दिसम्बर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: December 1, 2018

1.स्मृति

एक बुजुर्ग ट्रेन में सफर कर रहे थे। उनकी अपर बर्थ थी। इस बात से वे थोड़े परेशान थे। उनके दोनों ठेहुनों में दर्द रहता था। उनको ऊपर के बर्थ पर चढ़ने-उतरने में तकलीफ होती थी। सामने एक जवान लड़का बैठा था। उसकी लोअर बर्थ थी। बुजुर्ग के मन में आया कि उस लड़के से लोअर बर्थ मांगी जाए। मगर वे चुप रहे। उनका अनुभव था कि निवेदन करने पर भी आज के बच्चे बूढ़ों को अपनी लोअर बर्थ नहीं देतेे।
रात के नौ बज गए। लगभग सभी यात्री रात का भोजन आदि निपटा चुके थे। अब वे सोने के मूड में आ रहे थे। इस बीच बुजुर्ग और उस जवान लड़के में कुछ बातचीत होने लगी। लड़के ने पूछा, ‘‘बाबा, आप कहां जा रहे हैं ?’’
बुजुर्ग ने कहा, ‘‘बेटा, मैं हरिद्वार जा रहा हूं।’’
‘‘अकेले ?’’ लड़के ने आश्चर्य से पूछा।
बुजुर्ग ने कहा, ‘‘हरिद्वार में मेरे मित्र पहले से पहुंच हुए हैं। वे मुझे लेने स्टेशन आएंगे। वैसे, बेटा तुम कहां जा रहे हो ? तुम्हारे परिवार में कौन-कौन हैं ?’’
लड़का उदास हो गया। उसने कहा, ‘‘बाबा, मैं आगरा जा रहा हंू। मेरे परिवार में सभी हैं। मगर दुर्भाग्य से पिछले साल मेरे पिता जी का निधन हो गया। उन्होंने भी हरिद्वार का कार्यक्रम बनाया था। हम दोनों साथ जाने वाले थे। संयोग से एक लोअर भी बर्थ मिली थी। मैं बड़ा निश्ंिचत था। मगर जाने के दो दिन पहले ही वे हमें छोड़कर चले गए।’’
सहानुभूति दिखलाते हुए बुजुर्ग ने कहा, ‘‘बेटा, सुनकर बहुत दुख हुआ। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।’’
दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर लड़का उठा और उसने अपनी लोअर बर्थ पर चादर बिछा दी। ऊपर के बर्थ पर रखे कंबल और तकिया उतारे और उन्हें भी बर्थ पर व्यवस्थित कर दिया। बुजुर्ग ने यह देखा तो लड़के से कहा, ‘‘बेटा, कृपाकर मुझे ऊपर की बर्थ पर चढ़ने में मेरी मदद कर दो। मैं भी सोने जाऊंगा।’’
लड़के ने कहा, ‘‘बाबा, यह लोअर बर्थ मैंने आपके लिए तैयार किया है। आप यहां सोएंगे। अपर बर्थ पर मैं सोऊंगा।’’
यह कहकर लड़का उदास होकर बाहर देखने लगा था। उसकी आखें गीली हो रही थी।
इधर उस लड़के से बेटे जैसा प्यार पाकर बुजुर्ग की भी आखें नम हो गई थीं।
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2.लोभ

मेरे घर में एक छोटा-सा कबाड़खाना था। उसमें कई तरह के बेकार सामान यूं ही अस्त-व्यस्त पड़े रहते थे। संडे का दिन था। मैंने सोचा, कुछ काम-धाम है नहीं, चलो कबाड़खाने को व्यवस्थित करते हैं। यह भी सोचा, जो सामान बिल्कुल ही किसी काम के नहीं होंगे, उन्हें फेंक देंगे या किसी को दे देंगे।
मैंने कबाड़खाने की सफाई शुरू कर दी। थोड़ी देर में सफाई पूरी हो गई। सफाई के क्रम में पीतल की एक बेहद पुरानी मूर्ति मिली। वह बुरी तरह मटमैली और काली हो गई थी। वह मुझे किसी काम की नहीं लगी। कामवाली उस समय घर पर थी। मैंने वह मूर्ति कामवाली को दे दी। हल्की प्रसन्नता के साथ उसने वह मूर्ति ले ली। उसने कहा, ‘‘आज इसे यहीं रखती हूं। कल आकर ले जाऊंगी।’’
अगले दिन वह खास तरह का एक पाउडर ले आई। घर का काम करने के बाद वह उस मूर्ति की सफाई में लग गई। वह उस पाउडर और पानी से मूर्ति को रगड़ने और धोने लगी। थोड़ी ही देर बाद मैंने देखा, उस मूर्ति का कायाकल्प हो गया है। वह मूर्ति पूरी तरह चमकने लगी है और बिल्कुल नई हो गई है। यह तो चमत्कार हो गया ! उसने वह मूर्ति डाइनिंग टेबुल पर रख दी। मुझे अफसोस होने लगा कि मैंने उसे यह मूर्ति क्यों दे दी।
मेरे मन में लोभ अंगड़ाइयां लेने लगा। मैं उस मूर्ति को वापस हासिल करने की तिकड़म भिड़ाने लगा। कुछ समझ में नहीं आया तो मैं वापस कबाड़खाने में गया। वहां एक दूसरी पुरानी टेढ़ी-सी मूर्ति मिल गई। उसपर कई जगह स्क्रैच भी लग गए थे। मैं वह मूर्ति बाहर ले आया। मैंने वह मूर्ति कामवाली के हाथ में रखी और कहा, ‘‘यह मूर्ति उससे बड़ी है। तू इसे ही ले जा। यह अच्छी रहेगी। और हां, वह वाली मूर्ति यहीं रहने दे।’’
कामवाली ने बड़े निर्विकार भाव से मुझको देखा और उसने वह मूर्ति ले ली। मैं निश्ंिचत हुआ। लेकिन मेरे मन को एक डर सताने लगा। कहीं कामवाली इस मूर्ति को भी नया न बना ले। फिर क्या करूंगा ? लिहाजा मैंने उससे कहा, ‘‘तू यह मूर्ति अपने घर ले जा। साफ-सफाई वहीं करना।’’
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3. मूल्यांकन

‘‘नो, नो! यह शर्ट 1500 रुपये की नहीं लगती है। इसपर इतने पैसे खर्च करना वर्थ ;ॅवतजीद्ध नहीं है।’’ दुकान में पत्नी की पसंद पर झल्लाते हुए पति ने कहा।
पत्नी इस निगोड़े वर्थ का मतलब समझ नहीं पाई। उसने पूछा, ‘‘तुम हमेशा ‘वर्थ-वर्थ’ क्या लगाए रहते हो ?’’
पति ने समझाया, ‘‘जो सामान जितने में ले रही हो, वह उतने का लगना भी तो चाहिए।’’
पत्नी चुप लगा गई। वे बिना सामान लिये घर आ गए।
शाम को मां-पापा का फोन आया। वे बटे-बहू को दशहरा पर घर आने के लिए कह रहे थे। बेटे ने दशहरे के दो दिन पहले का एयर टिकट देखा। टिकट बहुत सस्ता लगा। उसने दशहरा पर घर जाने का मन बना लिया। उसने पत्नी से कहा, ‘‘कल सन्डे है। आराम से बैठकर एयर-टिकट ले लूंगा। तुम घर जाने की तैयारी शुरू करो।’’
पत्नी बहुत प्रसन्न हुई। उसने पैकिंग का काम शुरू कर दिया। अगले दिन पति महोदय एयर टिकट लेने के लिए कंप्यूटर पर बैठे। मगर वे यह देखकर हैरान रह गए कि रात भर में ही एयर टिकट का मूल्य लगभग दो गुना हो गया है। उन्होंने पत्नी को बुलाया और कहा, ‘‘घर जाने का प्रोग्राम कैन्सिल करते हैं।’’
पत्नी ने पूछा, ‘‘क्यों ? क्या हुआ ?’’
पति ने कहा, ‘‘टिकट रातों-रात बहुत महंगा हो गया है।’’
पत्नी ने समझाया, ‘‘मां-बाप से मिलने के लिए पैसे नहीं देखते हैं।’’
मगर पति ने पूरी तरह मना करते हुए कहा, ‘‘न, न! घर जाने के लिए इतने पैसे खर्च करना वर्थ नहीं है।’’
पत्नी चिहुंकी। पूछा, ‘‘फिर वर्थ ! मतलब ?’’
‘‘टिकट पर जितने पैसे खर्च होंगे, उतना घर जाने का सुख भी तो मिलना चाहिए। घर जाने का सुख इतने पैसों जैसा नहीं है।’’ पति ने एक व्यापारी की तरह ‘वर्थ’ को स्पष्ट किया।
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4.चोरी

बहू ने दिन का खाना बनाया और किसी काम से कहीं बाहर चली गई। दिन में सभी खाना पर बैठे। घर की बेटी ने खाना परोसा। खाना बेहद स्वादिष्ट बना था। पिता को लगा, खाना बेटी ने बनाया है। वे बेटी की खुलकर तारीफ करने लगे। कहा, ‘‘बेटी, वाह ! तुमने तो कमाल कर दिया।’’
बेटी वहीं खड़ी थी। उसने सोचा, मुफ्त में तारीफ मिल रही है तो क्यों अकारण मुँह खोला जाए। लिहाजा वह चुप रही और तारीफ का मजा लेती रही है। तभी पिता को लगा कि एक सब्जी में तेल कुछ ज्यादा ही पड़ गया है। वे अनायास बोल पड़े, ‘‘बेटी, सब्जी में तेल कम डाला करो।’’
बेटी अपनी प्रशंसा से मंत्रमुग्ध थी। अचानक यह शिकायत सुनी तो उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा, ‘‘खाना भाभी ने बनाया। उन्हें ही कहना।’’
बेटी का अनकहा झूठ पकड़ा गया। पिता को बहुत दुख हुआ। वे बोले, ‘‘बेटी, एक दिन तुम भी ससुराल जाओगी। तुम उस घर की बेटी बनोगी। तुम भी वहां अच्छा करने पर अच्छा सुनना चाहोगी। तुम्हारी भाभी भी इस घर की बेटी है। प्रशंसा पर उसका भी हक है। उसकी प्रशंसा की चोरी मत करो।’’
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5.दृष्टि

फोन की घंटी बजी। मैंने उत्सुकतावश फोन उठाया। चाचा जी का फोन था। कह रहे थे, ‘‘अरे, सुनो। बेटुआ का बियाह तय हो गया। आज ही उसकी अँगूठी रस्म है। शाम को होटल चाणक्य में आ जइयो।’’
मैंने पत्नी को फौरन सूचित किया। वह भी आश्चर्यचकित रह गई। शाम होते ही हम सजधज कर तैयार हुए। हमें नई दुल्हन को देखने की बड़ी उत्सुकता हो रही थी। हम होटल पहुँचे। वहां खूब चहल-पहल थी। मैंने देखा, मेरा चचेरा भाई स्टेज पर पहले से बैठा हुआ है। उसके बगल का सोफा खाली था। लड़की अभी स्टेज पर आई नहीं थी। मेरा भाई खूब प्रसन्न दिख रहा था। इस बात से मैंने और पत्नी ने आकलन किया कि लड़की जरूर सुन्दर होगी। समय हुआ तो लड़की सज-सँवरकर आती हुई दिखी। हम उसे उचक-उचक का देखने की कोशिश करने लगे। जल्दी ही पहली झलक मिल गई। लड़की सांवली-सी लगी। कद भी कम मालूम दे रहा था। थोड़ी देर में वह सोफे पर आकर बैठ गई। अब उसे हम ठीक से देख पा रहे थे। अचानक पत्नी बोल पड़ी, ‘‘यह क्या ? लड़की तो बहुत साधारण है। जरा भी सुन्दर नहीं है। चाचा जी ने इसे कैसे पसंद किया ?’’
इधर मैंने देखा, लड़की के आ जाने और उसके मेरे भाई के बगल में बैठ जाने के बाद मेरा भाई और ज्यादा खुश और पुलकित होने लगा था। इधर मेरी पत्नी सर पर हाथ धरके बैठी हुई थी। वह बार-बार अलापे जा रही थी, ‘‘लड़की सुन्दर नहीं है, लड़की सुन्दर नहीं है।’’
मैं कुछ देर सोचता रहा। फिर पत्नी को उठाया और कहा, ‘‘जरा अपने देवर को देखो। वह कितना खुश और प्रसन्न है। उसके चेहरे पर खिल आई प्रसन्नता को एक आईने की तरह मानो और उस आईने से उस लड़की को देखो। तुम्हें लड़की सुन्दर नजर आएगी।’’
पत्नी ने मेरी बात मानी। वह मेरे भाई के चेहरे पर खिल आई प्रसन्नता को लगातार देखती रही। उसने देवर की प्रसन्नता के पीछे छुपी उस लड़की को गौर से देखने लगी। पत्नी की आँखें अब ठीक से खुलीं। उसे लड़की अच्छी समझ में आने लगी। फिर उसने कहा, ‘‘सुनो जी, जिन्दगी उसे बितानी है। वह लड़की को सुन्दर मानकर खुश है ,तो उसकी खुशी में हमारे लिए भी लड़की सुन्दर है। मेरा दुख दूर हुआ। तुमको भाई की सगाई मुबारक हो !’’
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6सब माया है

कुछ भी पूछने पर वह बूढ़ी मां बस एक बात कहती थी, ‘‘सब माया छे। सब माया छे। ’’
घर-परिवार और उसके तथाकथित प्रियजनों ने यही समझा कि इस माता जी की दिमागी हालत खराब हो गई है। काफी सोच विचार के बाद उन्हें अच्छे मनोचिकित्सक से दिखाने की सोची गई।
सभी शहर आए। एक मनोचिकित्सक के चैम्बर में आकर भी वह एक ही बात दुहराती जाती, ‘‘सब माया छे। सब माया छे।’’
काफी गहन परीक्षण के बाद उस मनोचिकित्सक ने कहा, ‘‘मामला बहुत गंभीर प्रतीत होता है। लम्बे समय तक दवाइयाँ चलेंगी। कई जाँच भी कराने होंगे। और हाँ, जाँच कहीं इधर-उधर से नहीं, बल्कि मैं जहां कहूँ वहीं से कराएँगे।’’
घरवाले राजी हो गए। दवा की दुकान से ढेर सारी दवाइयाँ ं ली गईं। उस बूढ़ी माता के शरीर में कोई वजन नहीं था और न ही शरीर में कोई ताकत बची थी। इतनी दवाइयों का बोझ वह कैसे सहेगी, इस बारे में उनके शुभचिन्तकों ने जरा भी नहीं सोचा।
एक से बढ़कर एक कठिन जांच भी कराए गए। बूढ़ी माता निर्विकार भाव से सभी जांच कराती चली गई। बस वह एक बात दुहराती गई, ‘‘सब माया छे। सब माया छे।’’
जांच घर में संयोग से बुढापे की अभिशप्त एक और बूढ़ी माता मिल गई। उसने इसे देखा। उसने उसके प्रियजनों से कहा, ‘‘बेटा, सचमुच सब माया है। डाक्टर, दवाइयां, जांच-सब व्यर्थ हैं। देखकर लगता है, तुम्हारी माता कई रात से चैन से सोई नहीं है। कई दिनों से प्रेम के दो स्वर नहीं सुने हैं। इलाज वगैरह छोड़ो। माँ के पास समय बिताना सीखो। प्यार से कुछ बातें करना शुरू करो। इसे चैन की नींद सोने दो। देखना, बिन दवाइयाँ ं ये ठीक हो जाएंगी।’’
प्रियजन कुछ पल के लिए मूक होकर सुनते रहे। फिर एक पुत्र ने कहा, ‘‘माँ, यही तो मुश्किल है। हम सभी अति व्यस्त रहते हैं। काम की अधिकता से घर में हमेशा तनाव बना रहता है। माँ को समय, शान्ति और चैन कहाँ से दें ? हम लाचार हैं। हमारे पास डाक्टरों से इलाज के अलावा कोई चारा नहीं है।’’
उधर वह माता जी लगातार बोले जा रही थी, ‘‘सब माया छे। सब माया छे।’’
मगर दुर्भाग्य यह था कि हाथ में दवाइयाँ लिये और जाँच की रसीद थामे, उन बेटों के कानों में यह सारगर्भित आवाज नहीं जा रही थी कि सब माया है।
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फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट, अल्पना मार्केट के पास,न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, पटना-800013 (बिहार)

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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