दिसम्बर -2018

देशबदलते दृष्टिकोण     Posted: April 1, 2018

संजीवनी तो बस एकटक छत को घूरते हुए सोचे जा रही थीं कि अब तक वो इतनी अन्धी कैसे बनी रहीं, आज जब उनकी आँखें खुली थीं तो उनके आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे, आज ही तो सही मायने मे वे  जान पाई थीं कौन अपना है और कौन पराया।

बात तो बस हँसी मजाक मे ही शुरू हुई थी, लेकिन इतना बिगड़ जाएगी ये कहाँ किसी ने सोचा था। बिट्टी, उनकी तबियत खराब है सुनकर उनको देखने के लिए अपने ससुराल से आई हुई थी। यूँ ही बातों- बातों में उसने कहा “अम्मा तुम तो मेरा और भैया का हिस्सा- बाँट अपने हाथों ही कर दो, क्या फ़ायदा कि तुम्हारे बाद हम भाई- बहन के बीच लड़ाई झगड़ा हो” – उन्होने भी हँसते हुए ही कहा, अरे बिट्टी काहे की हिस्सा बाँट, तू तो ले गई अपना हिस्सा तेरे ब्याह में, अब तो जो है ,सब रज्जू  का है। हाँ भाई तेरा जो चाहे सो करे, वह तुम दोनों के बीच की बात… और हँसती रहीं। मगर पता नहीं बिट्टी को क्या हुआ कि एकदम गुस्से में आ गई और बोली, ऐ अम्मा तुम क्या समझती हो, तुम सब भैया को सौंप दोगी और मैं चुप बैठी रहूँगी, तुम इस गलत फहमी मे ना  रहना। आजकल बेटा बेटी दोनो का बराबर का हिस्सा होता है, तुमने न दिया ,तो मैं कोर्ट कचहरी तक जाऊँगी, मगर ऐसे ही अपना हिस्सा थोड़े छोड़ दूँगी।  वे तो अवाक् रह गईं थी यह बात सुनकर।  सब थोड़ी देर तो सन्न से बैठे रहे उसके बाद ममता ने खाना लगाया लेकिन सब बिना खाए-पिए ही अपने अपने कमरों में चले गए ।

वह अपने बिस्तर पर  मानो सकते की मारी-सी बैठी थीं और सोच रही थी कि ये सब क्या हो गया, आखिर कहाँ गलती हो गयी उनसे ….  इतने में उनकी बहू ममता उनके कमरे में आई और उनका हाथ पकड़ कर सहलाते हुए बोली “अरे अम्मा जी आप काहे को चिन्ता करती हैं, तबियत और खराब हो जाएगी आपकी।  मान लीजिए न जीजी की बात, वह जो कह रही हैं।  आप तो बस जल्दी से  ठीक हो जाएँ और बबली और चिंटू  के साथ खेलें , हमारे सर पे आपका साया रहे, हमें इस से जादा क्या  चाहिए। आपका आशीर्वाद बना रहे हमें कौन- सी कमी है। वे उसका मुँह देखती रहीं और उसे गले लगाकर बोलीं  “अच्छा जा अब रात बहुत हो गई सो जा, बच्चे भी राह देख रहे होंगे तेरी।”

ममता के जाते ही वे फूट-फूटकर रो पड़ीं, यही सोच सोचकर उनकी आँखों से जारोजार आँसू बह रहे थे कि जिसे पराई समझकर हमेशा मन से दूर रखा, उसने तो हमेशा हमें गले ही लगाया, सुबह शाम अम्मा जी- अम्मा जी करती देखभाल करती रही।  हम ही मूरख थीं जो, सच्चे स्नेह को दिखावा मानकर खुद को ठगाती  रहीं। आज वह जान गई थी कि  बेटियाँ पराई ही होती हैं, अपनी तो बहुएँ होती हैं ,जो नए आँगन में, नई मिटटी में रोप दी जाती हैं, उसके बाद भी फलती फूलती हैं,  ढलती उम्र में हमारा सहारा बनती हैं।  मानो खुद को ही सीख देती हुए बोलीं -“हम सासुओं को बेटियों को विदा करते हुए सच्चे मन से विदा कर देना चाहिए और बहुओं को गृह प्रवेश करते हुए पूरे और सच्चे मन से अपना लेना चाहिए।मन ही मन उन्होने कुछ तय किया और शान्त मन से सो गईं।

सुबह उठीं, बहू को आवाज़ दी, उसके आने पर बोलीं .. ‘’सुन तो ममता,  रज्जू से कहना बिट्टी की वापसी की टिकट करा दे, जाए। अपना घर बार देखे बहुत दिन हो गए …कब तक मायके में पड़ी रहेगी, पराई गृहस्थी में  टाँग अड़ाती रहेगी।

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