शाम को ऑफिस से निकल घर जाने का मन न हुआ। क्योंकि पत्नी बेटी पीहू के साथ मायके गई थी, सो उनके बिना खाली घर खाने को दौड़ता- सा लगता है।
चाय की तलब लगी थी, तो बाजार के नुक्कड़ की टपरी पर चाय पीने चला आया। सुबह से पीहू की बड़ी याद आ रही थी। उसे गए अभी तीन दिन भी नहीं हुए थे। ऐसा लग रहा था मानो महीनों से दूर हो।
जब भी मैं ऑफिस से घर आता, मेरी बाइक की आवाज सुनकर दरवाजे पर मुस्कुराती खड़ी रहती। उसे देखकर दिन भर का तनाव भूल जाता और गले लगाते ही सारी थकान दूर हो जाती।
चाय पीते- पीते मेरी नज़र सड़क के उस पार एक व्यक्ति पर ठहर गई। पहली नजर में उसका
अस्त- व्यस्त हुलिया, बिखरे हुए बाल और बेतरतीब दाढ़ी में कोई संदिग्ध- सा लगा। उसकी हरकतें देखकर उसके अपराधी होने का पूरा शक हो रहा था। वह व्यक्ति दो- तीन साल की बच्ची को जबरदस्ती गोद में उठाने और बहलाने की कोशिश कर रहा था। बच्ची लगातार रोते हुए उसे परे ढकेल रही थी। बच्ची को वह कभी चॉकलेट, मिठाई और कभी कोई खिलौना देकर चुप कराने की पुरजोर कोशिश कर रहा था; पर बच्ची पर इनका कोई असर नहीं हो रहा था। उनके पास ही पंद्रह-सोलह साल का एक लड़का भी खड़ा चौकन्ना चारों ओर देख रहा था, मानो मुस्तैदी कर रहा हो।
हम सब आसपास बैठे लोगों ने किसी अनहोनी का अंदेशा लगाकर उस संदिग्ध को धर दबोचा।
‘‘क्यों बे… कौन है तू और ये किसकी बच्ची है?’’ एक व्यक्ति ने पूछा।
पर उसने कोई ध्यान ही नहीं दिया और बच्ची को पुचकारने में लगा रहा।
‘‘भाइयो.. इसकी हिम्मत तो देखो। सरे आम, दिन दहाड़े एक बच्ची के साथ गलत हरकत कर रहा है।’’
‘‘मारो इसको…. इन्हीं लोगों की वजह से हमारी बेटियाँ सुरक्षित नहीं है।’’ – दूसरे बंदे ने उसका कॉलर पकड़कर कहा।
सब उसे मारने को आगे हुए ही थे , “रुक जाइए। मेरी बात तो सुनिए…।” वह मिमियाकर बोला।
“सच बता, किसकी बच्ची को किडनैप करने की कोशिश कर रहा है?” एक ने कहा।
“साब, मैं कोई किडनेपर नहीं हूँ। ये बच्ची मेरी बेटी है ।’’- सुनकर भीड़ में खड़े सब एक -दूसरे का मुँह देखने लगे।
“मेरी पत्नी मेरे साथ रहना नहीं चाहती और न ही मुझे मेरी बेटी से मिलने देती है।’’ कहकर वह रुआँसा हो गया।
“आज मेरी बेटी का जन्मदिन है। मैं अपने आप को बेटी से मिलने से रोक न पाया इसलिए अपने साले को कहकर उसी से मिलने बुलाया है।’’
पास खड़े उस पंद्रह वर्षीय लड़के ने सहमति में सिर हिलाया।
“आप ही बताइये?क्या अपनी बेटी से प्यार करना गलत है ।’’- कहकर वह रो पड़ा।
खड़ी भीड़ की आँखों में सहानुभूति थी। पर मेरी आँखें बरबस भीग गई थीं। क्योंकि बेटी के दूर होने का दुख मैं अच्छी तरह से समझ रहा था।
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