दिसम्बर -2018

दस्तावेज़रिश्ते     Posted: July 1, 2018

दस्तावेज

‘रिश्ते’ लघुकथा का पाठ जगदीश कश्यप द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-

रिश्ते

जगदीश कश्यप

जब वह कमरे में दाखिल हुई तो उसने दिन भर के आफिस के बोझ और परेशानियों     को चेहरे पर पानी को छीटें डालकर धोया और तौलिए से सुखा डाला इस तात्कालिक ताजगी वाली उमंग में उसने स्टोव सुलगाया और फ्राईपैन में चाय के अन्दाज वाला पानी डालकर कुछ गुनगुनाने लगी।

‘‘कैसी हो माँ?’’ उसने चुलबुले किन्तु मायूस अन्दाज में पूछा। माँ ऐसी बातों का जवाब नहीं दिया करती है, उसे मालूम था।

‘‘लो माँ चाय। राकेश दवाई दे गया था?’’

‘‘हाँ।’’ माँ बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई और अत्यन्त पीड़ा से करवट बदल नई-नवेली, उमंगों से भरपूर लड़की की तरफ देख, तनिक मुस्कराई सी।

‘‘अभी उठती हूँ,’’ कहते ही उसने माँ को धीरे से उठाकर कमर में कई तकिए लगा दिए।

वह सोचने लगी-उस बीमारी के बारे में जो माँ को दस साल से न जिंदा रखना चाहती है और न मरने देती है। सारा घर दवाई, इंजेक्शन और कैपसूल की खाली शीशियों से भरता रहा है।

‘‘राकेश पर्चा रख गया है-वहाँ तेरी अल्मारी में।’’ माँ धीरे से काफी देर में कह पाती है।

पर्चा पढ़ते ही उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। ‘‘आज कितने दिनों बाद राकेश रात में रुकेगा।’’

‘‘ये बातें तुम मेरे सामने कह सकते थे-पर्चे में लिखने की क्या जरूरत थी?’’ वह हल्के मूड में थी। ‘‘ठीक है, मैं कमाता नहीं हूँ। पर इतनी हैसियत तो है कि दवाई ला सकूँ। तुम्हारी तो सारी तनख्वाह ही दवाई में चली जाती है। पार्टी पालिटिक्स ने मुझे न घर का रखा है, न बाहर का। फिर भी तुमने इस आवारा को जिसे लोग शराबी,झक्की कहते हैं, माँ जी की सेवा करने का मौका दिया, ये क्या कम है?’’ ऐसे अन्दाज पर वह मुस्करा कर रह जाती है।

जीरो वाट का बल्ब जल रहा है। एक ख्याल उसे माँ की बीमारी से ज्यादा भयानक लगता है, जो उसे रोज रात को परेशान करता है। उसका गला सूखने लगा। पाास रखी सुराही को देखकर वह वितृष्णा लिए उठी और बराबर के पार्टीशन में गई। खटोले पर सोया राकेश, दाढ़ी भरा चेहरा। साने के बटन खुले हुए, उससे चार वर्ष छोटा। क्या लगता है उसका? सब कुछ तो लगता है-उसका। वही है अब उसकी जिन्दगी। उसके जी में आया कि वह झिंझोड़ कर कहे-

‘‘राकेश तुम मुझे अपना लो। मैं टूट रही हूँ। माँ ठीक नहीं होगी-माँ ठीक नहीं होगी…’’

‘‘क्या बात है दीदी?’’ राकेश हड़बड़ाकर जाग गया। उसने परेशान अरुणा के चेहरे को पसीने से तरबतर पाया।

‘‘कुछ नहीं रे, तू सो जा। माँ की दवाई का टाइम हो गया है न।’’ और वह पलट पड़ी।

विमर्श

1.डॉ. भगवानशरण भारद्वाज

ज्गदीश कश्यप माँ की बीमारी,आर्थिक तंगी,दफ्तर के तनाव-इन सबको मुस्कराकर झेलती युवती के अन्तर्मन में राकेश के रूप में सहारा खोजने की झटपटाहट और उलझन का जीवन्त अकन करते हैं।

2.डॉ. स्वर्ण किरण

जगदीश कश्यप की लघुकथा ‘रिश्ते’ को प्रथम दृष्टया आम पाठक ग्रहण नहीं कर सकता पर इसमें विचित्रता का तत्त्व है, सम्प्रेषणीयता है। बेकार युवक और प्रेमिका के रिश्ते पर यहाँ हम विचार करने को बाध्य होते है। पुत्र में माता के लिए दवा लाने के क्रम में ऊब के दर्शन आज का पुत्र बतलाता है। राकेश नई-नवेली लड़की को उमंग से देखता है। यह माँ की सहायता करती रहती है।

3.बलराम अग्रवाल

जगदीश कश्यप की ‘रिश्ते’ कुछ रिश्तों की अपरिभाषित स्थिति को प्रस्तुत करती है।

4.सतीशराज पुष्करणा

इस सत्र की अन्तिम लघुकथा ‘रिश्ते’ की चर्चा करना चाहूँगा। जगदीश कश्यप इसमें क्या कहना चाहते हैं, स्पष्ट नहीं होता। इस लघुकथा में यह कहीं भी नहीं बताया गया है कि नायक एवं नायिका का आपस में क्या संबंध है। नायक नायिका के घर में किस हैसियत से रहता है। यदि इस लघुकथा का शीर्षक ‘अनाम रिश्ते’ होता तो इसमें सम्प्रेषीणयता आ जाती ;किन्तु मात्र रिश्ते शीर्षक से संप्रेषण में पूर्ण रूप से अभाव आ गया है। इस लघुकथा में आदमी के किस मनोविज्ञान की ओर प्रकाश डाला गया है, पता नहीं चलता। इस प्रकार यह लघुकथा उद्देश्यहीन भी हो गई है। लघुकथा के अंत में नायक का नायिका को दीदी कहना पाठकों को एकाएक चौंका देता है। यह चौंक तत्त्व कहीं से स्वाभाविक नहीं लगता बल्कि पूर्ण रूप से आरोपित लगता है। यदि यह लघुकथा प्रयोग के रूप में है तो इसे एक असफल प्रयोग माना जाएगा। जगदीश कश्यप लघुकथा में जो अपेक्षाएँ अन्य लोगों से रखते हैं उसपर स्वयं भी पूरे नहीं उतरते।

5.अशोक भाटिया

जगदीश कश्यप की ‘रिश्ते’ लघुकथा जटिल संबंधों को व्यक्त करने की एक सफल कोशिश कही जा सकती है। एक जगह मोहन राकेश ने लिखा है कि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें कोई नाम नहीं दिया जा सकता। यहाँ राकेश और अरुणा का रिश्ता ऐसा ही है। राकेश उसे बहन के रूप में देखता है ; लेकिन वह घर के बिखराव और अपनी टूटन से बचने के लिए प्रेमी के रूप में देखती है। इस प्रकार के प्रयोग लघुकथा में होने ही चाहिए ; क्योंकि किसी भी रचनाकार की मौत तब नहीं होती वह लिखना बंद कर देता है ,बल्कि तब होती है, जब वह खतरे लेना छोड़ देता है।

6.रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

लघुकथा ‘रिश्ते’ में जगदीश कश्यप ने मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। हमारे साथ ऐसे बहुत सारे रिश्ते होते हैं ,जो अपरिभाषित होते है। हर एक रिश्ते को कोई नाम देना कठिन है। फिर भी संस्कारवश हम ऐसा कर जाते हैं।

7.रामयतन प्रसाद यादव

‘रिश्ते’ भाव, कथ्य, शैली एवं संप्रेषण की दृष्टि से एक सशक्त लघुकथा है। जीवन के सार्थक मूल्यों को स्थापित करने में ‘रिश्ते’ के लेखक जगदीश कश्यप को अपेक्षित सफलता मिली है। मँजे हुए लघुकथाकार होने का परिचय जगदीश कश्यप ने ‘रिश्ते’ के माध्यम से दिया है। यह लघुकथा मन की स्थिर भावनाओं को तरंगित करती है।

8.डॉ.शंकर पुणतांबेकर

‘जगदीश कश्यप की ‘‘रिश्ते’’……एक अनाम….स्त्री-पुरुष रिश्ते को बड़े ही नाजुक ढंग से प्रस्तुत करती है, जिसका सही रूप बहुत कम लोग पकड़ पाए और उन परिस्थितियों को Vis-à-vis इसे नहीं परखा गया जिनसे यह कथा बनती है। काफी चर्चा हो चुकी है….रिश्ते बड़े ही सधे हुए हाथों से बुनी हुई एक ‘मजबूर कथा’ है….मजबूर स्थितियों में से-दिलों में से उपजी हुई मजबूर कथा! यहाँ सांकेतिक ढंग से एक ‘‘अनाम रिश्ते’’ को पेश किया गया है। डा.स्वर्ण किरण ने जो कहा कि ‘स्पष्टता’’ लघुकथा की कसौटी है। डॉक्टर साहब की बात में मैं सहमत नहीं बल्कि सूचकता-सांकेतिकता लघुकथा का एक गुण है। सपाट बयानी कुछ स्थानों पर लघुकथा के लिए घातक बन जाती है-रिश्ते जैसी लघुकथाओं में तो अवश्य ही।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    सुकेश साहनी

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