जून 2026

अध्ययन -कक्षहिन्दी लघुकथा में विकलांग-विमर्श     Posted: February 1, 2025

सतीश राज पुष्करणा

 साहित्य की यह विशेषता है कि वह अपने समय को पूरी ईमानदारी से न मात्र रेखांकित करता चलता है अपितु उसे कलात्मक ढंग से सार्थक एवं सटीक अभिव्यक्ति भी प्रदान करता जाता है। साहित्य को परिभाषित करते हुए विख्यात आलोचक एवं विचारक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है।” साहित्य गद्य-पद्य की अनेक-अनेक विधाओं में सृजन से ही समृद्ध होता है। अब यह प्रत्येक लेखक की अपनी रुचि एवं सुविधा पर निर्भर करता है कि वह अपने विचारों को अभिव्यक्त करने हेतु किस विधा को माध्यम बनाए।

 वर्तमान पर जब हम विचार करते हैं तो हमारे समक्ष अनेक-अनेक समस्याएँ आ खड़ी होती हैं। इन्हीं समस्याओं में कुछ समस्याएँ तो सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरण, जनसंख्या, आतंकवाद आदि जैसी होती हैं जो बहुत व्यक्तिगत होती हैं, जिसमें समाज एवं राजनीति के हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम होती है जबकि स्वयं व्यक्ति का, जिसकी वह समस्या है, हस्तक्षेप सबसे अधिक होता है। उससे कैसे जूझें, किस तरह एवं किस राह चलकर अपने जीवन को सुगम या दुर्गम बनाएँ, ये भिन्न-भिन्न व्यक्तियों एवं उनकी मानसिकता पर निर्भर करता है, ऐसी ही एक समस्या विकलांगता है।

 विकलांग का शाब्दिक अर्थ बेकार या खण्डित अंगोंवाला (म्युटिलेटेड) लंगड़ा-लूला, अंगहीन या न्यूनांग आदि। इस रोग या इस कमी को विकलांगता कहा जाता है। विकलांगता अनेक प्रकार की होती है-जन्मजात, दुर्घटनाग्रस्त होने से, बीमारी आदि के कारण, अंगों के विकलांग होने से भी विकलांगता आ जाती है। विकलांगता वस्तुतः रोग नहीं, एक स्थिति है जो सम्बधित व्यक्ति को अनेक-अनेक ढंगों से मानसिक स्तर पर प्रभावित करती है। कुछ लोग तो अपनी इस स्थिति से डरकर कुण्ठित हो जाते हैं। और कुछ लोग पूरे स्वाभिमान के साथ सहज स्वाभाविक जीवन जीते हैं। किन्तु विकलांग व्यक्ति पूरे सम्मान एवं स्वाभिमान से अपना जीवन सामान्य ढंग से जी सकें, इस हेतु घर-परिवार एवं समाज के सहयोग की बहुत जरूरत होती है। ऐसे लोगों को यह अहसास नहीं कराना चाहिए कि वे लोग सामान्य जन से किसी भी स्तर पर कमजोर या कमतर हैं। इस हेतु फिल्म, टी.वी. और साहित्य काफी सहयोगी सिद्ध होते हैं।

 इस विषय पर अनेक भाषाओं में अनेक फिल्में बनीं एवं टी.वी. पर अनेक धारावाहिक प्रदर्शित किए गए। साहित्य भी अपनी भूमिका में किसी भी माध्यम से पीछे नहीं रहा। साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में विकलांगता पर काफी कुछ लिखा गया है। लघुकथा विधा भी अन्य विधाओं से इस सन्दर्भ में पीछे नहीं रही।

 इस दिशा में सर्वप्रथम विकलांगता विषय पर केन्द्रित डॉ. अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’ के सम्पादकन में प्रकाशित उनतालीस लघुकथाओं का संकलन सन् 2008 में प्रकाश में आया जिसमें स्वयं सम्पादकं की सप्त लघुकथाएँ संकलित थीं। इस दिशा में दूसरा प्रयास सन् 2012 में राजकुमार निजात के एकल संग्रह ‘उमंग, उड़ान और परिन्दे’ में देखने को मिला, जिसमें प्रथम बीस लघुकथाएँ विकलांगता पर ही केन्द्रित हैं। इन लघुकथाओं पर स्वयं राजकुमार निजात अपने लेखकीय में लिखते हैं- “इस संग्रह की एक लघुकथा ‘ताण्डव’ शीर्षक से है। गत दिनों दिल्ली में विकलांग लोगों ने अपने हकों के लिए अपनी माँगों के समर्थन में और अपने लिए न्याय प्राप्त करने हेतु प्रदर्शन किया। उनका साहस तो बस देखते ही बनता था। मैंने स्वयं को उलाहना दिया कि मैं स्वयं उनके अदम्य साहस के साथ वहाँ क्यों नहीं था? तभी मेरे मन में आया कि एक लेखक के नाते मुझे कुछ-न-कुछ अवश्य लिखना चाहिए। संग्रह की बीस लघुकथाएँ विशेष रूप से इन्हीं को समर्पित हैं। ‘ताण्डव’ लघुकथा का यह पात्र तो रोंगटे खड़े कर गया जब हाथों के बल नृत्य करते हुए सचमुच में ही वह प्रचण्ड हो उठा था। मैं उसके हौसले को एवं उसके साहस को प्रणाम करता हूँ। दरअसल ऐसे विलक्षण लोग ही जीवन में कुछ विशेष कर जाते हैं।” इस उद्धरण के माध्यम से वस्तुतः मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि कोई व्यक्ति जीवन में कुछ करना चाहता है तो वह अपनी इच्छाशक्ति के बल पर कर गुजरता है। विकलांगता ऐसी स्थिति में आड़े नहीं आती। जिन्हें कुछ नहीं करना होता, वे सर्वांग यानी सकलांग होने के बावजूद कुछ नहीं कर सकते। मेरी दृष्टि में जो आलस्य अथवा इच्छाशक्ति एवं आत्मबल के अभाव में सकलांग होने के बाद भी कुछ नहीं करते या कर पाते, परोक्षतः ऐसे लोग ही वस्तुतः विकलांग हैं।

राजकुमार निजात की विकलांगता पर आधारित बीस लघुकथाओं के विषय में डॉ. रामनिवास ‘मानव’ लिखते हैं, “विवेच्य संग्रह की प्रारम्भिक बीस लघुकथाएँ विकलांग पात्रों से जुड़ी हैं-डर, ऊर्जाशील, तुरन्त, सचमुच और इन्तजार विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके पात्र अन्धे, गूँगे-बहरे और लूले हैं, शारीरिक रूप से विकलांग हैं लेकिन इनकी मानसिक दृढ़ता देखते ही बनती है। ‘वलवला’ लघुकथा के विकलांग नायक का कथन, “हम शरीर से विकलांग हैं, पर दिल से विकलांग नहीं हैं।” मेरी इस मान्यता की पुष्टि करता है। विकलांग भी हमारी तरह ही सोचते हैं और प्रगति करना चाहते हैं। ‘उमंग, उड़ान और परिन्दे’ तथा ‘इन्तजार’, अपने जीवन-संघर्ष का अर्थ समझते हैं (तुरन्त), किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते ‘डर’। ‘दौड़’ का वह ‘उमंग, उड़ान और परिन्दे’ की उड़ान, ‘कम्पन’ का नायक, ‘चुप्पी’ के विकलांग बस-यात्री और ‘इन्तजार’ की नायिका जैसे पात्र तो भले चंगे लोगों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत हैं। वस्तुतः विकलांग शरीर से नहीं, मन के हौसले से अपने कार्यों का निष्पादन करते हैं और सफलता के सोपान चढ़ते हुए आकाश का स्पर्श कर लेते हैं। अभी हाल में ही समाचार पत्रों में पढ़ने को मिला कि एक विकलांग ने पर्वत की चोटी पर तिरंगा लहराया। हमारे ही समाज में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। फिल्म-संगीत के चर्चित हस्ताक्षर रवीन्द्र जैन आँखों से विकलांग थे और वे एकमात्र चर्चित संगीतकार ही नहीं अपितु एक उल्लेखनीय गीतकार भी थे। इनसे और काफी पीछे यानी भक्तिकाल में जाएँ और ‘सूरदास’ के पदों का अवलोकन करें तो उनकी प्रतिभा समझ में आती है। ऐसा कहा जाता है कि सूरदास जन्मान्ध थे और वे विशेष पढ़े-लिखे भी नहीं थे किन्तु अपनी इच्छाशक्ति एवं आत्मबल और साहस के बल पर ऐसे श्रेष्ठ पद लिखे थे जो आज लगभग 600 वर्षों के बाद भी घर-घर में गुनगुनाए जाते हैं। इतना ही नहीं सूरदास मथुरा के मन्दिरों में अपने पदों को अपने इकतारे को बजाते हुए इतने मधुर स्वर में गाते कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो जाया करते थे।

 साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में विकलांग-विमर्श पर केन्द्रित शताधिक लेखों का डॉ. माहेश्वरी के सम्पादकत्व में लगभग 1000 पृष्ठों का शोधग्रन्थ प्रकाशित किया गया, यह इस विषय पर अब तक का सबसे गम्भीर एवं बड़ा कार्य है।

 निजात के इस महत्त्वपूर्ण संग्रह में यों तो कुल मिलाकर 72 लघुकथाएँ संगृहीत हैं जिनमें आरम्भिक बीस लघुकथाएँ विकलांगता को केन्द्र में रखकर, उनके सटीक मनोविज्ञान को दर्शाते हुए यह स्पष्ट करती हैं कि उनकी विकलांगता उनके जज्बे एवं साहस के कारण हार जाती है और उड़ान में परिन्दों को भी पीछे छोड़ जाते हैं। इनकी लघुकथाओं के विकलांग पात्र कहीं भी नहीं हारते और न ही हीनभावना से ग्रस्त होते हैं, अपितु समाज पर प्रहार करते हैं जो उन्हें दीन समझने की धृष्टता करता है।

 विकलांगता पर केन्द्रित इनकी लघुकथाओं में दौड़, ताण्डव, सँभलकर, उमंग, उड़ान और परिन्दे इत्यादि श्रेष्ठता के सारे मापदण्ड सफलतापूर्वक तय करती हैं। इन्हें श्रेष्ठ बनाने में जहाँ उनके कथानकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, वहीं उनका शिल्प भी अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह करता है और इन लघुकथाओं को श्रेष्ठता प्रदान करता है।

पर बेगूसराय से नरेन्द्रकुमार सिंह के सम्पादकत्व में ‘समय सुरभि अनन्त’ का अक्टूबर 2013 का विकलांगता पर केन्द्रित अंक था जिसमें लघुकथा विधा को प्रमुखता दी गई थी।

 पर निर्विवाद सत्य है कि विकलांगता एक अवांछित स्थिति होती है। जैसी कि मैं पहले भी चर्चा कर आया हूँ कि यह या तो जन्मजात या दुर्घटना के कारण या किसी बीमारी के कारण उत्पन्न होती है। कारण जो भी हो, किन्तु अपवाद छोड़कर विकलांग व्यक्ति को प्रायः उपेक्षित, तिरस्कृत या बोझ की तरह समझा जाता रहा है। विगत लगभग दो-ढाई दशकों से राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विकलांगों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने हेतु शासन एवं अनेक एन.जी.ओ. आगे आए हैं। इस दिशा में 17, 18 एवं 19 जुलाई, 2014 को प्रताप महाविद्यालय, अमलनेर में डॉ. सुरेश माहेश्वरी एवं डॉ. विनयकुमार पाठक के संयोजकत्व में विकलांग-विमर्श को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया था जिसमें लघुकथा सहित इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है, तभी तो सरकारी, गैरसरकारी एवं निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में विकलांगों हेतु आरक्षण व्यवस्था लागू की गई है। इन्हें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सक्षम तथा आत्मनिर्भर बनाने हेतु सप्रयास किए जा रहे हैं किन्तु सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी संस्थानों में इनके शोषण के साथ-साथ इन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाएँ भी अक्सर सुनने एवं पढ़ने में आती हैं। इस सन्दर्भ में ‘अब्ज’ की एक लघुकथा ‘स्वाभाविक’ का सहज ही अवलोकन किया जा सकता है। लघुकथा इस प्रकार है- “दोनों पैर कटे हुए हैं, फिर भी आपको नौकरी पर रखा। रहना, खाना दिया।”

 “कोई अहसान नहीं किया है आपने, और खैरात में नहीं खिलाते हैं। चौबीसों घण्टे सेवा देता हूँ, अरे! वह भी सभी कार्य समय पर, औरों का भी काम देखता हूँ। रोज-रोज हो-हल्ला, दूसरे की बनिस्पत पैसा भी कम।” सकलांगों की कमी नहीं है।

 “पैरों से विकलांग हूँ, दिमाग से नहीं। मेरे छह माह के कार्य, दूसरे के छह वर्षों के कार्यों पर भारी हैं, जिसे आप स्वीकारते हैं। लेकिन मैं आगे-पीछे नहीं करता।”

 “तो क्या करते हैं?”

 “श्रम बेचता हूँ, स्वाभिमान नहीं।”

 इस लघुकथा से दो बातें स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती हैं-एक तो निजी संस्थानों में किस प्रकार विकलांगों का शोषण होता है और बार-बार उन्हें विकलांगता का अहसास करवाकर प्रताड़ित किया जाता है। दूसरा यह कि प्रायः विकलांग जो विकलांगता के बावजूद अपने कार्यों में दक्ष होते हैं सामान्य व्यक्तियों की तरह अपने स्वाभिमान पर आँच नहीं आने देते। 

लघुकथा-जगत् में विकलांगों के स्वाभिमान को प्रत्यक्ष करती अनेक लघुकथाएँ सृजित हुई हैं, उनमें से ही एक लघुकथा डॉ. सतीशराज पुष्करणा की ‘स्वाभिमान’ है। जिसमें एक विकलांग खीरा बेचनेवाले के स्वाभिमान को रेखांकित किया गया है। इस सन्दर्भ में उस खीरा बेचनेवाले का यह संवाद देखा जा सकता है-

 “मुझे सहानुभूति का नहीं-श्रम और ईमान का पैसा चाहिए। खीरा खराब निकला, यह जिम्मेदारी मेरी है, दुबारा पैसा नहीं लूँगा।” 

कोई भी व्यक्ति जिसके पास इच्छाशक्ति एवं आत्मबल तथा विश्वास है वह सफल होता ही है। हिन्दी साहित्य में मलिक मोहम्मद जायसी का नाम कौन नहीं जानता ! जो एक आँख से काने थे किन्तु उन्होंने हिन्दी-काव्य-जगत् को ‘पद्मावत’ जैसी उत्कृष्ट कृति देकर उपकृत किया। इसी प्रकार लघुकथा ‘साहसिक कदम’ (डॉ. मिथिलेशकुमारी मिश्र) की नायिका कथा-नायक से उसके अन्धे होने के बावजूद उससे शादी करने को तैयार हो जाती है, कारण वह विद्वान है। इस कथा में नायिका का यह संवाद लघुकथा को ऊँचाई प्रदान करता है-”मुझे विश्वास है कि मैं उनके साथ सुखी रहूँगी। मैं उनकी आँखों की रौशनी बनूँगी।” डॉ. रामकुमार घोटड़ की एक लघुकथा ‘अपंग मसीहा’ में टाँगों से अपंग नायक एक बच्चे को बस से कुचल जाने से बचा लेता है और वह ऐसे में अपनी जान तक की परवाह नहीं करता। पुष्पलता कश्यप की लघुकथा ‘अन्धे का स्वाभिमान’ में सड़क पार करने में एक अन्धा सहारा देनेवाले का सहारा लेने से इनकार करते हुए कहता है- “ धन्यवाद! मुझे हमदर्दी नहीं, स्वाभिमान से जीवन जीने हेतु सामाजिक स्वीकृति चाहिए।”

 प्रद्युम्न भल्ला की लघुकथा ‘अपाहिज’ में, जिसका नायक टाँगों से लाचार है। ऐसी स्थिति पर एक व्यक्ति पचास रुपये देकर उसके प्रति सहानुभूति जताना चाहता है, किन्तु नायक इसके उत्तर में कहता है- “बाबूजी, कुदरत ने तो केवल मेरी टाँगें छीनी हैं, लेकिन आप तो मेरे हाथ भी काट रहे हैं।”

 शैलेश दत्त मिश्र की लघुकथा ‘आरक्षण’ विकलांग लोगों को दिए गए आरक्षण में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल बहुत ही सुन्दर ढंग से खोल देती है। इस कथा के नायक गणेश को पैरों से लाचार होने पर भी तथा श्रेष्ठ शैक्षणिक प्रमाण-पत्र होने के बावजूद सकलांगों को नौकरी मिल जाती है और सिफारिश एवं घूस न देने के कारण इस नायक को नौकरी नहीं मिलती जिससे उसकी माँ सरकार को कोसती है। माँ के इस कोसने पर गणेश कहता है- “माँ! तुम तो सरकार पर बेकार नाराज हो रही हो। सरकार विकलांग को प्राथमिकता तो देती है! हाँ, ये बात अलग है कि प्राथमिकता शारीरिक विकलांग को नहीं, केवल नैतिक विकलांगों को ही मिल रही है।”

 इस लघुकथा में एक तिलमिलाता व्यंग्य है कि पाठक स्तब्ध रह जाता है, वस्तुतः ऐसा चुभता व्यंग्य भी लघुकथा की एक अनन्य शक्ति है।

 महाभारत में अष्टावक्र की कथा आती है, जिसके टेढ़े-मेढ़े शरीर को देखकर लोग हँस देते हैं। इस उपहास से मर्माहत होते हुए अष्टावक्र राजा को उत्तर देता है, “राजन्! नदी भले ही टेढ़ी हो, किन्तु उसका जल तो टेढ़ा नहीं होता। मेरा शरीर भले ही टेढ़ा है, किन्तु मेरी आत्मा तो टेढ़ी नहीं है।” इस कथा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किसी को किसी की विकलांगता से मतलब न रखकर उसके द्वारा किए जा रहे उल्लेखनीय एवं महत्त्वपूर्ण कार्यों की बात करनी चाहिए क्योंकि विकलांग होना या सकलांग होना स्वयं किसी व्यक्ति के वश में तो होता नहीं है।

 राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ की लघुकथा ‘स्वाभिमान’ में दो पात्र-एक अन्धा एक लंगड़ा हैं। अन्धा मूँगफली बेचकर गुजारा करता है तो लंगड़ा भीख माँगकर। अन्धा लंगड़े से कहता है- “तुम भीख माँग रहे हो? तुममें जरा भी स्वाभिमान बाकी नहीं है। भगवान् ने तुम्हें आँखें दी हैं, तुम तो बहुत कुछ कर सकते हो।” जब लंगड़ा उससे जानना चाहता है कि कैसे? इस पर अन्धा उत्तर देता है, “यदि तुम्हारी आत्मा कहे तो मेरे धन्धे में भागीदार बन जाओ। हम दोनों मिलकर कई चीजें बेचा करेंगे।” इस प्रकार लंगड़ा भीख माँगना छोड़कर अन्धे के धन्धे में ईमानदारी से शामिल हो जाता है।

 डॉ. पुष्पा जमुआर की लघुकथा ‘साहस’ इस विषय पर लिखी एक अच्छी लघुकथा है जो अपनी हिम्मत एवं साहस से उस व्यक्ति को बचा लेती है जिसकी गुण्डा हत्या करने जा रहा था। इस लघुकथा में अन्तर्वस्तु से अधिक सराहने योग्य इसका शिल्प है जिसे फ्लैशबैक द्वारा प्रस्तुत करके लघुकथा को श्रेष्ठता प्रदान की गई है। माधव नागदा की लघुकथा ‘विकलांग’ भी ध्यान आकर्षित करती है। एक भिखारी दुकान पर बैठे सेठ से भीख माँगता है। सेठ कहता है, “हट्टा-कट्टा है कोई काम क्यों नहीं करता जो इस तरह भीख माँगता चलता है।” भिखारी स्वयं को अपमानित महसूस करते हुए कहता है-”सेठ! तू भाग्यशाली है। पहले जन्म में तूने अच्छे करम किए हैं। खोटे करम तो मेरे हैं। जन्म लेते ही भगवान् ने एक टाँग न छीन ली होती तो मैं भी आज तेरी तरह कुर्सी पर बैठा राज करता।”

 सेठ भिखारी से बहस न करके गुल्लक में भीख लायक परचूनी ढूँढने लगा। भिखारी आगे बढ़ा। “यह ले।”

 भिखारी हाथ फैलाकर नजदीक गया। परन्तु एकारक हाथ वापस ख़ींच लिया, मानो सामने सिक्के की बजाय जलता हुआ कोई अंगारा हो। कुर्सी पर बैठकर राज करनेवाले की दोनों टाँगें घुटनों तक गायब थीं।

 तात्पर्य यह है हिन्दी लघुकथा में विकलांगता को केन्द्र में रखकर पर्याप्त चर्चा करता कार्य हुआ है। ऐसा नहीं है मात्र इतने ही कथाकारों ने विकलांगता की मानसिकता छोड़ कर्म-पथ पर आगे बढ़ने का काम किया है, उन्होंने न केवल अपने जीवन को बल्कि समाज को भी नया मोड़ दिया है। जिन विकलांगों की जीवन-दिशा प्रेरक नहीं होती, वे विकलांग समाज का अंग बनकर समाज के लिए भार बने रहे हैं, उसकी दया पर जीते हैं, अवसाद के आँसू पल-पल पीते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकलांगों के सामर्थ्य को जगाएँ और उन्हें सामाजिक कार्यों में लगाएँ।

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