“देखो मम्मा यह हमारा असेम्बली हॉल है।” आरव उछल-उछल कर मम्मी-पापा को अपना स्कूल दिखा रहा था।
“मम्मा यह हमारा क्लास रूम है”
पैरेंट्स टीचर मीटिंग के चलते स्कूल में रौनक लगी हुई थी। एक बच्चे के बाद आरव का नम्बर आ गया।
औपचारिक गुड मॉर्निंग के बाद अध्यापिका ने आरव की तारीफ़ों के पुल बाँध दिए। आरव पढ़ाई में और खेलों में था भी प्रशंसा योग्य।
“जाओ आरव खेलो अपने दोस्तों के साथ” अध्यापिका ने आरव की पीठ थपथपाते हुए कहा। आरव को तो जैसे इसी बात की प्रतीक्षा थी।
अब प्रसन्न मुद्रा में बैठी अध्यापिका के मुँह पर थोड़ा तनाव उभर आया
“क्या बात है मैम ? आरव की कोई शिकायत है?”
“मिसेज़ सिंह ज़्यादा गम्भीर बात तो नहीं है ,पर पिछले काफी समय से देख रही हूँ कि आरव अपनी गलती पर भी कभी ‘सॉरी’ नहीं बोलता। खेलते हुए कभी किसी बच्चे को लग गई, तो बच्चे आपस में फटाफट सॉरी बोल देते हैं। आपस में कोई झगड़ा होने पर भी आरव अड़ जाता है कि उसे सॉरी नहीं बोलना है। यह बात आगे चलकर सही नहीं रहेगी इसके लिए।”
“जी मैम मैं जानती हूँ उसकी यह आदत, मैंने भी इस पर बहुत समझाया है ;पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा। घर में भी यह कभी किसी गलती पर सॉरी नहीं बोलता।”
“मिसेज सिंह अन्यथा मत लीजिएगा, एक बात पूछूँ?”
“जी मैम’
“क्या मिस्टर सिंह कभी आपको सॉरी बोलते हैं”- अध्यापिका ने नेहा की आँखों में झाँकते हुए कहा।
“ये तो कभी ग़लती करते ही नहीं न” नेहा कहने की कोशिश कर रही थी; पर बात कहीं उसके गले में अटक रही थी।
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