दिसम्बर -2018

देशरक्षक     Posted: September 1, 2018

शिप्रा का रिजर्वेशन जिस बोगी में था उसमें लगभग सब लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने शिप्रा पूरी बोगी घूम आई थी, मुश्किल से दो  या तीन औरतें होंगी । मन  अनजाने भय से काँप  सा गया ।
पहली बार अकेली सफर कर रही थी इसलिए पहले से ही घबराई हुई थी ,अतः खुद को सहज रखने के लिए  चुपचाप अपनी सीट पर मैगज़ीन निकाल कर पढ़ने लगी ।
नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प  जा रहे थे, के हँसी – मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे ।
शिप्रा के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे – धीरे उतरने लगी ।
सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने कहा —
” हेलो  , मैं साकेत और आप ? “
भय से पीली पड़ चुकी शिप्रा ने कहा –”  जी मैं  ………”
“कोई बात नहीं नाम मत बताइए ।वैसे कहाँ जा रहीं हैं आप ?”
शिप्रा ने धीरे से कहा –“इलाहाबाद “
“क्या इलाहाबाद… ?
वो तो मेरा नानी -घर है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं  । ” खुश होते हुए साकेत ने कहा ।और फिर इलाहाबाद की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना  के उच्च अधिकारी हैं ,और ढेरों नई – पुरानी बातें ।
शिप्रा भी धीरे – धीरे सामान्य हो उसके बातों में रुचि लेती रही ।
रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।
सुबह शिप्रा ने कहा – ” लीजिए मेरा पता रख लीजिए कभी नानी घर आइए, तो जरूर मिलने आइएगा ।
” कौन सा नानीघर बहन ? वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ – मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो कभी इलाहाबाद आया ही नहीं ।”
“क्या….. ?” —  चौंक उठी शिप्रा ।
“बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम में ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।”
कहकर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुरा उठा साकेत ।

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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