दिसम्बर -2018

देशडर     Posted: December 1, 2018

          दिल्ली महानगर।
            भीड़ भरे इलाके के चौराहे पर जब तीन ओर से आ रही बसों से कुचले जाने का प्रयास असफल रहा तो वह बौखला उठा। उसने मौत को एक भद्दी-सी गाली दी।
            ‘‘हरामजादी! जिसे जरूरत है, उसके पास फटकती नहीं और जो उसके साये से दूर-दूर रहता है, उसे खट से दबोच लेती है।” 
            अगले रोज।
            अखबार में, शहर में चल रहे सर्कस का विज्ञापन पढकर उसे लगा कि अब वह मर सकेगा। विज्ञापन था: मौत के कुँए मेंमोटर-साइकिल चलाने के लिए ट्रेनीज़ की आवश्यकता है।
            अब वह एक सिद्धहस्त चालक माना जाने लगा है। कई कम्पनियों ने उसे पुरस्कृत किया है। वह अब मरना नहीं चाहता। मौत उसकी दहलीज पर डेरा डाले बैठी है।
            वह डरा-डरा सा रहने लगा है।
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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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