दिसम्बर -2018

मेरी पसन्दसीपी से मोती तक     Posted: March 1, 2018

मेरी लघुकथा- यात्रा कोई पहले से सुनियोजित यात्रा नहीं थी ।चूँकि पढ़ने में मेरा रुझान बचपन से था, तो मैंने लगभग सब-कुछ पढ़ा । आध्यत्मिक से लेकर उपन्यास तक ।
यदि मैं अपनी लघुकथा के बारे में कहूँ, तो कहूँगी कि लघुकथाओं से मेरा परिचय ‘गीता प्रेस’ से छपने वाले ‘कल्याण’ अंक के पीछे के दो पृष्ठों में छपी छोटी-छोटी बोध कथाओं ‘पढ़ो समझो और करो’ से हुआ।
उसके बाद ‘शान्तिकुंज मथुरा’ से प्रचारित प्रसारित ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में छपी लघुकथाएँ सबसे पहले पढ़ती थी।अब से दस बारह साल पहले मैनें ‘खलील जिब्रान’ की कथाएँ पढ़ीं ,क्योंकि उनको पढ़ने में समय नहीं लगता था और कथा कहानी की समझ बहुत अधिक विकसित हो जाती थी ,शायद इसलिए । कारण कुछ भी रहा हो आज भी मैं किसी भी पत्र पत्रिका की छोटी कथाएँ पहली खेप में ही पढ़ जाती हूँ। दूसरा कारण मुझे जब भी किसी पत्र पत्रिका का स्तर जाँचना होता है , उसमें छपी छोटी-छोटी कथाएँ तथा बड़ी कहानी के बीच-बीच में कहानी से थोड़ा सा डार्क कलर करके कहानी का जो सार तत्त्व दिया
दिया रहता है वह पढ़कर मैं पत्रिका के बारे में अपनी राय कायम करती हूँ, लेकिन यह सारी बातें लघुकथा तक आती सीढ़ियाँ थीं , जो मैं अनजाने ही चढ़ती गई ।
फेस-बुक पर दो-तीन साल टहलते हुए मुझे लघुकथा क्या होती है इसका कुछ-कुछ सा भान हो पाया ।अभी तक मैं यही समझती थी कि किसी भी छोटी कथा- कहानी को लघुकथा कहा जाता है।लघुकथा को समझने लिखने के साथ ही प्रारम्भ हुआ मेरा नया सफर जिस सफर में मिले मुझे कुछ मील के पत्थर और उनकी कथाएँ पढ़कर मैंने जाना लघुकथाएँ क्या होती हैं , कैसी होती हैं ,लघुकथाएँ मन मस्तिष्क में देर तक तिरती रहतीं है और उनका असर “सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर ।”
के जैसा होता है।
लघुकथाओं के शिल्प ,कथ्य ,काल- खंड दोष, ‘मैं ‘ पात्र का न होना आदि के लिए मैंने किसी ग्रन्थादि का अध्ययन नहीं किया; इसलिए साधिकार मैं इन पर कुछ नहीं कह सकती।जहाँ तक मेरा मानना है ; लघुकथा किसी चमत्कार को न कह।कर जो हमारे अन्तर्मन को झिंझोड़ दे ,हमारे मस्तिष्क के तन्तुओं को झंकृत कर दे ,चेतना को जगा दे ,उसे ही लघुकथा कहेंगे।
अब तक मैंने डॉ0श्याम सुन्दर अग्रवाल , डॉ0बलराम अग्रवाल ,चित्रा मुद्गल, शकुन्तला किरण ,मधुदीप गुप्ता ,सुकेश साहनी ,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,सूर्यकान्त नागर, हबीब कैफ़ी, सतीश दुबे, प्रेमचंद ,रमेश बतरा ,सदाअत हसन मंटो, डॉ कमल चौपड़ा, डॉ अशोक भाटिया,पृथ्वीराज अरोड़ा, भगीरथ तथा अपने समकालीनो में से लगभग सभी को पढ़ा है।

मेरी पसन्द की पहली लघुकथा आदरणीय ‘सुकेश साहनी’ जी की ‘नपुंसक’ —

साहित्य , जगत के आंशिक साक्षात्कारों के बिम्ब की एक मालिका तैयार करता है, परन्तु ध्यान रखने योग्य जो बात है ,वह है कि वह केवल बिम्ब मालिका है ,उसका सारा सत्य और औचित्य मनुष्य के जीवन या अन्तर्जगत में स्थित है ।चूँकि सभी मनुष्यों के अन्तर्जगत होते है इसलिए उनके औचित्य और सत्य की अनुभूति सार्वजनीन होती है । सुकेश साहनी जी की लघुकथा नपुंसक में भी एक आम आदमी के अन्तर्जगत की ऊहा-पोह की स्थिति का बहुत सुन्दर सटीक चित्रण मिलता है ।
‘नपुंसक ‘ शब्द एक ‘पूर्ण पुरुष’ के ‘पौरुष’ को खोखला करता ऐसा शब्द है जो कि गाली से कहीं ऊपर है, जैसे कि इस शब्द मात्र से पुरुष के पैरो तले की जमीन खींच ली गई हो।पुरुष के पुरुषत्व की चूलें हिला देने वाला ‘ब्रह्म वाक्य’।इस लघुकथा को दो दृष्णिकोण से लिखा गया है एक कथानायक शेखर के अपने मन के अन्तर द्वन्द्व के दृष्टिकोण से दूसरा हॉस्टल में रह रहे साथी- समाज के दृष्टिकोण से।दोनो ही दृष्टियाँ बहुत मुखर होकर अपना अपना पक्ष रख रही हैं। कथा नायक का रजोगुण से सम्पन्न मन एक औरत के साथ हो रहे कुकृत्य को रोकने के लिये कृतसंकल्प हुआ जाता है । उसका तन- मन इस आदिम बीहड कृत्य पर धधक उठा है । वह शायद उस भीड़ को समझाने के उद्देश्य से वहां पहुंचा भी ,लेकिन जैसा कि कहा जाता है-“भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता”, और जब चेहरा नहीं, तो वह समझाता किसे ,और समझता कौन?
उसे उसके साथियों ने बहती गंगा में हाथ धोने के लिये कमरे में धकेल दिया ।कमरे में जाना ,अन्दर का दृश्य देखना, बाहर का शोर और भद्दे जुमले सुनना, थोडी देर कमरे में रुकना ,फिर बाहर निकल कर हाथ से इशारा करके धसू कहना ; यह सब बहुत बारीकी से कथा-नायक के कमज़ोर संकल्प के साथ साथ यह भी जताता है कि संख्याबल से बड़ी नैतिकता नहीं होती। और यदि उस समय वह उस औरत को मुक्त कराने की बात कहता भी तो ,उसकी बात नक्कारखाने में तूती की आवाज़ के मानिन्द ही होती ।
दूसरे दृष्टिकोण से- उसके भीतर के आदर्श चरित्र का इतना घनघोर शोर था कि उसका समूचा अस्तित्व अपराधबोध से ग्रसित होकर उसे धिक्कारने लगा ।
मन मस्तिष्क के चेताने पर भी समाज में होने वाले गलत नृशंस आचरणों पर भी एक आम इंसान की हालत “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता”, जितनी ही हैसियत रखता है ,परन्तु ऐसे आचरण को न रोक पाने के कारण एक संवेदनशील मन ताउम्र अपने को पश्चात्ताप की अग्नि में झुलसाता रहता है।

मेरी पसन्द की दूसरी कथा है-पृथ्वीराज अरोड़ा जी सर की ‘कथा नहीं’

वैदिक वांग्मय में ‘प्रेय’ और ‘श्रेय’ का द्वैत सर्वदा ही स्वीकारा गया है।
‘प्रेय’ अर्थात जो अपने को प्रिय हो।
‘श्रेय’ अर्थात जो लोककल्याण के हित में हो।
‘प्रेय’ ‘स्वांत:सुखाय’ होता है ।
‘श्रेय’ ‘सर्वजनहिताय’ होता है।
और ‘श्रेय’ को हमेशा ,प्रेय” से श्रेयस्‍कर स्वीकारा गया है।

पृथ्वी राज अरोड़ा जी की लघुकथा कथा नहीं यूँ तो प्रेयजनीन है <लेकिन ‘बेचारे वृद्ध’ जैसे सर्वजनीन अनुभूति की सुन्दर व्याख्या से आप्लावित है।
कथा नहीं में कथा नायक एक ऐसा बेटा है ,जो परिस्थिति वश ऐसी दुर्मोह की स्थिति में फँसा है कि वह न घर का है न घाट का ।वृद्ध जन के साथ जुड़े बेचारे शब्द से एक बिना कुछ करे-धरे जनमानस में सहानुभूति की लहर दौड़ती ही रहती है ।स्वभावतः ही बेटी का मन अपने बूढ़े माँ बाप की चिन्ता के लिये आतुर है । टिपिकल भारतीय परिवार की लघुकथा है कथा नहीं जिसमें विवाह के बाद बेटी का रुतवा पंच परमेश्वर-सा हो जाता है। मायके की पूरी पंचायत जब वह मायके आती है, तो उसके दरबार में पेश की जाती है बेटा कितना भी संस्कारी क्यों न हो बेटी जब उसे और अपने माँ- बाप को तराजू में तौलती है, तो पासंग भर कम ही बैठता है उसका भाई ।
इस कथा में भी ऐसा ही कुछ देखने में आता है भाई जो कि अपनी गरीबी के कारण अपने पिता से ज्यादा खोखला हो चुका है लेकिन माँ बाप बहन सब उसी से चाहते है कि वह सारी जिम्मेदारी अपने पर उठा ले उसकी मजबूरियों को सभी सिरे से नज़रअंदाज करते हैं लेकिन अंत मे अपने दांतो का सेट जब वह निकाल कर मेज पर रखता है तो पाठक सन्न रह जाता है वह सोच ही नहीं पाता कि अपनी सहानुभूति किस तरफ व्यक्त करें ।कथा प्रेय के सीमित दायरे से निकल कर श्रेय के विस्तृत पटल पर प्रतिष्ठित हो जाती है।
अद्भुत शिल्प इस कथा का ।

-0-
1-कथा नहीं /पृथ्वीराज अरोड़ा

वह पेशाब करके फिर बातचीत में शामिल हो गया।
दीदी ने कहा, ‘‘पिताजी को बार–बार पेशाब आने की बीमारी है, इनका इलाज क्यों नहीं करवाया?’’
उसने स्थिति को समझा। फिर सहजभाव में बोला, ‘‘मैं अलग मकान में रहता हूँ, मुझे क्या मालूम इन्हें क्या बीमारी है?’’
माँ बीच में बोली, ‘‘तो क्या ढिंढोरा पिटवाते?’’
उसने माँ की बात को नजरअन्दाज करते हुए कहा, ‘‘देखो दीदी, अगर यह बताना नहीं चाहते थे तो खुद ही इलाज करवा लेते।’’ थोड़ा रुककर आगे कहा, ‘‘इन्होंने बहुत सूद पर दे रखे हैं, पैसों की कोई कमी नहीं इन्हें।’’
पिता चिढ़े–से बोले, ‘‘जवान बेटे के होते इस उमर में डॉक्टर के पीछे–पीछे दौड़ता ?’’
इस हमले को तल्खी में न झेलकर उसने गहरा व्यंग्य किया, ‘‘आप सुबह–शाम मीलों घूमते हैं, मुझसे अधिक स्वस्थ हैं, फिर डॉक्टर के पास क्यों नहीं जा सकते थे?’’
दीदी ने चौंककर देखा। आनेवाली विस्फोटक स्थिति पर नियंत्रण करने की ग़रज़ से बीच में ही दखल दिया, ‘‘आखिर माँ–बाप भी अपनी संतान से कुछ उम्मीद करते ही हैं।’’
वह अपनी स्थिति को सोचकर दु:खी होकर बोला, ‘‘तुम नहीं जानती कि मेरा हाथ कितना तंग है। ठीक से खाने–पहनने लायक भी नहीं कमा पाता। तुम्हारी शादी के बाद तुम्हें एक बार भी नहीं बुला पाया।’’ आँखों के गिर्द आए पानी को छुपाने के लिए उसने खिड़की से बाहर देखते हुए गम्भीर स्वर में कहा, ‘‘सूद का लालच न करके मुझे कुछ बना देते तो मैं इनकी सेवा लायक न बन जाता!’’
पिताजी ने रुआँसे होकर बताया, ‘‘मेरे दो दाँत खराब हो गए थे, उन्हें निकलावाकर, नए दाँत लगवाए हैं, देखो!’’ उन्होंने दाँत बाहर निकाल दिए।
माँ बार–बार रोने लगी, ‘‘क्या करते हो? तुम्हारा सारा जबड़ा भी बाहर निकल आए तो किसी को क्या? दाँत न रहने पर आदमी ठीक से खा नहीं पाता?’’
दीदी भी रोने लगी, ‘‘दीपक, तुम्हें माँ–बाप पर जरा भी तरस नहीं आता ?’’
दीपक का चेहरा बुझते–जलते लट्टू की तरह होने लगा। दु:ख और आक्रोश में वह काँपने लगा। अगले ही क्षण उसने नकली दाँतों का सैट मेज पर रख दिया और सिसकता हुआ गुसलखाने की ओर बढ़ गया….।

2-नपुंसक / सुकेश साहनी

पूरे हॉस्टल में हलचल मची हुई थी,नवाब किसी रेजा़ (मज़दूरिन) को पकड़ लाया था, उसे कमरा नम्बर चार में रक्खा गया था, पाँच लड़के तो ‘हो’ भी आए थे। शोर, कहकहों और भद्दे इशारों के बीच कुछ लड़कों ने शेखर को उस कमरे में धकेल कर दरवाज़ा बाहर से बन्द कर लिया था। भीतर ‘वह’ बिल्कुल नग्नावस्था में दरवाजे़ के पास दीवार से सटी खड़ी थी। वह बेहद डरी हुई थी। भयभीत आँखें शेखर को घूर रही थीं। शेखर को अपने आप से नफ़रत हुई। दिमाग में विचारों के चक्रवात घूमने लगे। यह सब नारी के साथ क्रूर,घिनौना मजाक! वह बाहर निकलकर सबको धिक्कारेगा। जगाएगा उनके सोए हुए जमीर को, मुक्ति दिलाएगा इस अबला को, आदि-आदि। वह सोचता रहा। बाहर अश्लील चुटकुलों पर अट्टहास हो रहे थे। फिर भी, थोड़ा समय गुज़र जाने के बाद ही वह कमरे का दरवाज़ा खुलवाने के लिए दस्तक दे सका।
कई जोड़ी सवालिया आँखें ‘कैसा रहा’ के अन्दाज़ में उस पर टिकी थीं। न जाने उसे क्या हुआ कि वह बेशर्माी से मुस्कराया और हाथ के इशारे के साथ अपनी बाईं आँख दबाकर बोला-‘‘धाँसू!’’ प्रत्युत्तर में सीटियाँ बजीं, ठहाके लगे, उसके कन्धे थपथपाए गए। इतनी ही देर में सातवाँ लड़का भीतर जा चुका था।
शेखर वहाँ से चलने को हुआ।
‘‘कहाँ यार?” कई स्वर एक साथ उभरे।
वह अपने होठों को जबरदस्ती खींचकर मुस्कराया और हाथ के इशारे से उन्हें बताने लगा कि वह अपनी सफाई करके अभी लौटता है। अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए अपनी ही पद्चापों से उसके दिमाग में धमाके से हो रहे थे-नपुंसक ! नपुंसक ! नपुंसक….मुक्तिदाता!…नपुंसक!
-0-
डॉ सन्ध्या तिवारी पत्नी/ श्री राजेश तिवारी
चौक डाकघर ,चौक पोस्ट ऑफिस , चौक बाज़ार
पीलीभीत, 262001, उ0प्र0
Email: sandhyat70@gmail.com

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine