दिसम्बर -2018

देशगौरैया का घर     Posted: August 1, 2018

सृष्टि अपर्टमेंट्स की 9वीं मंज़िल की बाल्कनी में खड़े नन्हे नीटू ने मानसी से पूछा- “माँ गौरैया कैसी होती है?”

मानसी ने बताया “गौरैया एक चिड़िया होती है।”

“माँ गौरैया कहाँ रहती है?”

“गौरैया पेड़ों पर रहती है और फुदक-फुदक कर चूँ- चूँ बोलती है।”

“पेड़ तो हमारे अपर्टमेंट्स में नही है माँ ,फिर गौरैया कहाँ रहती होगी ? कहाँ चूँ-चूँ बोलती होगी? नीटू ने परेशान हो कर पूछा।

“आँगन में चूँ-चूँ बोलती है गौरैया” मानसी ने बात टालते हुए कहा।

“आँगन क्या होता है माँ?” नीटू ने अगला प्रश्न बिना देरी किए दागा।

ऑफ़िस से थककर चूर हो लौटी मानसी में नीटू के प्रश्नों की रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने की की ताब नही थी।उसने अपने चारों ओर उगे कंक्रीट के जंगल पर एक चुभती निगाह डाली और नीटू को लेकर कमरे में आ गई।नीटू अब भी मचल रहा था -“माँ मुझे गौरैया देखनी ही है।”

“अभी दिखाती हूँ बेटे।” कहकर मानसी  ने तुरंत लैपटॉप आन किया।गूगल खोलते ही गौरैया सामने थी।फुदकती गौरैया देख नीटू ताली बजाने लगा।

अगले दिन क्लास में टीचर पढ़ा रही थीं।

“शेर के घर को माँद कहते हैं।”

“चूहे के घर को बिल कहते हैं।”

“मधुमक्खी के घर को छत्ता कहते हैं।”

“गौरैया के घर को …”-टीचर के वाक्य को बीच में ही काट कर नीटू चिल्लाया -“गौरैया के घर को गूगल कहते हैं।”

   -०-मीनू खरे,स्टेशन हेड, आकाशवाणी,बरेली

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine