दिसम्बर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2018

1- चमक
गर्मी का मौसम शुरू हो गया था, आँधी-बारिश कभी-भी आ सकती थी। रीना को चिंता थी अपने घर की छत साफ करवाने की। पिछले साल नालियों में कचरा फँसने से पूरी छत पानी से भर गई थी व सीढ़ियों के रास्ते पानी घर में घुस आया था। बड़ी विकट समस्या खड़ी हो गई थी, घर साफ करतेे हुए कमर के दर्द को याद करके ही रीमा सिहर गई। सफाई वाली पहले से बीमार चल रही थी। कामवाली बाई ने भी ‘समय नहीं है’ का रोना रोकर इंकार कर दिया था। नौकर हरी भी अकेला करने में असमर्थ था। अब करे तो क्या करे! उसने काफी समझा-बुझाकर, अनुनय विनय कर, एक्स्ट्रा पैसों का लालच देकर माली को तैयार किया इस काम के लिए। अगले दिन सुबह-सुबह माली आ गया। उसने नौकर हरी को भी साथ लगा दिया उसकी मदद को। दोनों ने मिलकर थोड़ी-ही देर में छत साफ कर दी। अब रह गया तो एक पुराना बड़ा-सा टब, जिसमें कुछ दिनों पूर्व कराए गए मरम्मत के काम में से बचा रेत रखा था। “इसे भी खाली कर दो। रेत कट्टे में भर कर, टब नीचे आँगन में ले जाकर रख दो।” रीमा ने कहा। “अब टैम ना है मैडम जी, मुझे और काम करने भी जाना है, पहले ही बहुत देर हो गई है, फिर कभी आकर कर दूँगा।”माली ने असमर्थता जता दी। “अरे, ज़रा-सी देर लगेगी, निपटा जो दे।” “अब ना, बहुत टैम लग जाएगा, फिर कर दूँगा।” माली नहीं माना। न चाहते हुए भी रीमा को माली की बात माननी पड़ी। वह काम निपटाकर नीचे उतर आया व अपनी साइकिल उठाकर चलने को हुआ, तभी रीमा ने आवाज़ लगाई, “अरे सुन, अपने पैसे तो लेता जा।” रीमा ने एक सौ का नोट उसके हाथ पर रखा, फ्ले, कम तो नहीं हैं न!” माली ने नोट झट से जेब में रखा और साइकिल फिर से स्टैंड पर चढ़ा दी व बोला, “लाओ, टब भी खाली कर ही देता हूँ लगे हाथ, फिर टैम मिले न मिले।”
2- निक्कू नाच उठी
नींद में भी कसमसा रही थी निक्कू, ठीक से सो नहीं पा रही थी। माँ समझ गई, उसने तेल मालिश की व थोड़ी देर पैर दबाए, तब जाकर उसे नींद आ पाई।
“सारा दिन उछलती कूदती रहती है, एक मिनट भी चैन से नहीं बैठती, खाने में चोर और नाचने में मोर है, पैर तो दुखेंगे ही ना!” कहते हुए माँ ने उसका माथा प्यार से चूम लिया व चादर ओढ़ा दी।
सच ही तो था। जब से निक्कू के दादा-दादी आए थे। सारा दिन उन्हें अपने खिलौने, किताबें दिखाने में लगी रही, उनके साथ खेलती रही। शाम को उन्हें लैपटॉप पर अपनी पसंद के गाने लगवा कर डांस भी करके दिखाया। सबने रोका कि अब बस करो, पर वह कहाँ रुकने वाली थी, घंटे-भर तक डांस करती रही।
“मम्मा, आज चाचू बी आएँगे न?” सुबह उठते ही उसने माँ से पूछा।
“हाँ बेटा।”
“मम्मा, मैं उनको बी डांस करके दिखाऊँगी।”
“नहीं बेटा, इस बार खिलौने दिखा देना, डांस अगली बार दिखा देना।” माँ ने समझाने की कोशिश की।
“नईंईंईं—-, मम्मा, मुझे डांस करके दिखाना है।” उसने ज़िद की।
“कल आपके पैर दुख रहे थे न! आप फिर थक जाओगे।”
“ऊंऊंऊं-।”
“अच्छे बच्चे मम्मा का कहना मानते हैं न!य” माँ ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लेकर कहा।
उसने उदास मन से सहमति में गरदन हिलाई और दौड़कर दादाजी के कमरे में गई, “दादू, दादू, आज मैं डांस नईं करूँगी।”
“क्यों बेटा?”
“मम्मा ने मना किया है। कल रात को मेरे पैर में दुखु हो रा था न इसलिए।य् फ्ठीक कह रही है मम्मा, हम बैठकर गेम खेलेंगे, ओके—-!”
उसने अच्छे बच्चे की तरह सहमति जताई।
शाम को जब चाचू आए तो उन्होंने निक्कू को आवाज़ लगाई, फ्हमें नाच के नहीं दिखाओगी?”
“मम्मा ने मना किया है।य् उसने मायूसी से कहा। उसने गुस्से में खिलौने भी नहीं दिखाए व अनमनी-सी घूमती रही।
चाचू ने उसका मूड ठीक करने की कोशिश की, फ्अच्छा चलो हम यहाँ बैठकर मोटू-पतलू देखेंगे।”
“मुझे नी देखना।”कहकर वो रूसकर जाने लगी। आखिरकार चाचू टी-वी- के सामने बैठकर चैनल बदलने लगे।
पर ये क्या!! निक्कू तो नाचने लगी।
टीवी से धीमे स्वर में आती मधुर संगीत की आवाज़ और किसी ने नहीं पर निक्कू के पाँवों ने सुन ली थी। और वे थिरक उठे।
3-फ़र्ज़
उम्र होते ही माँ-बाप ने तो ‘लड़का डॉक्टर है’,यह जान कर ही शादी कर दी थी। तब लड़कियों से पूछने का चलन ही कहाँ था।
शादी के बाद शुरू में तो पति अपने छोटे से दवाखाने में देसी इलाज कर थोड़ा बहुत पैसा जुटा लेते थे, पर विभिन्न तरह के प्रयोगों की सनक ने उन्हें कहीं का न छोड़ा। कभी दूध के साथ हरी मिर्ची का प्रयोग, कभी केवल दूध का सेवन तो कभी स्वमूत्र का सेवन, ऐसे ही अनेक प्रयोग वे स्वयं पर ही करते।
दुकान तो धीरे-धीरे बंद हो गई पर सनक बढ़ती ही गई।घर खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया।आखिरकार घर चलाने के लिए सविता को बाहर निकलना ही पड़ा। किस्मत से सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई व दुगुनी ज़िम्मेदारी आ गई उसके कंधों पर। फिर भी कभी उफ्र न की उसने। अपना कर्तव्य मानकर निभाती चली गई।
अपनी अनेक छोटी-बड़ी इच्छाओं को दबाकर जो मिला उसी में संतुष्टि का अहसास करते हुए जीवन धारा में बहती रही। आज रिटायरमेंट के बाद वही घर का रास्ता कुछ ज़्यादा ही लम्बा हो गया था। पैर अपनी गति से आगे चल रहे थे व मन कहीं वर्षों पीछे भटक रहा था।
घर की चौखट पर कदम रखते ही चलचित्र की भांति चल रही अब तक के जीवन की रील अपनी फिरकी पूरी कर झटके से थम गई व उसे कुछ बोझ हलका होने का आभास हुआ।
आते ही पर्स एक ओर पटक कर आराम से चाय बनाकर बैठी ही थी चुस्कियों का आनंद लेने कि पति की बातों ने जैसे चाय में ज़हर-सा घोल दिया, फ्मैं चाहता था कि तुम बहुत नामी शिक्षक बनो, किताबें लिखो, अवार्ड पाओ। कुछ हद तक तो तुम सफल हुई हो पर पूरी तरह नहीं।”
सुनकर सुन्न-सी हो गई सविता।
“मैं भी चाहती थी कि मेरा पति भी कुछ काम करे, इतने बड़े-बड़े न सही, कम-से-कम अपनी पत्नी व बच्चों का खर्च तो उठाए, जो कि तुम्हारा फ़र्ज़ भी था।”
4- कुदरत की नैमत
गुप्ता जी का पालतू कुत्ता टॉमी, जब भी गले में चमचमाते पट्टे व जंजीर के साथ घूमने निकलता तो उसका सामना रोज़ ही मोती व अन्य गली के कुत्तों से होता। वो उन्हें मुँह चिढ़ाता, हिकारत भरी नज़रों से देखता, नाक भौं सिकोड़ता हुआ शान से गरदन उठा कर चलता। गली के कुत्तों को उसकी ये हरकत नागवार गुज़रती।
एक दिन जैसे ही वो घर से निकला, सबक सिखाने के इरादे से मोती व अन्य कुत्तों ने उसे घेर लिया।
मोती ने पूछा, फ्क्यों रे! ऐसा क्या है तेरे पास, जो तू इतना इतराताफिरता है?”
टॉमी ने मूँछों पर ताव देते हुए कहा, फ्देखो! मैं कितनी शान से रहता हूँ। बढ़िया-बढ़िया खाता हूँ, मखमली बिस्तर पर सोता हूँ।”
फ्तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है। खुश तो हम भी रहते हैं, अच्छा ही खाते हैं, पाँव पसार कर सोते भी हैं।”कालू ने जवाब में पूँछ अकड़ा कर कहा।
फ्तुम क्या जानो, घर के लोग मुझसे कितना प्यार करते हैं, मालकिन अपने बेटे की पिटाई करती हैं, पर मुझे बड़े प्यार से रखती हैं।”
फ्तुझे तो एक मालकिन ही प्यार करती हैं, हमें तो सारा मोहल्ला प्यार करता है।”भूरे ने मूँछों को ताव दिया।
फ्मैं वफादारी से उनके घर की चौकीदारी करता हूँ। दो वक्त बाहर घूमने भी जाता हूँ। है तुम्हारे पास मेरे जितनी सुविधाएँ?”
अब जवाब देने की बारी मोती की थी।
मोती ने भी मूँछों को ताव दिया और बोला, फ्देखो टॉमी! वफादारी से हम भी सारे मोहल्ले के लोगों के घरों की देखभाल करते हैं। जब चाहे, जहाँ चाहे घूम भी लेते हैं। जो-जो तुम्हारे पास है, वो सब कम या ज़्यादा हमारे पास भी है। हाँ! बस एक चीज़ नहीं है हमारे पास और उसका न होना ही कुदरत की सबसे बड़ी नैमत है।”
टॉमी ने आँखें फाड़ते हुए पूछा, फ्वो क्या?”
मोती ने गरदन उठाकर शान से कहा,”पगले का पट्ठा !”
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5-अपेक्षा
‘‘रीमा, तुमने नीलेश को फोन कर दिया था न तत्काल में रिज़र्वेशन कराने के लिए?’’ सुमित ने नाश्ते की प्लेट अपनी ओर सरकाते हुए पूछा।
‘‘जी, उसी के फोन का इंतजार कर रही हूँ। रिज़र्वेशन मिल जाए तो अच्छा है, आशा मेरे बचपन की सहेली है, उसके बेटे की शादी में जाने का बहुत मन है मेरा, उसने भी
बहुत ज़ोर देकर आग्रह किया था। फिर हमारे यहाँ भी तो आई थी न वो शादी में, तो जाना तो जरूरी-सा है।’’ चाय का सिप भरते हुए रीमा ने कहा।
ट्रीन-ट्रीन कर फोन बज उठा। बड़े उत्साह से रीमा ने फोन उठाया, ‘‘हाँ बेटा क्या रहा रिज़र्वेशन का?’’
‘‘सॉरी माँ,नहीं मिल पाया।’’
‘‘ठीक है बेटा, कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। कोई जाना ऐसा ज़रूरी भी नहीं था।’’ कहकर उसने फोन काट दिया।
पर सुमित से उसके मनोभाव छिप न सके। मुँह नीचे करके वह नाश्ता करने लगी।
‘‘ ट्रेन में नहीं मिला टिकट तो प्लेन से कराने को कह देतीं।’’
‘‘नहीं, क्यों कहती?’’
‘‘आखिर बेटा है हमारा वह। हमारा अधिकार है उस पर।’’
‘‘तो, उसका भी फर्ज़ बनता था, वह भी तो कह सकता था न!’’ कहते हुए रीमा की आवाज भर्रा गई।
‘‘लाओ फोन दो, मैं ही कह देता हूँ।’’उसे सुबकते हुए देखकर सुमित से रहा नहीं गया।
‘‘नहीं, कसम है आपको मेरी, आप भी नहीं कहेंगे कुछ’’ रीमा रुआँसी-सी लगभग फोन उठा कर पटकने को ही थी कि फोन फिर घनघना उठा।
‘‘माँ, मैंने आपका प्लेन का टिकट करा दिया है, आप प्रिन्ट आउट निकाल लेना और ध्यान से जाना।’’ उधर से आवाज़ आई।
‘‘आँखों में आँसू व होठों पर मुस्कान का मिलन देख सुमित ने मुस्कराते हुए मिठाई उसी ओर बढ़ा दी।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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