खेतों में फसलें काटी जा चुकी थीं। फसलें मसौनी-दौनी के बाद खलिहान से घर भी आ चुकी थीं। बेहद कर्मठ किसान अब अगली फसल के लिए खेत तैयार करने में जुट गए। सबसे पहले खेतों में बच गई खूँटों की सफाई आवश्यक थी। तभी आगे हल-बैल खेतों में उतारे जा सकते थे।
सब को कुदाली से उखाड़ एक जगह इकट्ठा किया गया। सारे खेतों की खूँटें किसानों के अगले कदम की प्रतीक्षा में।
सवेरे-सवेरे खूँटों के विशाल ढेर में आग लगा दी गई। धुएँ का गुब्बार सा मचलकर उठा, आकाश की छाती चीरने को ऊपर की ओर बढ़ा। थोड़ी देर बाद चारों तरफ धुंधलका। सब खाँसने लगे। सभी को अपना दम घुटता सा लगा।
उधर देश-दुनिया के वैज्ञानिक अपनी जिम्मेदारी समझ, ओजोन परत में बढ़ते छेद के निराकरण के लिए बेतरह परेशान थे।
तभी एक निर्धन बूढ़ा किसान खाँसते हुए बोला,
– ऐसे मत जलाओ। टुकड़ा-टुकड़ा करके गाड़ दो। पानी भी पटाओ। थोड़ा दिन बाद खुदे सड़ जाएगा।
– ओतना मिहनत कौन करेगा बाबा।…. और काहे करेगा?
– हम सबका कऊनो जिम्मेदारी नहीं है का बबुआ? ई केबल सरकार और बैगयानिक का समस्या है? …फिर तू काहे खाँस रहा है ? साँस किसका घुट रहा है, बोलो?
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