
इतिहास के एक प्रवक्ता कक्षा में पढ़ा रहे हैं-”खुदाई से प्राप्त जो अवशेष मिलते हैं, उससे हमें अपनी पुरातन सभ्यताओं का पता चलता है कि हम कितने सभ्य थे, हमारी संस्कृति कैसी थी…..’’
घंटी लगी। अध्यापक ने अपनी कक्षा छोड़ दी।
नदीम घर आया, मास्टर जी का लैक्चर उसके दिमाग में नाच रहा ‘सब सभ्यताओं का पता चलता खुदाई से कि हम कितने सभ्य थे। खुदाई से….बस खुदाई से।’
अब्बू घर रात को लौटे,सुकून से वह चाय पी रहे थे। वह अब्बू से बोला-‘‘अब्बू क्या खुदाई से ही सारी सभ्यताओं का पता चलता है? सरकार को खुदाई कराने से क्या मिलता है?’’
चटाक ऽऽऽ.. ‘‘तेरा सिर मिलता है। चल भाग यहाँ से। तसल्ली से चाय भी पीने नहीं देता।’’
‘‘ऊँ ऽऽऽ वो मास्टर जी पढ़ा रहे थे।’’
‘‘ मैंने क्या कहा, सुना नहीं तूने बेवकूफ!’’
बच्चे का रुदन सुनकर अम्मी आ गईं वहाँ। ‘‘अरे अरे! क्यों मारा बच्चे को।’’ बच्चा माँ से चिपककर और जोर से रोने लगा।
माँ बोली-‘‘अरे अरे! गुस्सा क्यों हो रहे हो, खामखाँ बच्चे पर।’’
‘‘बेवजह सिर खा रहा था।’’
“सुन रही थी क्या सिर खा रहा था। हुँह बच्चा है, आप से मुझ से नहीं पूछेगा तो किससे पूछेगा? यार की झाड़ भतारे पर..’’
‘‘तू तो जानती है कि बच्चे पर गुस्सा न था पर……’’
”हाँ जानती हूँ। अखबार मैं भी पढ़ती हूँ। खुदा की खुदाई पर भरोसा रखो बस।’’ आर्द्र कण्ठ से वह बोली।
सिप सिप…चाय पीने लगा वह, पत्नी के गले की आर्द्रता, अब पति के गले से नीचे, चाय के साथ उतरने लगी।
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