देशअचानक-रमेश कपूररमेश कपूर
Posted: September 1, 2018
….और अंततः जब अंदर से पंडित जी का उसके लिए बुलावा आया तो वह सकुचाते हुए अंदर पहुँचा। उसने हाथ जोड़ कर पंडितजी को नमस्कार किया और उनके इशारा करने पर उनके सामने रखे आसन पर चौकड़ी मारकर बैठ गया। पंडित जी ने अपनी पोथी खोल ली। उनके कहने पर सुरेंद्र ने अपना सारा विवरण उन्हें बता दिया।
पंडितजी ने एक कागज़ पर उसकी जन्मपत्री बना दी और फिर उसकी ओर देखते हुए कहा,‘‘ पूछिए, क्या जानना चाहते हैं आप?’’
सुरेंद्र ने अपने व्यापार में आने वाली परेशानियों और लगातार होने वाले नुकसान के बारे में कुछ प्रश्न पूछे जिनके बहुत ही संतोषजनक उत्तर पंडितजी ने दिए।
‘‘ पंडितजी, मैं एक प्रश्न और पूछना चाहता हूं।’’ सुरेंद्र ने कुछ झिझकते हुए से कहा।
‘‘ पूछिये, पूछिए‘‘ पंडितजी ने अपने चश्मे के भीतर से उसे देखते हुए कहा।
‘‘ पंडितजी, मेरा अपना घर कब बनेगा?‘‘
पंडितजी ने अपने सामने बनी उसकी जन्मपत्री को ज़रा ग़ौर से देखते हुए कहा,‘‘ देखिए, आपके ग्रहों की दशाओं को देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि अभी इसकी सम्भावना काफी कम है।‘‘
‘‘फिर भी पंडितजी। बनेगा क्या?’’
‘‘ जी हाँ, बनेगा जो ज़रूर लेकिन…।’’ आगे का वाक्य उन्होंने अधूरा छोड़ दिया।
‘‘ लेकिन क्या पंडितजी?’’ उसने थोड़े उत्सुकता भरे स्वर में पूछा।
‘‘ देखिए, इस प्रश्न का उत्तर आपके लिए थोड़ा कष्टदायक है, इसलिए इसे समय पर ही छोड़ना अच्छा होगा। हाँ, इतना अवश्य है कि उस दशा के आरम्भ होते ही आपके सभी कष्ट भी समाप्त हो जाएँगे।’’
‘‘ लेकिन पंडितजी, अब जब आपने इतना कह ही दिया है तो अब मैं हर हाल में यह जाना चाहूँगा। जितने कष्ट से मैं अभी गुज़र रहा हूँ इससे ज़्यादा कष्टदायक क्या होगा भला।’’
‘‘ देखिए, मैं साफ-साफ तो नहीं बता सकता। या कह लीजिए कि नहीं बताऊँगा; लेकिन आपका अपना घर आपकी माता-पिता की मृत्यु के उपरांत ही बन पाएगा।’’ पंडितजी ने किंचित झिझकते हुए कहा।
‘‘ जी, मैं वहीं जानना चाहता कि आखि़र यह कब….?’’ अचानक उसके मुँह से निकला तो पंडितजी ने चैंककर उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था कि जिसका वह सामना नहीं कर सका और उनकी दक्षिणा का लिफाफा उनके सामने रखकर वहाँ से उठ गया।
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