दिसम्बर -2018

देशसपनों के गुलमोहर     Posted: December 1, 2016

अमेरिका से तीन माह बाद लौटी रश्मि, पति रवि के साथ कदमताल करते हुए एयरपोर्ट से निकल कर ‘पार्किंग-लॉट’ में पहुँची तो रवि को एक नई चमचमाती उजली ‘इनोवा’ का दरवाजा खोलते देख चौंकी लेकिन प्रफुल्लित नहीं हुई, अपितु मुर्झा गई।
‘‘तो इनोवा ले ली? मतलब मेरे गुलमोहर कटवा दिये?’’ बुझे स्वर में पूछा उसने।
‘‘ये बातें बाद में…. अभी तो इस महारानी की सवारी का लुत्फ़ उठाओ। पता है सड़कों पर यूँ फ्रिसलती है ज्यों मानसरोवर में राजहंस तैरता है। ‘हाय री मेरे सपनों की गाड़ी’ मुस्कुराते हुए कहा उसने और रश्मि को उसकी मुस्कान जहर-सी लगी।
‘‘और मेरे सपनों की फ्रफसल का क्या?’’ एक ठंडी लंबी साँस लेते हुए रश्मि ने कहा और पलकें मूँदकर दर्द पीने की कोशिश करती हुई अतीत में खोने लगी….
…. बरसों पहले बड़े अरमान से घर के पिछले आँगन में उसने दो शिशु-गुलमोहर रोपे थे, यह सोच कर कि कम से कम एक को तो मिट्टी अपना ही लेगी पर उदार मिट्टी ने दोनों को अपना लिया और दोनों साथ-साथ ही बड़े होकर, एक दिन सुर्ख गुलाल से फूलों से लद गए। उसकी ललछौंही छाँव में बैठ कर कितने ही काम निपटाती थी वह। बच्चों के अनुराग से बरसते थे वो रेशमी, नर्म, फूल उस पर। उसके सुख की निरंतरता में बाधा पड़ी…. अभी कुछ महीने पहले रवि ने रट लगा ली थी कि पुरानी गाड़ी बेच कर वह नई ‘इनोवा’ लेंगे पर उससे पहले गुलमोहर कटवाकर गैरेज़ बनवाएँगे ,ताकि उनसे झरने वाले फूल-पत्ते और पक्षियों की बीट गाड़ी को खराब न कर सकें। रश्मि जमकर विरोध करती रही ,पर उसे बड़ी बिटिया पुरवा के पास तीन महीने के लिए अमेरिका जाना पड़ा और पीछे से रवि ने मनमानी कर ही ली।
गाड़ी घर के सामने रुकी और वह झटके से बाहर निकली तो छोटी बिटिया प्राची आ कर माधवी-लता-सी उसके गले से लिपट गई, ‘‘मम्मा! आपके लिए सरप्राइज़ है।’’
‘‘जानती हूँ…. उसी पर सवार हो कर तो आई हूँ,’’ कसैले स्वर में कह वह उसे परे करते हुए पिछले आँगन में पहुँची…. यह क्या? अबीरी-फूलों की आभा बिखेरते उसके दोनों गुलमोहर सिर जोड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे और उनके आसपास एक संगमरमरी चबूतरा भी बनवा दिया था। चार हाथ की दूरी पर सफ़ेद नीली पॉली-शीट का बना एक सुंदर कार-शेड भी जैसे उसका स्वागत कर रहा था…. उसी पल प्राची और रवि भी सामने आ कर खड़े हो गए और उसने एक साथ दोनों को बाहों में भर लिया।
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