दिसम्बर -2018

देशबराबरी     Posted: July 1, 2018

जैसे ही उप महासचिव सामने आये, गीता को पुराना अनुभव याद आ गया। उससे हाथ  मिलाते हुए  वह कई सैकंड उसका हाथ अपने हाथ में लिये खड़े रह गए थे। उनकी आँखों का लिजलिजापन उनके हाथों से आकर उसकी हथेली पर चिपक गया था जिसे वह काफी देर साबुन से छुटाती रही थी। “पुरुषों के साथ नौकरी करनी है ,तो इतना तो व्यवहार में बदलाव लाना पड़ेगा” , अन्य महिला अधिकारियों ने समझाया था, पर एक डर था ,जो उनकी आवाज़ों से चिपका था। वह सेक्शन ऑफिसर है, बाहर से आए अधिकारी के साथ शालीन व्यवहार उसके पद का तकाज़ा है ,सो वह क्या कहती! आज फिर येअधिकारी सामने थे। उन्होंने हाथ मिलाने के लिए गीता की ओर हाथ बढ़ाया कि गीता ने हाथ नमस्ते की मुद्रा में जोड़ दिए।
“क्या गीता जी, आज हाथ मिलाने से इंकार?” उन्होंने खिसियाए व्यंग्य के स्वर में कहा। आसपास के अन्य अधिकारियों की आँखें इस हँसी और वाक्य के पैरों में चापलूसी की हँसी में लोट गईं।
गीता ने मुस्कुराते कहा, “सर, आजकल हाथ मिलाने का नहीं, आँख मिलाने का…, (वह प्रतिक्रिया देखने को आधे से क्षण को रुकी) …और नमस्ते करने का ज़माना है”
“बुरा मान गईं, हम तो स्त्री-पुरुष सब से बराबरी का व्यवहार करते हैं और इतना छुआछूत रखने से कैसे चलेगा?” वे कैसे आँख मिलाने की बात को हज़म कर जाते,सो कर गए कटाक्ष!
“सर बिल्कुल सही कह रहे हैं आप ,पर नमस्ते करने से बराबरी कम नहीं होती और फिर आप यह भी तो नहीं चाहेंगे कि हाथ मिलाकर जिस-तिस की बीमारी के विषाणु आप तक पहुँचे” अधिकारी को प्रश्न मुद्रा में देखते हुए देख वह फिर बोली, “सर, ज़ुकाम-खाँसी का सीज़न है न,  आप बीमार पड़ जाएँ, यह तो मैं बिल्कुल नहीं चाहूँगी न।” वह मुस्कुरा रही थी, जैसे किसी ज़िद्दी बच्चे को बहला रही हो।
एक खिसियाया-सा, “सही कहा ,सही कहा” का स्वर, बिना हाथ मिलाए उसके पास से सरसराता आगे को बढ़ गया। ।वह भी मुस्कुराकर अपने कदम जमाती और हाथों में विभागीय रिपोर्ट्स की फाइलें सँभाले मीटिंग रूम की ओर चल पड़ी।
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