पिता-पुत्र से-”बेटे, अब तो मैंने तुम्हें कुछ कहना सुनना, राय देना अथवा टोकना बिल्कुल बंद कर दिया है, जबसे तुमने मुझसे कहा था कि घर की हर एक बात में मेरी टोका-टाकी से तुम्हारी खुशियों में खलल पड़ता है। इस बात को चार महीने बीत गए पर मैं देख रहा हूँ कि मेरे चुप रहने के बावजूद मैंने तुम्हें कभी खुश महसूस नहीं किया। क्या बात है बेटे, कोई परेशानी हो तो मुझे बताओ, शायद उसका कोई हल मैं निकाल पाऊँ।”
”पिताजी, मुझे कोई और परेशानी नहीं है, परेशान हूँ तो केवल इस बात से कि अब हमें आपकी टोका-टाकी सुनने को नहीं मिल रही है। आपकी यह चुप्पी हमें कष्ट देने लगी है। अब आपका यह पूर्ण मौन हमारी खुशियों को खाने लगा है।पिताजी, हमारी समझ में आ गया है कि आपका टोकना हमारे लिए कितना महत्त्व रखता है। अब हम यह भी जान गए हैं कि आपके टोकने के पीछे कोई दुर्भावना नहीं ,बल्कि हमारा ही हितचिंतन रहता है। कृपा कके हमें क्षमा कर दीजिए और अपने अनुभवजन्य विचारों से हमारा मार्गदर्शन करते रहें”
इस प्रकार उल्लसित मन से पिता-पुत्र का मौन टूट गया।
अब पिताजी भी टोका-टाकी में संयम बरतने लगे।
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