दिसम्बर -2018

देशजमूरे     Posted: April 1, 2018

स्क्रिप्ट के पन्ने पलटते हुए अचानक प्रोड्यूसर के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, पास बैठे युवा स्क्रिप्ट राइटर की ओर मुड़ते हुए वह भड़का, ‘‘ये तुम्हारी अक्ल को हो क्या गया है?’’

‘‘क्या हुआ सर जी, कोई गलती हो गई क्या?’’ स्क्रिप्ट राइटर ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘अरे इनको शराब पीते हुए क्यों दिखा दिया?’’

‘‘सर, जो आदमी ऐसी पार्टी में जाएगा वो शराब तो पिएगा ही न?’’

‘‘अरे नहीं, नहीं, बदलो इस सीन को।’’

‘‘मगर ये तो स्क्रिप्ट की डिमांड है।’’

‘‘गोली मारो स्क्रिप्ट को। यह सीन फिल्म में नहीं होना चाहिए।’’

‘‘लेकिन सर, नशे में चूर होकर ही तो इसका असली चेहरा उजागर होगा।’’

‘‘जो मैं कहता हूँ ,वह सुनो, ये पार्टी में आएगा, मगर दारू नहीं सिर्फ पानी पिएगा ;क्योंकि इसे धार्मिक आदमी दिखाना है।’’

‘‘लेकिन ड्रग्स का धंधा करने वाला आदमी और शराब से परहेज़? यह क्या बात हुई?’’

‘‘तुम अभी इस लाइन में नए हो, इसको कहते हैं कहानी में ट्विस्ट।’’

‘‘अगर यह धार्मिक आदमी है तो फिर उस रेप सीन का क्या होगा?’’

‘‘अरे यार, तुम जरूर कम्पनी का दिवाला पिटवाओगे। खुद भी मरोगे और मुझे भी मरवाओगे। ऐसा कोई सीन फिल्म में नहीं होना चाहिए।’’

‘‘तो फिर क्या करें?’’

‘‘करना क्या है? कुछ अच्छा सोचो। स्क्रिप्ट राइटर तुम हो या मैं?’’ प्रोड्यूसर ने उसे डाँटते हुए कहा।

‘‘स्क्रिप्ट राइटर कुछ समझने का प्रयास ही कर रहा था कि प्रोड्यूसर स्क्रिप्ट का एक पन्ना उसके सामने पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘और ये क्या है? इसको अपने देश के खिलाफ़ जहर उगलते हुए क्यों दिखाया है?’’

‘‘कहानी आगे बढ़ाने के  लिए यह निहायत जरूरी है सर, यही तो पूरी कहानी का सार है।’’ उसने समझाने का प्रयास किया।

‘‘सार-वार गया तेल लेने! थोड़ा समझ से काम लो, यहाँ देश की बजाय इसे पुलिस और प्रशासन के जुल्मों के खिलाफ बोलता हुआ दिखाओ ,ताकि पब्लिक की सिम्पथी मिले।’’ प्रोड्यूसर ने थोड़े नर्म लहजे में उसे समझाते हुए कहा।

‘‘नहीं सर! इस तरह तो इस आदमी की इमेज़ ही बदल जाएगी। यह माफिया डॉन जो विदेश में बैठकर हमारे देश की बर्बादी चाहता है, जो बम धमाके करवाकर सैकड़ों लोगों की जान ले चुका है, उसके लिए पब्लिक सिम्पथी पैदा करना तो सरासर पाप है।’’ स्क्रिप्ट राइटर के सब्र का बाँध टूट चुका था।

उसे यूँ भड़कता देख, अनुभवी और उम्रदराज़ अभिनेता ,जो सारी बातें बहुत गौर से सुन रहा था, उठकर पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीमे से बोला, ‘‘‘राइटर साहिब! हमारी लाइन में एक चीज़ पाप और पुण्य से भी  बड़ी होती है।’’

‘‘वो क्या सर?’’

‘‘वो है फाइनेंस। फ़िल्म बनाने के लिए पुण्य नहीं, पैसा चाहिए, पैसा! कुछ समझे?’’

‘‘समझने की कोशिश कर रहा हूँ सर।’’ ठंडी साँस लेते हुए उसने जवाब दिया।

सच्चाई पर से पर्दा उठते ही स्क्रिप्ट राइटर की मुट्ठियाँ बहुत जोर से भिंचने लगीं और वहाँ मौजूद हर आदमी अब उसको माफिया डॉन का हमशक्ल दिखााई दे रहा था।

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