डॉ.अनीता राकेश
लघुकथा अच्छी, पसंदीदा या अविस्मरणीय? मेरी दृष्टि में जो स्मृतियों के झरोखों–दर झरोखों से छन–छन कर बारम्बार अपनी याद दिलाए, जो मानस–पटल पर अमिट छाप छोड़ जाए वही रचना अच्छी, जो जीवन की बहुरंगी घटनाओं में अपनी छवि बारम्बार दिखाती चले वही पसंदीदा लघुकथा। हाँ, पसंद की कसौटी अपनी–अपनी हो सकती है, पर कुछ कसौटियाँ कॉमन हैं, युग–धर्म की दृष्टि से अपरिर्वानशील या कहों स्थायी हैं। युग धर्म का अर्थ वैश्विक पटल हैं मानवीय धरातल है। जहाँ कुछ अक्षरित मूल्य सदैव अपनी पूर्णता में दीप्तिमान रहते हैं।
ऐसी अनेक लघुकथाएँ हैं ,जो आकार में चाहे जो हो लेकिन कथानक की सजीवता एवं भाषा की चमत्कारिता से अद्वितीय प्रभाव उत्पन्न करती हैं। लघुकथा–कथा न होकर चित्र सी स्मृति–पटल पर टँक जाती है। थोड़ी सी आहट भी उन चित्रों का बखिया उधेड़ देती है और हृदय स्पंदन के साथ लहुलुहान हो उठता है। मानवीय सजगता, संवेदनशीलता को तराशती एवं तलाशती ऐसी लघुकथाएँ अमरता का परचम लहराती हैं। यह वह धरातल है जो देष भाषा, काल की परिधि से परे अपने वजूद का एहसास सर्वत्र कराता चलता है। पसंद अपनी–अपनी हो सकती हैं किन्तु पसंद के धरातल सबके लिए वही सत्यं–शिवं–सुंदरं ही हैं।
यह सत्य है कि लघुकथा अक्षरों में ढलने में कुछ मिनट या घंटे ले किन्तु उसके पूर्व की प्रक्रिया सतत् अवलोकन एवं सूक्ष्म दृष्टि की हिमायती होने के साथ–साथ विवेचन एवं समीक्षा के क्रमों से गुजरती हुई कभी–कभी लम्बा वक्त भी लेती है। चर्चित लघुकथाकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने लघुकथा की रचना प्रक्रिया की चर्चा करते हुए जिन सोपानों एवं क्रमों की व्याख्या की है, वे निश्चित ही अनुभवों के आँवे में परिपक्व हुए हैं। इनकी विश्वसनीयता तो असंदिग्ध है ही अनुकरणीय एवं ग्राहय भी है। इस क्रम में जिन दो लघुकथाओं ‘ऊँचाई’ एवं ‘स्कूल’ (सुकेश साहनी) की चर्चा वे करते हैं उनको परिपक्व होने में वर्षों लग जाते हैं। घटनाएँ रोजमर्रा की हैं, छूती भी हैं, हिलाती भी हैं, पर स्थान बनाने में वक्त लगाती हैं।
‘ऊँचाई’ लघुकथा में स्थित न तो पिता नए हैं, न पुत्र, न पत्नी नई हैं, न बहू और न ही वे परिस्थितियाँ नयी हैं। नया है – उसका गठन, उसका शिल्प जो सारी परिस्थितियों को उलटते हुए कथानक को एक सहज किन्तु अनछुए मोड़ पर ले जाता है। पिता के आगमन पर आशंकित बहू की चिड़चिड़ाहट भरी तल्खी, पुत्र की द्वन्द्वग्रस्तता की स्वाभाविकता के बीच पिता द्वारा अच्छी फसल होने की वजह के साथ कुछ रुपये दिये जाते हैं। यहाँ आकर लघुकथा अपनी काया का आंतरिक विस्तार कर लेती है। कथाकार कहता कुछ नहीं, पर उसके भीतर की सारी पश्चात्ताप भरी अकुलाहट, बेचैनी तथा और भी बहुत कुछ पाठक के भीतर दौड़ जाती है। लगता है – कथा ठहर गई है। किन्तु, वस्तुत: वह ठहरी नहीं। वह तो पाठक के भीतर आचर्यमिश्रित लम्हों के साथ भावानुभूति की पराकाष्ठा पर जा चढ़ती है जब पिता की प्यार भरी डाँट उसे मिलती है – ‘‘ले लो! बहुत बड़े हो गये हो क्या?’’ और, रचनाकार के हाथ पर रखे वे सौ–सौ के दस नोट मानो स्मृतियों के दस द्वार दसों दिशाओं से खटखटाने लगते हैं। सच, कथा के पात्र के साथ पाठक का तादाम्य हो जाता है। प्रत्येक की आँखों के आगे पिता का वही चित्र उभर जाता है तथा झुकीं नजरों का रचनाकार हम सबके भीतर कुछ जगा जाता है।
अनेक लघुकथाओं के पठन के दौरान यह महसूस किया कि कुछ अपनी संगठनात्मक सुदृढ़ता एवं भावनात्मक सरसता से प्रभावित ही नहीं करती ,वरन् शिल्प की कुशलता से चौंकाती भी है, कथानक का नयापन, तीखापन झटका भी देता है, चुभता भी है। एक विद्युत् कौंध को रचना के माध्यम से पाठकों के बीच उतार कर उन्हें झकझोरने का काम किया जाता है।
विक्रम सोनी की लघुकथा ‘अंतहीन सिलसिला’ रगों में दौड़ते रक्त की धार को क्रोध, दु:ख एवं सामाजिक विवशता से उत्तेजित कर देती है। यहाँ का मुख्य पात्र एक दस वर्षीय बालक नेतराम है जिसे पिता की मृत्यु के उपरान्त अंत्येष्टि के पूर्व ही श्मशान में पिता के जूते पहनाए जाते हैं। अनाथ हो चुका बच्चा हतप्रभ है कि उसे इतने बड़े जूते क्यों पहनाए जा रहे हैं। यह प्रक्रिया थोड़ी अटपटी जरूर लगती है। सम्भवत:, किसी क्षेत्र में ऐसी कोई परिपाटी रही होगी कि मृत्यु के पश्चात् पुत्र को पिता के जूते श्मशान में ही पहनाए जाएँ। यह जिम्मेदारियों का प्रतीक हो सकता है किन्तु वैवाहिक स्वीकृति के समान जूते पहन लेने की तीन बार हामी भरवाने के पीछे कथाकार ने जिस कारण को अंत में पिरोया है ,वह स्तब्ध कर देने वाला है। – ‘‘अब नेतराम को अपने बाप की जगह मजदूरी, हलवाही में तब तक खटते रहना है जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।’’ निश्चित ही दस वर्षीय बच्चे के साथ पूरे समाज के सामने किया गया यह व्यवहार चौंकाता ही नहीं, झटका भी देता है। यह मानवता एवं समाज पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न है। तथाकथित विकास एवं समानता, नैतिकता एवं मानवता का राग अलापते युग में ऐसे अनेक नेतराम हैं। हम अपने आप से प्रश्न पूछें कि क्या हमारा ध्यान उनकी तरफ जाता है ? निश्चय ही कथाकार ऐसी रचनाओं द्वारा हमारे सामने उन्हें खड़ा ही नहीं करता वरन् कुछ करने की प्रेरणा भी देते हैं।
बारम्बार यह महसूस होता है कि घटनाएँ हमारे सामने की है, हमारी हैं, पर, जब ये ही लघुकथाओं की काया में ढ़लकर आती हैं तो बिजली के से झटके क्यों दे जाती हैं, चौंकाती क्यों हैं? निश्चित ही कथाकारों के शिल्प एवं उनकी भाषा रचना में तीखापन भरती है।
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रामेश्वर काम्बोज ”हिमांशु”
ऊँचाई
पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”
उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”
“नहीं तो” – मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।
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विक्रम सोनी
अंतहीन सिलसिला
दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम…!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’
‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’
‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’
नेतराम चुप रहा।
एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।
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डॉ0 अनीता राकेश,एसो0 प्रोफेसर,हिन्दी विभाग,जे0पी0 वि0वि0, छपरा (बिहार)