दिसम्बर -2018

देशस्वाभिमानी     Posted: June 1, 2018

डाइनिंग टेबुल के चारों पाँव  ढीले पड़े गए थे। खाना खाते वक्त हमें हल्के भूकम्प की अनुभूति होती। इस समस्या से निजात पाने के लिए हमें एक कुशल बढ़ई की तलाश थी। समय पर वैसा बढ़ई भाग्य से मयस्सर भी हो गया। उस बढ़ई ने एक कुशल सर्जन की तरह चारों पांव को नवजीवन प्रदान कर दिया। घर के कई अन्य फर्नीचर भी छोटी-मोटी बीमारियों के शिकार थे। जब दिनभर के लिए घर पर डाक्टर आया हो तो फिक्र किस बात की। उस कुशल बढ़ई ने आनन-फानन में उनका भी इलाज कर दिया। जो वाजिब पैसा था, उस कुशल बढ़ई को दे दिया गया। वह खुश होकर चला गया।

अभी कुछ ही दिन हुए थे कि डाइनिंग टेबुल की बीमारी दूर कर गई। खाना खाते वक्त हल्के भूकम्प का दौर फिर शुरू हो गया। हम उस कुशल कारीगर पर खीज उठे। दरअसल बीमारी अंदरूनी थी। लकड़ी अंदर से भुरभुरी हो गई थी। मगर हमारी पत्नी ने सारा दोष बढ़ई पर मढ़ना चाहा। उसने कहा, ‘‘बढ़ई ने बारीकी से काम क्यों नहीं किया ?’’

बढ़ई को फिर बुला भेजा गया। वह खुश होकर आया कि चलो फिर कुछ आय हो जाएगी। इस बार उसने स्टील के पत्तर का सहारा देकर चारों पांव में ताकत डाल दी। फिर उसने टेबुल पर जोर आजमाया और दिखाया कि देखिए साहब, अब यह स्थिर हो गया है।

वह खड़ा था कि कुछ पैसे मिल जाएंगे। मगर पत्नी ने साफ मना कर दिया। उसने प्रश्न छोड़ा, ‘‘एक ही काम के दुबारा पैसा किस बात के ?’’

बढ़ई के चेहरे पर खिली आशा खुली हवा में पड़े कपूर की तरह गायब हो गई। वह निराश और दुखी होकर बाहर निकल गया और सीढ़ियां उतरने लगा। मुझसे यह अन्याय देखा नहीं गया। मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ा। मैंने उसे रोककर कहा, ‘‘दुखी मत होवो। मैं कुछ पैसे देता हूं। तुम रख लो।’’

उसने पैसा लेने से मना कर दिया और कहा, ‘‘साहब, आप मेरे दुख पर न जाइए। पैसे देंगे तो आपकी पत्नी दुखी होंगी। मैं उनका दु:ख नहीं चाहता। हम गरीब हैं। हमारे दु:ख का क्या ? ’’और वह मेरा हाथ छुड़ाकर तेजी से दु:ख की एक संकरी गली में ओझल हो गया।

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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