वह जो सुनसान सड़क देख रहे हो उसी सड़क के मुहाने पर बैठी थी वह निपट अकेली, अधनंगी, कपड़े घुटनों तक हो आए थे, बाल बिखरे हुए थे। एकदम खामोश आँखों से बस इधर- उधर देख रही थी। कई दुपहिया – चारपहिया उसके आगे से होकर गुजर रहे थे।
तभी वहाँ से गुजरते दो युवाओं की नजर उस पड़ी, उसकी बदहाली देख उनके कदम रुक गए। उसे ऊपर से नीचे तक देख एक से रहा न गया, उसकी ओर बढ़ने को हुआ कि तभी दूसरे ने उसकी बाँह पकड़कर उसे रोकते हुए कहा, “अबे !क्या कर रहा है?”
“देखता नहीं उसकी हालत ! लाचार दिख रही है। हमें उसकी सहायता करनी चाहिए।” उसने कहा।
“पागल हुआ है?”
“इसमें पागल होने जैसी क्या बात है, शायद हमारी वजह से उसे कोई सहायता मिल जाए।”
“सिर फिर गया है तेरा?”
“ऐसा क्यों कह रहा है रे तू …क्या हुआ है तुझे ? …तू तो ऐसा कभी नहीं था!”
“अरे ! वो …उसके बदन पर वो …काला बुरका दिखाई नहीं देता तुझे, हालात बहुत ख़राब हैं आजकल! निकल लो फटाफट…किसी झमेले में फँस जाएँगे।”
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