दिसम्बर -2018

अध्ययन -कक्षहिन्दी-लघुकथाओं में व्यंग्य-चित्रण     Posted: February 1, 2018

 हिन्दी-साहित्य में अन्य विधाओं की भाँति ही व्यंग्य भी एक स्वतंत्र विधा तो है ही, इसी के साथ व्यंग्य साहित्य में एक रस की भूमिका का भी निर्वाह करता है। यह नाटक में मिला तो नाटक व्यंग्यात्मक नाटक बन जाता है, इसी प्रकार कहानी, गीत, कविता, ग़ज़ल इत्यादि के साथ-साथ लघुकथा में व्यंग्य रस मिल जाने से व्यंग्यात्मक लघुकथा बन जाती है।

आठवें दशक में दो दलों के मध्य एक विवाद उभरा था कि जिस लघुआकारीय कथात्मक विधा में व्यंग्य नहीं होगा, वह लघुकहानी तथा जिस लघुआकारीय कथात्मक विधा में व्यंग्य होगा, वह ‘लघुकथा’ कहलाएगी । यह विवाद अनेक वर्षों तक चला किन्तु होशंगाबाद में हुए सम्मेलन में यह विवाद समाप्त कर दिया गया और यह तय किया गया कि कोई भी लघुआकारीय कथात्मक विधा उसमें व्यंग्य, न हो लघुकथा कहलाएगी ।

यहाँ यह जान लेना अप्रासंगिक न होगा कि वस्तुतः ‘व्यंग्य’ क्या है ? मानव-चरित्र की दुर्बलताओं की अपेक्षात्मक आलोचना ‘व्यंग्य’ कहलाती है। इस परिभाषा को ध्यान में रखकर इस विधा का साहित्य में सटीक उपयोग किया जाता है।

इस काल में सृजित प्रायः लघुकथाओं में व्यंग्य अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता था, किन्तु सन् 1986 के आसपास क्रमशः व्यंग्य वाली शर्त समाप्त हो गयी और स्थूल से सूक्ष्म की यात्र करती कथात्मक विधा लघुकथा के रूप में स्थापित हो गयी, उसमें व्यंग्य हो, न हो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता था। यदि कथानक की माँग हो तो व्यंग्य आ भी सकता है, जैसे अन्य विधाओं में स्वाभाविक रूप से आये व्यंग्य का स्वागत होता है, वैसे ही लघुकथा में भी होने लगा । अब यह लघुकथा की अनिवार्यता नहीं रह गया था। आज की लघुकथाएँ हम सब देख ही रहे हैं।

हमने इस लेख में कुछेक वैसी लघुकथाओं का चुनाव किया है, जिसमें व्यंग्य के चित्रण से लघुकथा श्रेष्ठ बन गयी या यों कहें जिन लघुकथाओं में कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति हेतु व्यंग्य का चित्रण अपरिहार्य हो गया था । इस क्रम में सर्वप्रथम कमल चोपड़ा की लघुकथा ‘हँसी’ की चर्चा करना चाहूँगा । इस कथा में लेखक ने व्यंग्य के माध्यम से यह क्षिप्रता के साथ स्पष्ट करना चाहा है कि आप जब दूसरों पर कीचड़ उछालेंगे तो उसके छींटे आप पर भी आयेंगे ही। नायिका तेज गाड़ी चलाते हुए बेटे को खुश करना चाहती है और कीचड़ से गाड़ी गुजारते हुए बगल से गुज़र रहे व्यक्ति पर छींटे पड़ जाते हैं और वह हँस पड़ती है। घर आने पर उसे पता चलता है कि आज बर्तन माँजने वाली नहीं आएगी और वह खीझकर खुद बर्तन माँजने लगती है। बर्तन माँजते-माँजते नायिका के मुँह पर राख लग जाती है, जिसे देखकर उसका बेटा हँस देता है।

डॉ. सतीशराज पुष्करणा चूँकि आठवें दशक से लघुकथा-जगत् में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने भी व्यंग्य का चित्रण करती अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं, उनमें ‘अपाहिज’ लघुकथा अपना विशेष महत्त्व रखती है। यह लघुकथा मात्र सात पंक्तियों की है जो सर्वप्रथम कमलेश्वर के सम्पादन में प्रकाशित ‘गंगा’ मासिक पत्रिका के लघुकथांक में प्रकाशित हुई थी । इस लघुकथा में नायक अपने पिता से अपनी शादी करने की बात करता है। पिता कहता है अपने पैरों पर तो खड़े हो जाओ । उत्तर में बेटा कहता है, “अगर मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका हूँ तो क्या हुआ, वो तो अपने पैरों पर खड़ी है”- ऐसा चुभता व्यंग्य जिसे इस लघुकथा का शीर्षक और अधिक पैना बना देता है।

घनश्याम अग्रवाल व्यंग्यपरक की लघुकथा ‘दारूबंदी’ काफी चर्चित रही है। इस लघुकथा में व्यंग्य को धार देने में शीर्षक तो अपना औचित्य सिद्ध करता ही है, इसका कथानक भी अपने भीतर तिलमिलाता व्यंग्य लिये है। मंत्री जी चाहते हैं केन्द्र ने इस वर्ष शराबबंदी वर्ष मनाने की योजना बनायी है, जिस हेतु वह अनुदान भी देगी, किन्तु उनका सचिव कहता है कि हमारे बजट में कुल पन्द्रह करोड़ ही है और खर्च होगा बीस करोड़-यह पाँच करोड़ कहाँ से आयेगा ? मंत्री जी कहते हैं तुम इसकी चिन्ता मत करो । जैसा कहता हूँ वैसा करो । दूसरे दिन, मद्य विभाग मंत्रालय से दस करोड़ के नए शराबघरों और नए शराब कारखानों के लिए लाइसेंस जारी कर दिए गए।”

इसमें संदेह नहीं यदि सटीक स्थान पर सटीक व्यंग्य का उपयोग किया जाए, तो रचना निस्संदेह श्रेष्ठ बन जाती है और व्यंग्य अपना वांछित प्रभाव छोड़ जाता है।

सदी के अंतिम दशक में डॉ. परमेश्वर गोयल की एक लघुकथा ‘बीमारी’ बहुत चर्चित रही है। कारण उसमें बेरोजगारी की समस्या पर तिलमिला देने वाले व्यंग्य का चित्रण था । जब एक व्यक्ति एक रिक्शावाले से पूछता है कि तेरे लड़के किस वर्ग में पढ़ते हैं ? तो उत्तर में वह कहता है, “मैंने उन्हें इस बीमारी से दूर रखा है।” फिर आगे और पूछने पर वह कहता है, “ वे पढ़कर क्या करेंगे ? बेकारों की फौज में बढ़ोतरी करेंगे, यही ना ! लड़के निरक्षर रहकर रिक्शा चला लेंगे । कम-से-कम अपना और अपने परिवार का पेट  तो भर लेंगे, मजदूरी तो कर लेंगे, माँ-बाप पर बोझ नहीं बनेंगे ।” एक छोटी-सी लघुकथा में बेरोजगारी जैसी समस्या पर इससे सुन्दर और चुभता व्यंग्य चित्रण और क्या होगा ?

इसमें संदेह नहीं, व्यंग्य-चित्रण ने असंख्य लघुकथाओं को अतिरिक्त गुणवत्ता प्रदान की है। व्यंग्य उसी लघुकथा को गुणवत्ता प्रदान कर पाता है, जिसमें उसकी स्वाभाविक रूप से आवश्यकता हो। इस प्रकार की लघुकथाओं में भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की एक लघुकथा ‘व्यवहार’ महत्त्वपूर्ण है। इस लघुकथा में व्यंग्य की चोट करता यह समापन वाक्य महत्त्वपूर्ण है-“जी, हमने न तो व्यावहारिक तरीके से काम लिया । पुलिस के मार्फत जाने के बजाय सीधे चोरों से ही संपर्क कर लिया था ।” तात्पर्य यह है कि पुलिस भी चोरों से कम नहीं, यदि पुलिस के मार्फत आते तो पुलिस को भी घूस देनी पड़ती । पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार पर व्यंग्यात्मक प्रहार करती यह एक श्रेष्ठ लघुकथा है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ लघुकथा-जगत् के एक विशिष्ट हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हैं। इन्होंने अनेक प्रकार की लघुकथाओं के साथ-साथ व्यंग्य चित्रण करती अनेक लघुकथाएँ भी लिखी हैं। उनमें एक लघुकथा ‘विजय-जुलूस’ भी है। ‘विजय-जुलूस’ में सटीक व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान राजनीतिज्ञों पर चोट की है कि उनकी दृष्टि में मात्र उनका अपना स्वार्थ है बाकी देश हेतु हुए शहीद या योद्धाओं का कोई अर्थ नहीं है। सुन्दर एवं सुशिल्पित इस लघुकथा का शीर्षक भी व्यंग्य को प्रत्यक्ष करने में पूरी तरह सहायक है। इसी प्रकार लघुकथा को विकास देने में जो अन्य हस्ताक्षर पांक्तेय हैं, उनमें एक नाम सुकेश साहनी का भी है। साहनी जी विषय-वैविध्य में लघुकथा-सृजन हेतु अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी एक लघुकथा ‘तोता’ व्यंग्य-चित्रण के कारण पाठकों के मध्य चर्चित रही है। तोते को माध्यम बनाकर लेखक ने प्रशासन पर साम्प्रदायिक मामले में गहरी प्रहार किया किया है। इस लघुकथा की कतिपय अंतिम पंक्तियाँ व्यंग्य चित्रण को उभारने में अहम भूमिका का निर्वाह करती हैं। पंक्तियाँ देखें-“जिला प्रशासन के हाथ-पैर फूले थे। तोतों के शवों को देखकर यह बता पाना मुश्किल था कि कौन हिन्दू है, और कौन मुसलमान, जबकि हर तरफ से एक ही सवाल दागा जा रहा था,कितने हिन्दू मरे, कितने मुसलमान?” जिलाधिकारी ने युद्ध स्तर पर तोतों का पोस्टमार्टम कराया, जिससे यह तो पता चल गया कि मृत्यु कैसे हुई है, परन्तु तोतों की हिन्दू या मुसलमान के रूप में पहचान नहीं हो पाई।” साहनी जी की अन्य धारदार लघुकथाओं में पिंजरे,दाहिना हाथ, ग्रहण , यम के वंशज और प्रतिमाएँ हैं , जिनमें विभिन्न वर्गों की विडम्बना को चित्रित किया गया है। इनका व्यंग्य सतही न होकर  बहुत गहरा है।  श्याम सुन्दर अग्रवाल( मरुस्थल के वासी), पेट ( पारस दासोत), कुण्डली ( बलराम अग्रवाल) , लगा हुआ स्कूल ( अशोक भाटिया) शिक्षा-व्यवस्था के कर्मकाण्ड को उजागर करती अत्यन्त प्रभावशाली लघुकथा है।

राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ ने भी व्यंग्य चित्रण करती अनेक-अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं, उनमें इनकी ‘सवारी’ लघुकथा लघुकथा पुलिसिया भ्रष्टाचार को व्यंग्य-चित्रण के माध्यम से बहुत ही करीने से प्रत्यक्ष करती है। इस लघुकथा की ये पंक्तियाँ इस लघुकथा में हुए व्यंग्य-चित्रण को रेखांकित करती हैं-‘चालक ने प्रार्थना भरे लहजे में कहा, “सिपाही जी ! आप ही लोगों का कहना है कि अपनी बगल में सवारी बैठाना जुर्म है और अब आप ही…।”

चालक की पीठ पर डण्डा जमाते हुए सिपाही दहाड़ा, “हरामजादे, तुम्हें मैं सवारी दिखाई देता हूँ।”

इसमें कोई संदेह नहीं कि लघुकथा को पाठकों के मध्य लोकप्रिय बनाने में व्यंग्य चित्रण की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। व्यंग्य प्रत्यक्षतः तो हँसाता या चौंकाता है; किन्तु पढ़ लेने के बाद कहीं गहरे हृदय में जाकर इस हद तक तिलमिला देता है कि पाठक उस विषय पर सोचने-विचारने हेतु विवश हो जाता है। वस्तुतः व्यंग्य-चित्रण की यही तो विशेषता है।

सुरेन्द्र शर्मा भी लघुकथा-जगत् के एक उल्लेखनीय हस्ताक्षर रहे हैं। उन्होंने भी शताधिक लघुकथाएँ लिखी हैं, जिनमें अनेक व्यंग्य-चित्रण करती लघुकथाएँ भी हैं। उनमें ‘उनके न होने से’ काफी महत्त्वपूर्ण लघुकथा है। इस लघुकथा का शिल्प इसे सुशिल्पित बना देता है। इस लघुकथा में एक व्यक्ति अपने गाँव का परिचय देते हुए कहता है कि हमारा गाँव ऐसा है कि यहाँ आज तक कभी कोई साम्प्रदायिक या अन्य किसी प्रकार का आपसी झगड़ा-झंझट नहीं हुआ। अपने गाँव के विषय में वक्ता और कुछ बताता कि बीच में ही बात काट कर एक व्यक्ति पूछता है-“क्या इस गाँव में एक भी नेता नहीं है।” यही वाक्य इस रचना को व्यंग्यपरक लघुकथा बना देता है। यह व्यंग्य-चित्रण करता वाक्य पूरी नेता जाति पर विचार करने को बाध्य कर जाता है। यह एक सच्चाई है कि नेता कोई भी हो, किसी भी जाति का हो (अपवाद छोड़कर) अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु अंग्रेजों की तरह ‘डिवाइड एंड रूल’ वाला सूत्र लागू करते हुए कुर्सी प्राप्ति हेतु लगा रहता है।

डॉ. शंकर पुणतांबेकर व्यंग्य एवं लघुकथा में एक ऐसा बड़ा नाम है जिसकी चर्चा के बिना लघुकथा में व्यंग्य-चित्रण की बात ही पूरी नहीं हो सकती । इनकी प्रायः सभी लघुकथाओं में व्यंग्य-चित्रण ही देखने को मिलता है। इनकी एक लघुकथा ‘चुनाव’ बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस लघुकथा में प्रिंसिपल के समक्ष दो इंस्पेक्टर यानी एक स्कूल इंस्पेक्टर और दूसरा पुलिस इंस्पेक्टर में चुनाव करना यानी वह किसकी बात माने । स्कूल इंस्पेक्टर की बात नहीं मानने पर वह प्रिंसिपल पर उखड़ जाते हैं, “क्या तू भूल गया कि मैंने तुम्हें अपने काम की पहले याद दिला दी थी ?”

“भूला तो नहीं श्रीमान् ।” प्रिंसिपल ने शांत स्वर में कहा, पर आपकी तरह पुलिस इंस्पेक्टर ने भी अपने काम की याद दिलाई थी । ऐसी दशा में मेरे सामने बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि मुझे बच्चों का नतीजा नहीं, खुद अपना नतीजा तैयार करना है।

“अपना ही नतीजा ! क्या बकते हो ?”

“बक नहीं रहा श्रीमान् । मुझे अपना ही नतीजा तैयार करना था कि रोटी और प्राणों के बीच किसे चुनूँ और मैंने प्राणों को चुना ।”

इस लघुकथा में एक साथ पुलिस और शिक्षा-जगत् में व्याप्त भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कसा गया है, यानी एक तीर में दो शिकार डॉ. पुणतांबेकर ने कर दिए। हर व्यक्ति को रोटी से यानी कैरियर से अधिक जान प्यारी होती है, जिंदगी रहेगी तो कैरियर भी बन जाएगा ।

और अब अन्त में नई सदी की चर्चित लघुकथाकार कल्पना भट्ट की एक उल्लेखनीय लघुकथा ‘विकसित दुम’ की चर्चा अनिवार्य प्रतीत होती है। कल्पना अपनी पीढ़ी की प्रतिभा सम्पन्न लघुकथा-लेखिका है जिसकी लघुकथाओं में विषय वैविध्य पर्याप्त मात्र में देखा जाता है। इसकी लघुकथाओं में व्यंग्य-चित्रण करती बहुत लघुकथाएँ तो नहीं हैं, किन्तु जो हैं वो बहुत ही उत्कृष्ट हैं । इसमें ‘मूक श्रोता’ और ‘विकसित दुम’ उल्लेखनीय हैं। यहाँ मैं विकसित दुम की चर्चा करना चाहता हूँ । इस लघुकथा के पात्र मानवेतर हैं यानी कुत्ते । एक पालतू है और शेष गली के हैं । दोनों अपने-अपने दुःख-सुख की चर्चा करते हैं किन्तु अन्त में एक बूढ़ा कुत्ता आगे आता है और गली वाले कुत्तों से कहता है,क़िस्मत से अलग एक और बात है जो तुम्हारे पास है।”

“वो क्या है ?”

इससे पहले कि बूढ़ा कुत्ता कुछ बोलता, झबरे कुत्ते का मालिक वहाँ से गुज़रा और झबरे का प्यार मालिक के लिए उमड़ पड़ा ।

अनायास ही आवारा कुत्तों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, उन्हें जवाब मिल चुका था ।

यानी गली के कुत्तों के पास प्रत्येक प्रकार की स्वतंत्रता थी जबकि झबरे के पास बंधन और विवशता । स्वतंत्रता और परतंत्रता का अन्तर स्पष्ट करती यह व्यंग्य-चित्रण के माध्यम से स्वयं को सम्प्रेषित करती एक श्रेष्ठ लघुकथा है। इसका शीर्षक ‘विकसित दुम’ भी सटीक एवं प्रतीकातमक होने के साथ-साथ लघुकथा में लुके-छिपे व्यंग्य को बहुत ही धीमे से उजागर करते हुए लघुकथा को ऊँचाइयाँ देते हुए यह समझने हेतु विचार छोड़ जाता है कि स्वतंत्रता में अनेक कष्टों के पश्चात् भी एक असीम सुख व्याप्त है।

प्रत्येक लघुकथा में व्यंग्य अनिवार्य रूप से आये यह जरूरी नहीं है; किन्तु कथ्य एवं कथानक की माँग पर यदि आता है तो वह व्यंग्य-चित्रण लघुकथा को ऊँचाइयाँ प्रदान कर जाता है, जैसा कि उपर्युक्त लघुकथाओं में मैंने रेखांकित करने का सद्प्रयास किया है।

यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मैंने जितनी लघुकथाओं को अपने लेख हेतु चुना मात्र उतनी ही व्यंग्य चित्रण करती लघुकथाएँ नहीं हैं, जिनमें व्यंग्य-चित्रण किया गया है। इन लघुकथाओं के अतिरिक्त अन्य अनेक-अनेक लघुकथाएँ ऐसी हैं जिनकी चर्चा यहाँ हो सकती थी। किन्तु मेरे लेख एवं मेरे अध्ययन दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं । फिर भी अन्य लेखकों की जिनकी मात्र रचनाएँ मेरी नज़रों से गुज़री हैं, उनमें मधुदीप, मधुकांत, कांता राय, सतीश राठी, अशोक जैन, अशोक शर्मा ‘भारती’, पवन शर्मा,  बलराम, श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’,  रूप देवगुण, शील कौशिक,  वन्दना सहाय, विभा रश्मि, पुष्पा जमुआर, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, डॉ. अनीता राकेश, तारिक असलम ‘तस्नीम’, भगीरथ, सतीश दुबे, कमल कपूर, पवित्रा अग्रवाल, कमलेश भारतीय,  कृष्ण मनु, कालीचरण प्रेमी,  डॉ. किशोर काबरा इत्यादि अन्य अनेक ऐसे लघुकथाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य-चित्रण करती लघुकथाएँ लिखकर लघुकथा के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

वस्तुतः आज भी नए विषयों को लेकर व्यंग्य-चित्रण करती लघुकथाएँ लिखी जानी चाहिए ताकि यह स्वस्थ परम्परा क्रमशः विकसित होती रहे और इसी प्रकार लघुकथा अपनी विकास यात्रा करती चले ।

(डॉ.ध्रुव कुमार)

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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