गाँव में शादी-विवाह अथवा दूसरे अवसरों पर भोज में आम तौर पर एक सब्ज़ी, पूरी व एक मिठाई ही बनवाते हैं। मिठाई में प्रायः लड्डू बनवाए जाते हैं और सब्ज़ी सीताफल की। किसी ने दो सब्ज़ियाँ बनवा दी तो वाह-वाह हो जाती है और मिठाइयों में अगर दो-तीन हो जाएँ, तो सालों चर्चा रहती है उस दावत की। आज चौधरी चंद्रप्रकाश के बेटे की शादी के उपलक्ष्य में दावत थी। पास-पड़ौस व गाँव के सभी प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित किया गया था। काफी चहल-पहल थी। चौधरी चंद्रप्रकाश ने दिल खोलकर खर्च किया था। भोज से पहले ही चर्चाएँ शुरू हो गईं। सात तरह की तो मिठाइयाँ ही बनवाई गई थीं। कई सब्ज़ियाँ, आम-इमली की खट्टी-मीठी चटनियाँ, अचार व रायता अलग से। पूरियाँ भी दो-तीन तरह की तो होंगी ही। इससे पहले पूरे गाँव में शायद ही किसी ने दावत में इतने ज़्यादा पकवान बनवाएँ हों। पकवानों की ख़ुशबू दूर-दूर तक पहुँचकर लोगों के मुँह में पानी भर रही थी। ऐसी ख़ुशबू कि लोग बिना बुलाए ही चले आएँ खाने के लिए तो आश्चर्य न हो। आमंत्रित लोग-बाग आने लगे तो भोज शुरू हुआ।
एक बड़े से दालान में सूत की बुनी पट्टियाँ बिछी थीं। ज़मीन पर बिछी पट्टियों पर लोग लाइनों में बैठने लगे। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी साथ-साथ बैठे थे। सबसे पहले उनके सामने पत्तलें रखी गईं। फिर दो-दो मिट्टी के कसोरे रखे गए। एक गिलासनुमा पानी के लिए और दूसरा कटोरीनुमा रायते के लिए। चौधरी चंद्रप्रकाश स्वयं दावत में आए लोगों की पत्तलों पर मिठाइयाँ परोसने लगे। बाकी लोग उनके साथ ही सब्ज़ी, पूरियाँ और दूसरी चीज़ें पत्तलों पर रखने लगे। लोग डटकर भोजन का आनंद ले रहे थे। पंगत के बीच में पाँच-छह साल का एक लड़का भी बैठा था जो जल्दी-जल्दी खाने की कोशिश कर रहा था। चौधरी चंद्रप्रकाश का ध्यान उस लड़के की तरफ गया। उन्होंने उसे पहचानने की कोशिश की लेकिन पहचान नहीं पाए। उन्होंने अपने लड़कों और भतीजों से पूछा कि ये किस का बच्चा है? सभी उसे पहचानने में असमर्थ थे। चौधरी चंद्रप्रकाश ने उस बच्चे से ही पूछा कि वह किसके घर से आया है?
पता चला कि बच्चा गली में चार-पाँच घर छोड़कर पड़ोस के ही एक घर से आया है। चौधरी चंद्रप्रकाश ने अपने लड़कों को एक ओर ले जाकर उनसे पूछा कि क्या इनके घर भी किसी ने निमंत्रण भिजवाया था? सभी ने मना कर दिया तो चौधरी चंद्रप्रकाश ने पूछा, ‘‘फिर ये बिना बुलाए जीमने के लिए कैसे आ गया?’’ भला इस बात का कोई क्या जवाब देता? चौधरी चंद्रप्रकाश उस लड़के के पास गए। उस समय लड़के की पत्तल पर आधा लड्डू रखा हुआ था और वो पूरी और सब्ज़ी माँग रहा था। चौधरी चंद्रप्रकाश ने लड़के को हाथ से उठाकर खड़ा किया। फिर उसकी पत्तल, जिसमें आधा लड्डू रखा हुआ था, को लपेटकर उसे बच्चे के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘जा अपने घर जाके खा लेना। और फिर कभी ऐसे मत घुसना बिना बुलाए।’’ उसके बाद चौधरी चंद्रप्रकाश उस बच्चे को बाज़ू से पकड़कर लगभग धकेलते हुए दरवाज़ें से बाहर कर आए और फिर वापस आकर बाक़ी लोगों को आग्रहपूर्वक खिलाने में जुट गए। गाँव में काफी दिनों तक इस लज़ीज़ दावत व चौधरी चंद्रप्रकाश की फ़राख़दिली की चर्चा होती रही।
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