दिसम्बर -2018

दस्तावेज़दण्ड     Posted: September 1, 2018

दस्तावे
‘दण्ड’ लघुकथा का पाठ जगवीर सिंह वर्मा द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-

दण्ड
जगवीर सिंह वर्मा
वह चौदह वर्षीया मंगला की लड़की त्रिभुवन के खेत से ज्वार की फली तोड़ लाई थी। त्रिभुवन के लड़के ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया था और तोड़ी गई फलियाँ छीन ली थीं। फिर जाकर मंगला से शिकायत की थी। मंगला ने लड़की की खूब डाँटा फटकारा, पीठ पर दो थप्पड़ भी रसीद कर दिए और कह दिया कि आगे ऐसी शिकायत न होगी। लड़की सिवाय रोने के और कुछ न कह सकी, न कर सकी। त्रिभुवन का लड़का जब मंगला के घर से बाहर निकलने लगा ,तो मंगला बोली-‘‘अब तो तुम्हारे सामने भौत दण्ड दे दिया है, अब ऐसो करो लाला के इन फरीन को (कलियों) यहीं छोड़ जाओ ,नही ंतो छोरी के जो पैं भौत जोर परंेगो।’’ त्रिभुवन का बी. ए. पास लड़का मंगला की बातों में आकर ओर उस लड़की के रोने पिटने, स्वयं के डाँटने फटकारने से द्रवित होकर उन फलियों को मंगला के ही घर छोड़कर बाहर निकल आया। बाहर निकलते ही जसमता मिल गया और वहीं उससे बातचीत करने लगा। सहसा त्रिभुवन के लड़के ने सुना, मंगला अपनी लड़की से कह रहा था-‘‘चुप है जा, पिट गई खौमख्वाह, काऊ के खेत में देख भार के घुसनों चाहिए। गो तो मैंने ही हल्के-हल्के मार दिये हैं दो तमाचे और जो खेत वारौ ई मार देती तो?…..बस, अब मत रोइयो।…..’’

विमर्श
1-सतीश राज पुष्करणा

जगवीर सिंह वर्मा अपनी लघुकथा ‘दण्ड’ में क्या कह गए,क्या पढ़ गए, मैं समझ ही नहीं सका।

2-डॉ0 स्वर्ण किरण
जगवीर सिंह की ‘दण्ड’ में आंचलिक शब्दों की भरमार के कारण कथ्य तो जैसे खो गया।

3-अशोक भाटिया
लेखन के समय भाषा पर पकड़ की बात पर कुछ कहना चाहूँगा। यहाँ दो-तीन बातें सामने आई है, जिनसे लगता है कि लेखक यह सोचता है कि मैंने यहाँ शुरू किया है, मुझे एक डेढ़ पेज में खत्म करना है, इसलिए धकेलो पाठकों को अंत की तरफ, धकेलो घटनाओं को, फटाफट समेट दो , ताकि यह लघुकथा बन जाए। यह बात लघुकथा को कृत्रिमता प्रदान करती है। उदाहरण दे रहा हूँ ; क्योंकि मैं हवा में बात नहीं करना चाहता। जगवीर सिंह वर्मा की लघुकथा ‘दण्ड’ इसका पहला वाक्य, अर्धवाक्य देखें……ध्यान से सुने…….चौदह वर्षीय मंगला की लड़की। शायद वर्मा साहब यह कहना चाहते हैं कि मंगला की लड़की चौदह वर्षीय लड़की। यहाँ भाषा की कमजोरी साबित होती है।
शंकर पुणतांबेकर
‘दण्ड’ लघुकथा अच्छी है ,पर मैं उसे ठीक से नहीं सुन पाया। मैं उसे अलग से सुनना चाहूँगा।
4-जगदीश कश्यप
‘दण्ड’ एक सीधी-सादी गाँव की रोजमरा की घटना है जो गाँव की प्रगति की ओर संकेत करती है, जहाँ शासक और शासित वाला दृष्टिकोण आज भी ज्वलंत रूप में मौजूद है और साथ ही ‘वह’ अत्याचार करने वाली भावना को जगाए रखकर प्राप्त लाभ को बचाए रखने का प्रयास करता है। अपनी लड़की पर दो-चार धौल के एवज में फलियों को प्राप्त करने की खुशी…एक स्वाभाविक चित्रण।

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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