जून 2026

देशकुत्ता     Posted: August 1, 2015

हमेशा की तरह अत्यधिक मदिरापान की खुमारी से सोकर उठे पिता ने पुत्री से कहा, ‘‘अरी ओ! पेट जल रहा है, दो–एक रुपए तो निकाल, जरा चाय–पानी हो जाए।’’
एक बेनाम लेकिन गहरी ईर्ष्या से पुत्री ने पूछा, ‘‘मेरे पास कहाँ रुपैया….’’
पिता को गुस्सा आया। वह जोर–जोर चिल्लाया, ‘‘तेरे पास रुपया नहीं है तो फिर रात–भर कुत्ता क्यों भौंका?’’
-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine