दिसम्बर -2018

देशान्तरअलाव और चीटियाँ     Posted: December 1, 2018

मैंने एक गला हुआ लट्ठा, बगैर यह ध्यान किए कि इस पर जीवित चीटियाँ हैं, जलते अलाव में फेंक दिया।
लट्ठा चटचटाने लगे। चीटियाँ हड़बड़ाकर निराशा से चारों तरफ दौड़ पड़ीं। वे ऊपर की ओर दौड़ीं ,लेकिन लपटों से झुलस जाने के कारण छटपटाकर रह गईं। मैंने लट्ठे को पकड़ा और उसे एक तरफ कर दिया। तब उनमें से काफी चीटियों ने स्वयं को रेत पर या चीड़ की सुइयों पर आकर सुरक्षित कर लिया।
लेकिन, यह बेहद आश्चर्य की बात थी, वे आग के पास से भागी नहीं।
वे तब तक भयाक्रांत नहीं हुई, जब तक कि वे पलटीं, उन्होंने चक्कर काटे। कोई अबूझ ताकत उन्हें बार–बार अपने परित्यक्त देश की तरफ खींचती रही। उनमें से बहुत–सी ऐसी भी थीं, जो जलते लट्ठे पर चढ़ गईं, उस पर चारों तरफ तड़फड़ाई और उसी पर शहीद हो गईं।
-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine