परिवर्तन होते गए। दैहिक-संबंधों से शुरू हुई यह संस्था स्त्री-पुरुष को परस्पर और स्वयं से उत्पन्न संतति को प्रगाढ़ स्नेह संबंधों में बाँधकर रखने का एक प्रमुख केंद्र तो बनी ही, साथ हो उनके शारीरिक और मानसिक विकास में भी उसकी प्रमुख भूमिका हो गई। सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार के स्वरूप एवं चरित्र में भी परिवर्तन होता रहा है। कृषि सभ्यता दौर में कुटुंब /संयुक्त परिवार- प्रणाली थी, जिसमे प्रायः एक ही परिवार में जन्मे सभी पुरुष सदस्य और उनके परिवार एक साथ रहते थे। इन परिवारों में में सदस्यों की संख्या अधिक रहती थी और सभी के दायित्व बँटे रहते थे। यहीं से परस्पर अनेक रिश्तों का भी जन्म हुआ। प्रत्येक रिश्ते के अलिखित नैतिक दायित्व थे, प्रत्येक परिवार के कुछ मूल्य थे और ये मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आते रहते थे। बचपन में जिन बच्चों का पालन पोषण माँ-बाप करते थे उन्हीं के वृद्ध होने पर उनके पोषण और संरक्षण का दायित्व बेटों का होता था, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते थे। पुरुष कामकाजी होते थे, आर्थिक सत्ता उन्हीं के हाथों में रहती थी, स्त्रियाँ घर के कार्य करती थीं, उनके पोषण का दायित्व पुरुष का होता था।
कृषि सभ्यता के बाद औद्योगिक सभ्यता का आगमन हुआ। इस व्यवस्था में, रोजगार की तलाश में लोगों का ग्रामों से पलायन हुआ और परिवार का परंपरागत ढाँचा छिन्न-भिन्न होने लगा। आर्थिक दबावों ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाना शुरू किया, तो पारिवारिक मूल्यों का क्षरण होने लगा। विकास-क्रम में पूँजीवाद और बाज़ारवाद के विस्तार ने पारिवारिक मूल्यों को तीव्र गति से क्षति पहुँचाई। परिणामतः पारिवारिक संरचना बदलने लगी और पारस्परिक रिश्तों में नए प्रकार के द्वन्द्व और तनाव पनपने लगे। तकनीक ने भी इन रिश्तों को प्रभावित किया और समाज में नए प्रकार के समीकरण बनने लगे। सजग साहित्यकारों ने इस बदलाव को पहचानकर गंभीरता के साथ उन्हें साहित्य में अभिव्यक्त करना प्रारंभ किया। हिन्दी लघुकथा ने भी परिवार में होने वाले इन बदलावों और संबंधों को पहचाना और अंकित किया। हिन्दी का शायद ही कोई लघुकथाकार हो, जिसने पारिवारिक संबंधों, मूल्यों और बदलावों पर नजर न डाली हो और उन्हें अपनी लघुकथा में व्यक्त न किया हो। प्रत्येक लघुकथा का उल्लेख एक संक्षिप्त आलेख में संभव नहीं, किन्तु कुछ लघुकथाओं के परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जा सकता है।
परिवार की संरचना दाम्पत्य संबंधों एवं रक्त संबंधों से मिलकर होती है, इनमें पति-पत्नी, बेटे-बहू-बेटी, भाई-बहन के रिश्ते प्रमुख होते हैं। प्रत्येक रिश्ते के महत्त्व और मर्यादाएँ समाज द्वारा निर्धारित हैं। इन रिश्तों के सम्मान एवं सौहार्द हेतु समाज में अनेक पर्व-उत्सव, रीति-रिवाज भी बनाए गए हैं। परिवार में सबसे पवित्र और कोमल रिश्ता भाई-बहन का होता है, ये रिश्ता बहुत पवित्र एवं पूज्य माना जाता है। स्नेह का एक अव्यक्त धागा उन दोनों को आजीवन बाँधे रहता है, अनेक प्रकार की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराएँ उनके स्नेह को जीवंत रखती हैं। विवाह-पूर्व तक मायके में बहने अपने भाई या भाइयों के निकट होती है, उनकी लाड़ली रहती हैं, ससुराल जाने के बाद भी वह तीज-त्योहार, विवाह जैसे समारोहों में रस्मों के नाम पर भाई से कुछ माँगना अपना हक समझती हैं। भाई भी इन रस्मों को पूरा करना अपना कर्तव्य समझते हैं पर बदलाव के इस दौर में जब से कानूनन बेटियों को पिता की संपत्ति में अधिकार मिला तब से इन संबंधों में दरार आने लगी है, दिलों में स्नेह के स्थान पर खटास पनपने लगी है। श्याम सुंदर अग्रवाल की लघुकथा ‘रिश्ते’ में इस बदलाव से भाई-बहनों के संबंधों में आती तिक्तता को गहराई से व्यक्त किया गया है। ‘रिश्ते’ की सरिता छोटे से पैतृक मकान में कानूनन अपना हिस्सा अपने भाई से ले चुकी है। भाई की आर्थिक हैसियत बहुत अच्छी नहीं है, अतः वह किराए के मकान में रह रहा है। सरिता अपने भाई के घर बेटी के विवाह हेतु ‘भात’ माँगने आती है, वह चाहती है कि भैया उसकी प्रतिष्ठा के अनुसार भात लेकर आए , भले ही इस रस्म को निभाने हेतु उसे कर्ज लेना पड़े वह भाई से कहती है- “भैया सामाजिक रीति रिवाजों का निर्वाह तो करना ही पड़ता है। ऐसे वक्त तो भाई कर्ज लेकर भी अपना और बहन का मान रखता है।” इस पर भाई तल्खी से कहता है- “दीदी, पारिवारिक रिश्तों में सरकार और समाज दोनों के कानून एक साथ नहीं चलते। उनमें से एक को ही चुनना होता है। आपने सरकार का कानून चुना; इसलिए समाज के रीति-रिवाज निभाने की दुहाई देने का कोई हक नही रह गया आपको।” …यह एक कड़वी सच्चाई है। संपत्ति में बेटियों के हक के बाद परिवार में भाई-बहनों के रिश्तों में दूरियाँ बढ़ी हैं, यहाँ गलत- सही का विवेचन करना अभिप्रेत नहीं है ; पर उस सौहार्द में कमी तो आई ही है।
पारिवारिक रिश्तों में कहीं सौहार्द है, कहीं अनबन है, कहीं चिंताएँ हैं और कहीं तनाव हैं। ये चिंताएँ अनेक प्रकार की हैं। इन चिंताओं में बेटी का जन्म होना भी एक बड़ी चिंता का विषय है। दरअसल समाज का ताना-बाना इस प्रकार का है जिसमे बेटियों को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है, जन्म से लेकर जीवन-पर्यंत उसे विवध प्रकार के संत्रास से गुजरना पड़ता है ; इसीलिए परिवार में बेटी का होना माता-पिता को नित्य नवीन प्रकार की चिंताओं एवं आशंकाओं से ग्रस्त रखता है। कहने को भले ही बेटे-बेटी में कोई फर्क न हो पर समाज की सोच में बदलाव बहुत धीमी गति से हो रहा है अभी भी कदम-कदम पर बेटियों को तो त्रास सहने ही पड़ते हैं साथ ही अभिभावकों को भी अनेक प्रकार की वेदनाओं में जीवन- यापन करना होता है यहाँ तक कि बेटी का विवाह कर देने पर भी माँ-बाप चिंतामुक्त नहीं रह पाते। बहुधा ससुराल में त्रास भोग रहीं बेटियाँ, अपने कष्ट किसी से कह भी नहीं सकतीं। यहाँ तक कि यदि अपने माता-पिता को वे पत्र लिखें तो वे भी ससुराल में सेंसर किए जाते हैं। सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘बेटी का खत’ में एक पिता की इसी वेदना को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। लघुकथा शुरू ही पिता की चिंता से होती है- ‘बेटी का खत पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं’..पति का चेहरा देख कर पत्नी को भी चिंता होती है, वह भी बेटी के खत को पढ़ती है। …खत खैरियत वाला ही था, बेटी ने माँ-बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राजी-खुशी लिखी थी। पत्र के अंत में लिखा था-‘राजू भैया की बहुत याद आती है।’। माँ को खत में कुछ असामान्य नहीं लगता। वह दैनिक कार्यों में व्यस्त हो जाती है पर पिता उस खत को हाथ में लिए चिंतित भाव से बैठे रहते हैं, वे पत्नी से कहते है, ‘‘सोचता हूँ कल रजनी बेटी के घर हो ही आऊँ,…पति की उदासी देखकर पत्नी पूछती है, “आखिर हुआ क्या है? कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थे, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो, … वे पति को कसम देती हैं “तुम्हे मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ…’‘ आखिर वे भर्राए स्वर में बतलाते हैं- पिछली बार रजनी ने बतलाया था कि उसके ससुराल वाले उसकी कोई भी चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देते, तो मैंने कहा था- ‘‘भविष्य में अगर वे लोग तंग करें और वह हमे बुलाना चाहे तो खत में लिख दे राजू भैया की बहुत याद आ रही है, इस बार उसने खत में यही तो लिखा है।”
ससुराल में बेटियों की प्रताड़ना और मायके में माँ-बाप की चिंता, परिवारों की बहुत पुरानी समस्या है यद्यपि बेटियों के शिक्षित और आत्मनिर्भर होने के बाद इस समस्या में कमी तो आई है; पर समाप्त नही हुई है,। अभी भी बेटियाँ ससुराल में बहुत कुछ सहती हैं पर लज्जा, मर्यादा या माता-पिता को दुःख न देने की भावना से जब तक संभव हो अपनी प्रताड़ना को छुपाए रखती हैं, प्रायः माँ- बाप बेटियों के चेहरे से उनके दुःखों का अनुमान कर लेते हैं। भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की लघुकथा ‘दरिंदे’ इसी वेदना को अभिव्यक्त करती है। कथा नायिका गौरांगी मायके आई है। स्नेह में भरी माँ, बेटी का सर धोना चाहती है, बेटी उसे टाल रही है, पर माँ मानती नहीं है। गौरांगी के बाल धोते हुए माँ उसके गर्दन और पीठ पर पड़े निशान देखकर चौंकती है और उनके बारे में पूछती है। गौरांगी सच छुपाना चाहती है, पहले माँ की दृष्टि गर्दन के निशान पर पड़ती है, वह चौंककर पूछती है, ‘‘अरी ये इत्ता बड़ा निशान काहे का है यहाँ?” बेटी टाल देती है-घर के पिछवाड़े आँधी में पेड़ गिर गया था। उसका लक्कड़ उठा लाई थी, उसी का निशान होगा। माँ को विश्वास नहीं होता।“ये इत्ता बड़ा निशान लक्कड़ का नहीं हो सकता….ये निशान कुछ और ही कह रहा है..अरी दइया ये तो पूरी पीठ ही हरी-नीली पड़ गई है..” बहुत कुरेदने पर बेटी के मुख से सच बाहर आता है-“गर्मियों में एक बैल मर गया था। सास-ससुर और तुम्हारे दामाद पीछे पड़ गए कि मायके जाकर बैल खरीदने के लिए पैसे लेकर आओ। रोज मारपीट करते। .. तुम लोगों के हालात तो मैं जानती थी। उन्हें बताया; पर वे सुनने को तैयार न थे। दरिंदगी पर उतर आए। चार-चार दिन भूखा -प्यासा कमरे में बंद रखा.. क्रूरता यहीं खत्म नहीं हुई अंततः बेटी बैल के स्थान पर स्वयं जुती .. “और ये निशान?” पूछने पर उत्तर मिला –“हल जोतते व्यक्त वह नशे में भूल जाते थे कि हल में बैल नहीं, मैं जुती हूँ।’यह क्रूरता कि पराकाष्ठा है, सुनने में बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है पर सच्चाई यही है कि अभी भी अनेक बेटियों को ससुराल में इससे अधिक प्रताड़ना सहती पड़ती हैं पर अपनी पीड़ा किसी से व्यक्त नहीं कर पातीं।
बेटियों के जीवन की समस्याएँ कई प्रकार की होती हैं। कभी-कभी उन्हें पारिवारिक व्यभिचार का भी शिकार होना पड़ता है। बहुत नजदीकी रिश्ते भी ऐसा छल करते हैं, जो बेटियों के मन पर न मिटने वाला दाग छोड़ जाते हैं। फटी चुन्नी (सत्या शर्मा ‘कीर्ति’) की सीमा ऐसी ही लड़की है, जो 14 वर्ष की अवस्था में अपने पिता-तुल्य फूफा द्वारा ही दैहिक शोषण का शिकार हुई है ; पर बुआ की गृहस्थी की चिंता के कारण किसी से बताती भी नहीं है। समाज की सोच कुछ इस प्रकार निर्मित हुई है कि बेटियों का जन्म एक अभिशाप की तरह देखा जाता है, बेटी को जन्म देने वाली माँ को परिवार में ही हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और उसे लगातार ताने सुनने को मिलते हैं। एक बड़ा अंतर्विरोध यह भी है कि घर के बाहर तो वे बेटी के जन्म को सौभाग्य बतलाते हैं, पर घर में बेटी को जन्म देने वाली माँ को तिरस्कृत करते हैं।
डॉ.कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’ की लघुकथा ‘सिसकी’ इस आडम्बर को बड़ी गहराई से उभारती है। पाँचवीं बेटी को जन्म देने वाली कमला को उसकी सास हिकारत की दृष्टि से देखती हुई ताना देती है, “तूने कौन- सा गुल खिलाया है, महारानी? यह भूसे का डला, वह भी पाँचवीं बार। अब तक एक पोते को तरस गई।’वहीं पास ही बैठा कमला का पति , जिसने बच्ची को अभी तक भी गोदी में नहीं लिया था; बच्ची के फोटो क्लिक करके फेसबुक पर अपलोड कर रहा था; वॉल पर लिख रहा था; ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। ‘ फेसबुक पर फ़ोटो पोस्ट करके वह उठकर बाहर चला गया। …..लघुकथा यहीं समाप्त नही होती, कमला के पास वाले बेड पर भर्ती शांति का छठी बार गर्भपात हुआ है, विवाह के पंद्रह वर्षों बाद भी वह माँ नहीं बन पा रही है…ठीक उसी समय जब कमला को बेटी होने पर लानत दी जा रही थी, शांति अपने पास ही पालने में लेटी बच्ची को तरसती हुई नज़रों से देखकर सिसक -सिसककर रोने लगती है….काश उसके ऐसी बच्ची होती !!….इस अंतर्विरोध ने मातृत्त्व की संवेदना तथा बेटी की उपेक्षा और महत्ता को अधिक सघनता से उभार दिया है।
जहाँ समाज में बेटी को अभिशाप की तरह देखा जा रहा है वहीं कुछ सकारात्मक सोच के प्रगतिशील लोग भी हैं, जो इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए बेटी के जन्म को भी उत्सव की तरह लेते हैं और अपने उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति भी करते हैं, यद्यपि ऐसी सकारात्मक सोच वाले लोग अभी कम ही हैं; पर यह मनोवृत्ति सामाजिक बदलाव का संकेत तो देती ही है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा ‘नवजन्मा’ इसी सकारात्मक भाव-बोध की सुंदर लघुकथा है। ‘नवजन्मा’ के जिलेसिंह को बेटी होने पर दादी सचेत करती है-“जिल्ले ! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे छोरी हुई है!” बहन फूलमती मुँह बनाकर कहती है-“भाई लड़का होता तो ज्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया.. पहला जापा था सोचा था खूब मिलेगा।’’ घर वालों के तानों से जिलेसिंह के माथे पर कुछ क्षण के लिए चिंता की रेखाएँ उभरती हैं; पर वह तत्काल इनसे मुक्त होकर घर से बाहर निकल जाता है और अपने साथ ढोल बजाने वाले को लेकर लौटता है। ढोल वाले को ढोल बजाने का आदेश देकर जिलेसिंह अलमारी से अपनी वह तुर्रेदार पगड़ी निकालकर बाँधता है, जिसे वह शादी-ब्याह या वैशाखी जैसे मौकों पर ही बाँधता था, उस पगड़ी को बाँधकर ढोल की गिड़गिडी पर वह पूरे जोश से आँगन में नाचता है और सौ का नोट नवजात के ऊपर न्योछावर करके ढोलिया को थमा देता है। बेटी के जन्म को भी उत्सव की तरह लेने की मनोदशा की यह अत्यंत सुंदर, सकारात्मक और प्रेरक लघुकथा है।
भारतीय परिवारों में वृद्धों कि अलग प्रकार कि समस्याएँ हैं। प्रायः वे उपेक्षा और अकेलेपन की व्यथा से जूझते हैं। यद्यपि भारतीय संस्कृति- ‘मातृदेवो भव , पितृदेवो भव’ की पोषक है। यहाँ वृद्धजनों को परिवार का वट वृक्ष माना जाता है, जिनकी घनी और शीतल छाँव परिजनों को निश्चिंतता एवं संरक्षण प्रदान करती है, पर ये विडंबना ही कही जाएगी कि एकल होते परिवारों में यह भावना तिरोहित हो रही है। अनेक परिवारों में बुजुर्गो को समुचित सम्मान नहीं मिलता। वे उपेक्षित रहकर एकाकीपन के दंश झेलने को अभिशप्त रहते हैं। वृद्धों की इस स्थिति और मनोदशा को अनेक लघुकथाओं में देखा जा सकता है।
डॉ.छवि निगम की लघुकथा ‘फाँक’ में वृद्धा माँ बेटे-बहू द्वारा उपेक्षित है, बेटा घर में आम लेकर आया है; पर बहू उसे आम की एक फाँक तक खाने को नहीं देती है। बहू द्वारा वृद्धा की उपेक्षा संवेदना को और सघन बनाते हुए लेखिका वृद्धा को उसके उस अतीत में ले जाती हैं, जहाँ उसे भी अपनी सास से इसी प्रकार का व्यवहार करते दिखाया गया है- “बरामदा पार करते हुए अचानक उनकी नज़र कोने में पड़ी कबाड़ से ढकी…बेंत की आरामकुर्सी पर पड़ी, तो वे ठिठक गईं। सुन्न होते शरीर से…बस उसे देखती ही रह गईं। फिर घिसटते कदमों से वे लौट पड़ीं। अब उन आँखों में नमी तैर रही थी, और यादों में एक धीमी घिघियाती आवाज़-“ज़रा-सा दे दो बहूरानी…बस एक फाँक..” अर्थात् उपेक्षा की यह प्रवृत्ति नई नहीं है।
प्रियंका गुप्ता की ‘भूकंप’ में अचानक आए भूकंप में पत्नी द्वारा हड़बड़ी में घर से बाहर खींच कर ले गए पति को याद आता है- बुजुर्ग और अपाहिज पिता तो घर में ही रह गए। वह अंदर जाने लगता है, तभी अचानक विचार आता है कि बाऊजी की जिंदगी की अहमियत ही अब कितनी है, उनकी सेवा करके वैसे ही थक चुका है। यदि भूकंप में ही उन्हें कुछ हो जाए, तो उसके सिर कोई इल्जाम भी नहीं आएगा। तभी उसकी पत्नी चीखती है, हड़बड़ी में उनका दुधमुँहा बच्चा पालने में ही रह गया है..वे अंदर की ओर भागते हैं, तभी यह देखकर स्तब्ध रह जाते हैं कि एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उनका दुधमुँहा लाल था। यह लघुकथा, जहाँ बेटे द्वारा पिता की उपेक्षा की बात करती है, उसी के समानांतर वृद्ध और अपाहिज पिता की संवेदना भी सामने लाती है।
अकेलेपन से जूझना आज के वृद्धजनों की बड़ी समस्या है, सरोज परमार की ‘मानुस-गंध’ इस समस्या को अत्यंत तीक्ष्णता से उभारती है। घर में अकेली रहती एक वृद्धा मानुष-गंध तक को तरसती है। उसकी जरूरत के सामान की व्यवस्था तो महीने में एक दिन कोई रिश्तेदार आकर कर जाता है; पर शेष दिन उसे अकेले ही व्यतीत करने पड़ते हैं। वृद्धा किसी से बोलने-बात करने को तरसती रहती है। एक दिन अचानक एक लुटेरा, उसे लूटने के उद्देश्य से घर में घुस आता है। कमजोर दृष्टि वाली वृद्धा उसे पहचान तो नहीं पाती; पर लुटेरे के आने से अचानक घर में घुलने वाली मानुष-गंध उसके हृदय को प्रसन्नता से भर देती है। वृद्धा के चेहरे पर फैली स्वागत की मुस्कान, लुटेरे को भी स्तंभित कर देती है। लेखिका ने वृद्धा की इस संवेदना को बहुत गहराई से व्यक्त किया है- ‘आँखें कमज़ोर सही, पर उस झुटपुट अँधेरे में गौर से देखा, तो नज़र आ ही गया। सचमुच में एक जीता जागता इंसान! बरबस ही उनके चेहरे पर कर्णचुम्बी मुस्कुराहट फैल गई। भय, आतंक, निरीहता देखने के आदी लुटेरे की विमूढ़ दृष्टि देख रही थी-कभी अपने हाथ के हथियार को और कभी उस अजनबी चेहरे की स्वागतपूर्ण हार्दिक मुस्कुराहट को।’
सोशल मीडिया ने एक नई संस्कृति को जन्म दिया है, जिसमें रिश्ते यथार्थ में कम, सोशल मीडिया पर ज्यादा निभाए जा रहे हैं। डॉ. सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘संवेदनाओं के डिजिटल संस्करण’ इसी प्रकार की लघुकथा है। यह कथा, स्तब्ध करती है। परिवार में वृद्धों की उपेक्षा करने वाला व्यक्ति, सोशल मीडिया पर अपनी आदर्शवादी छवि स्वयं ही निर्मित कर रहा है। हॉस्पिटल में एडमिट बीमार पिता की सेवा करने से अधिक दिखाने का भाव बेटे के अंदर है। वह बीमार पिता की फोटो और अपना उदास चेहरा सोशल मीडिया पर पोस्ट करता रहता है। पिता की मृत्यु हो जाने पर उनके दाह- संस्कार और त्रयोदशी भोज के चित्र पोस्ट करके लोगों के लाइक्स और कमेंट बटोरकर एक आदर्शवादी बेटे की छवि निर्मित करता है, वहीं बीमार बूढ़ी माँ जब दवा लाने को कहती है, तो उपेक्षा से उसे झिड़क देता है और सोशल मीडिया पर “पाँच मिनट में नया स्टेटस अपडेट हुआ…पिताजी के बाद अब माँ की तबियत बिगड़ने लगी है। हे ईश्वर अब मुझ पर रहम करो!मुझमें अब और खोने की शक्ति नहीं बची है।”
नई पीढ़ी भले ही बुजुर्गों की उपेक्षा करे, उन्हें स्वार्थी समझे; पर पुरानी पीढ़ी के बुजुर्ग अब भी बच्चों की उसी भाँति चिंता करते हैं, जैसे बचपन में करते थे। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की चर्चित लघुकथा ‘ऊँचाई’ इसी संवेदना को व्यक्त करने वाली प्रभावी लघुकथा है। पारिवारिक रिश्तों और पिता के संवेदनशील चरित्र को इस लघुकथा में बहुत सूक्ष्मता से उभारा गया है। यह लघुकथा अधिकतर मध्यवर्गीय परिवारों की कथा है। शहर में रह रहे बेटे के घर, गाँव से पिता आए है। उन्हें देखते ही बेटे की पत्नी तमतमाकर पति से कहती है- ‘‘लगता है बूढ़े को पैसों की जरूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था।’’ बेटे के अंदर भी आशंकाएँ जन्म लेती हैं। घर में बोझिल चुप्पी पसर जाती है। इन्ही आशंकाओं के बीच वह पिता को खाना खिलाता है। खाना खा चुकने पर पिताजी उसे पास बैठने का इशारा करते हैं, तो उसकी शंका और बढ़ जाती है कि पिता जरूर कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। प्रायः मध्य वर्ग के परिवारों में ऐसी ही आशंकाएँ पनपती रहती है, पर यहाँ पिता पैसे नहीं माँगते; अपितु बेटे के हाथ में सौ-सौ के दस नोट यह कहते हुए रख देते है कि…”रख लो तुम्हारे काम आएँगे धान की फसल अच्छी हो गई थी….ढंग से खाया पिया करो, बहू का भी ध्यान रखो। “- इस एक वाक्य से बेटा पिघल जाता है। वह संकोच से भर उठता है, तो पिता कहते हैं- “रख लो, बहुत बड़े हो गए हो क्या”- इस एक संवाद से पिता उन ऊँचाइयों पर पहुँच जाते हैं, जहाँ तक बेटे की दृष्टि नहीं पहुँच सकती।
नई पीढ़ी सदैव वृद्धों की उपेक्षा ही नहीं करती। आज भी माता-पिता को यथोचित सम्मान देने वाली संतानें भी हैं। श्याम सुंदर अग्रवाल की लघुकथा-‘माँ का कमरा’ ऐसे ही आदर्श बेटे का चरित्र व्यक्त करती है। गाँव से आई उसकी माँ बेटे के घर में आने से पूर्व अनेक आशंकाओं से घिरी है; पर जब बेटा उसे सुख सुविधा सम्पन्न कमरे में रुकने को कहता है, तो उसकी सारी आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध हो जाती हैं। अश्विनी कुमार आलोक की ‘तीर्थयात्रा’ भी इसी भाव-बोध की लघुकथा है। यह लघुकथा एक साथ अनेक अर्थ खोलती है। एक सम्पन्न बेटा अपने से कम आर्थिक हैसियत वाले बड़े भाई को अपने माता-पिता की दृष्टि में हेय सिद्ध करने हेतु, उन्हें तीर्थयात्रा का टिकट बुक करा देता है। जब वे तीर्थयात्रा पर जाने लगते हैं, तो बड़ी बहू उन्हें कुछ देना चाहती है। पास में केवल सौ रुपये ही हैं। बेटा अपनी पत्नी को झिड़कता है-“इतनी बड़ी यात्रा में सौ रुपल्ली ढेले की तरह हैं।’’ पर बहू कहती है-‘‘माँ बाबूजी की तीर्थ यात्रा में भले ही इसका कोई मोल न हो पर हमारी तृप्ति तो हो जाएगी।’’ बहू की यह भावना महत्त्वपूर्ण है, यही बात उसकी सास सुन लेती है और वह तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम रद्द करके पति से कहती है-“मेरा कहा मानो, असल तीर्थ तो इस घर में है।’’
महेश शर्मा की लघुकथा ‘जायका’ में भी एक साथ कई चित्र समाहित हैं, नई पीढ़ी के समृद्ध और समर्थ कामकाजी दम्पती और उनकी पारिवारिक संस्कृति के साथ ही निम्न मध्यवर्ग की संस्कृति और पुरानी पीढ़ी की माँ के खाने के स्वाद के चित्र एक साथ हैं। वर्तमान व्यवस्था ने परम्परागत परिवार व्यवस्था को छिन्न- भिन्न किया है। परिवार एकल तो हुए ही हैं, साथ ही पति- पत्नी दोनों ही कामकाजी भी हो गए हैं। दोनों को नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है। ऐसे में घरों में बनाने वाले भोजन या व्यंजनों का चलन लुप्त हुआ है। उसके स्थान पर बाजार के भोजन ने घर में प्रवेश कर लिया है। जायका के दम्पती कार्य से घर लौट रहे है। पत्नी बच्चो को फोन करती है..आज डिनर में क्या खाना है…बच्चों की फरमाइश शुरू हो जाती है..मम्मा आज पनीर बटर मसाला, नहीं… नहीं मेरे लिए तो मेथी मलाई मटर और स्टप्ड पराठा, नो माम, मुझे स्टिर फ्राई ब्रोकली खाना है….और मम्मी बच्चो की फरमाइश सुनकर फोन पर किसी एप पर ऑर्डर देने लगती हैं। इस लघुकथा को यहाँ अल्प विराम देकर परंपरागत परिवार व्यवस्था को स्मरण किया जाए…जब घर पर बच्चों को भूख लगती थी, तो उनकी फरमाइश पर माँ किचन में जाकर उनके लिए व्यंजन बनाती थी। तब बाजार नही था, ये फास्ट फूड नहीं थे और ऑनलाइन शापिंग ‘एप’ भी नहीं थे। आज बाजार ने परिवार की उस व्यवस्था को नियंत्रित करके अपने हाथों में ले लिया है। बच्चों के स्वाद और पसंद की प्राथमिकताएँ भी बदल गई हैं। माँ के हाथों के स्नेह-पगे स्वाद से बच्चे वंचित हो रहे हैं। उसका स्थान बाजार के भोजन ने ले लिया है, पर कथा इतनी ही नहीं है, … कथा आगे बढ़ती है, पत्नी ‘एप’ पर खाने का आर्डर बुक कर रही है और कार ड्राइव कर रहे पति कह रहे हैं कि मेरे फोन में एक नया ‘एप’ है उससे ऑर्डर करो, वह अच्छा खाना देता है, तुम्हारे वाले ‘एप’ से आया भोजन डिलीवरी बॉय जूठा कर देते है…पता नहीं बच्चे किस-किस का जूठन खाते हैं, इस बात पर पति-पत्नी में नोंकझोंक होती है….ये परिवारों के लिए नया संकट है…..पत्नी अपने ही ‘एप’ से आर्डर करती है, डिलीवरी बॉय घर के बाहर ही मिल जाता है, उसका पैकेट थोड़ा खुला है, पत्नी को लगता है कि इसने भोजन चुराकर खा लिया होगा, वह डिलीवरी बॉय को डाँटते हुए भोजन के पैकेट वहीं फेंक देती है और पति अपने मोबाइल से नए वाले ‘एप’ पर ऑर्डर देने लगता है, तभी डरा- सहमा डिलीवरी बॉय कहता है- ‘‘साब, हम यह सब खाना नहीं खाते। भगवान की कसम साब, हम तो अपनी अम्मा के हाथ का बना खाना ही…’’ अचानक आर्डर देते पति की उँगलियाँ ठिठक गईं…लघुकथा का यह चरमोत्कर्ष यह अंत, सहृदय पाठक को स्तब्ध कर देता है और अचानक ही माँ के हाथों के खाने का स्वाद मुँह में घुलने लगता है।
परिवार ही वह संस्था है, जिसके अंदर बच्चों के अंदर शुभ संस्कारों का बीजारोपण होता है। परिवार, बच्चों को धैर्य, सहनशीलता और रिश्तों का सम्मान करना सिखाते हैं। वर्तमान में संयुक्त परिवार तीव्र गति से टूट रहे हैं बिखर रहे हैं। अनेक युवाओं को प्रतीत होता है कि गाँवों में बच्चों का सही विकास नही हो पाएगा। वे बच्चों को लेकर घर छोड़कर चले जाते हैं। बाद में उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा होता है। विरेंद्र ‘वीर’ मेहता की ‘दिन अभी ढला नहीं’ इसी विषय की लघुकथा है। उमाशंकर और उनकी पत्नी सुधा अपने गाँव लौट रहे हैं। वर्षो पूर्व वे संयुक्त परिवार छोड़कर गाँव से इसलिए चले गए थे; क्योंकि वे गाँव के अनपढ़-देहाती माहौल से बच्चों को दूर रखना चाहते थे। उन्होंने बच्चों को विदेश ले जाकर उन्हें हर प्रकार से सफल व्यक्ति तो बना दिया, पर उचित संस्कार नहीं दे पाए। वर्षो बाद इसी पछतावे के साथ वे गाँव लौटते हैं। उन्हें वर्षो बाद ये समझ में आता है कि ‘संस्कार तो प्रकृति के वे बीज होते हैं, जो परिवार के बुजुर्गों और अपनों के सान्निध्य, प्रेम में ही पैदा होते हैं।’
दाम्पत्य-संबंधों पर भी लघुकथाकारों ने काफी लिखा है। वस्तुतः पति-पत्नी संबंध ही परिवार का मूल आधार है, स्त्री-पुरुष संबंधों ने ही परिवार को जन्म दिया बाद में ये संबंध प्रगाढ़ होते गए। परंपरागत रूप से परिवार में दोनों के अपने अधिकार हैं, अपने कर्तव्य हैं; पर इनसे इतर दोनों की आपसी समझ से ही परिवार चलते हैं। पति-पत्नी में परस्पर नोंक-झोंक और सौहार्द भारतीय परिवारों का स्थायी भाव जैसा है, शायद ही कोई ऐसा परिवार हो, जहाँ पति-पत्नी में नों कझोंक न होती हो। संतोष सुपेकर की लघुकथा ‘आर्द्रता’ इस भाव को व्यक्त करने वाली बहुत सुंदर लघुकथा है। एक छोटे से स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेन के कुछ यात्री अपनी-अपनी जरूरतों के लिए प्लेटफार्म पर उतर आते हैं, बारिश की संभावना है, अचानक यात्रियों की दृष्टि दूर से ट्रेन की ओर आते एक झगड़ा करते दम्पती पर पड़ती है। छोटी- सी बंद छतरी हाथ में लेकर आता हुआ पति, अपनी पत्नी को बुरी तरह डाँट रहा था- “तू समझती क्या है, अपने आपको? पहले तेरे भाई ने मेरा मजाक उड़ाया तब तूने उसका साथ दिया। अभी परसों तेरी भाभी ने मेरी इंसल्ट की, तब भी तू चुप रही। ध्यान रखना, मैं उसकी भी अक्ल ठिकाने लगा दूँगा और तेरी भी..”-उसका बढ़ता हुआ गुस्सा देखकर लोगों को लग रहा था कि वह अभी अपनी औरत को पीटने लगेगा। औरत जार-जार रोती हुई उसके साथ चल रही थी .. तभी जोरदार बारिश शुरू हो जाती है। यात्री भागकर अपने-अपने कोच में आ जाते हैं, सब उत्सुकतावश बाहर उस दम्पती को देखते हैं, तो दंग रह जाते हैं; ‘बारिश चालू होते ही लड़ते-झगड़ते, औरत को मारने पर उतारू उस आदमी ने छतरी खोलकर औरत के सिर पर तान दी थी और खुद पूरी तरह भीगता हुआ, उसके साथ चल रहा था। हालाँकि उसका डाँटना- फटकारना एवं औरत का रोना-धोना अब भी जारी था।’’ यही भारतीय परिवारों में पति-पत्नी के रिश्तों की स्वरूप है, जहाँ एक दूसरे कि चिंता और गुस्सा साथ-साथ चलते हैं। दाम्पत्य संबंधों की एक विशेषता यह भी है कि दोनों एक दूसरे के मन को पढ़ना जानते हैं। ‘बेटी का खत’ (सुकेश साहनी) का पति अपनी पत्नी को सच्चाई नहीं बताना चाहता; पर पत्नी उसके मनोभावों को पढ़ लेती है और उसे अपनी सौगंध देकर सत्य जान लेती है। कमलेश भारतीय की ‘कुछ खास नहीं’ भी इसी भाव को व्यक्त करने वाली लघुकथा है। वृद्ध दम्पती के जीवन की इस कथा में पति दाँत- दर्द से पीड़ित है और पत्नी पीठ दर्द से। दोनों घर पर अकेले है। सारा दिन दर्द सहते हैं, शाम को बेटी घर आती है, तो पत्नी पति की दवा लेने बाजार जाने लगती है। पति याद दिलाता है कि अपनी दवा भी ले आना, पर पत्नी केवल पति की ही दवा लाती है, अपनी नहीं। पति द्वारा कारण पूछने पर कह देती है कि उसे कुछ खास दर्द नहीं है। .. इस लघुकथा में एक साथ कई बिम्ब मिले हुए हैं। आर्थिक अभाव भी है, पति के दर्द के आगे अपने दर्द को गौण समझने की पत्नी की वृत्ति भी है, पति की पत्नी के लिए भी चिंता है..यही परिवार में पति-पत्नी के संबंधों का यथार्थ है। पति के लिए पत्नी त्याग करती है। भारतीय परिवारों में स्त्री के लिए पति का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; इसीलिए घनश्याम अग्रवाल की लघुकथा ‘औरत का गहना’ की नूरा अपने पति इदरीस के इलाज के लिए पति द्वारा दी गई प्रेम की निशानी- अपना एक मात्र गहना, उँगली का छल्ला बेच देती है। पति के पूछने पर कह देती है कि हया ही औरत का असली गहना है। विडंबना यह है कि उसे नूरा को बाद में बच्चे के इलाज के लिए अपनी हया का गहना बेचना पड़ता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार अत्यंत प्राचीन एवं शक्तिशाली संस्था है, व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में उसकी प्रभावी भूमिका है। समय के साथ इस संस्था में कुछ विसंगतियाँ पनपना, कुछ दुर्बलताएँ आना स्वाभाविक हैं; पर उनकी तुलना में उसकी अच्छाइयाँ प्रबल हैं। जीवन की आपाधापी में हर हारे-थके व्यक्ति को अंततः परिवार में ही शांति मिलती है, रिश्तों से ही संबल मिलता है। हिन्दी लघुकथाकार अपनी लघुकथाओं में पारिवारिक जीवन के ये प्रतिबिम्ब उसकी समग्रता में पूर्ण प्रामाणिकता के साथ चित्रित कर रहे हैं।
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