सन् 1962

मैं स्कूल से आ कुछ देर पढ़ रोज़ शाम को बाबूजी के साथ खेत पर जाती हूँ। पृथ्वी सरसों के पीले फूलों का ताज पहन नई दुल्हन सी इतरा रही है।
1965
बाग से कच्चे आम खाते हुए हम सहेलियों की टोली नहर किनारे आ गई है। हम सब पानी से भरे कलसे सिर पर रख घर की तरफ चल दी हैं। कुछ सहेलियों ने गाय की रस्सी थाम रखी है। मेरी कॉपी-किताबें बस्ते में हैं। स्कूल के बाद सहेलियों संग घूमना कितना आनन्द देता है। घर पर आ बस्ता आले में रख मैं माँ से लिपट जाती हूँ।
माँ ने कटोरदान से रोटी निकाल चटनी के साथ हम भाई-बहनों को दे दी है लड़ते-झगड़ते हम रोटी खा रहे हैं। माँ के हाथों के अचार की खुशबू से पूरा घर गमक गया है।
1984
कितने सालों के बाद आज तुझे छुआ है मेरी डायरी। मेरी गोद में मेरा बेटा है। मैं ज्यादा न पढ़ सकी लेकिन अपने बेटे को शहर पढ़ने जरूर भेजूँगी। उसके पापा का भी यही सपना है।
फिर कुछ पन्ने छूटे पड़े थे।
2005
कब से इस दिन की प्रतीक्षा में थी। अब मेरा बेटा पढ़-लिखकर बाबू हो गया है। लेकिन अब उसका गाँव में दम घुटता है। यहाँ का गँवईपन उसे अच्छा नहीं लगता। मेरी सादा मिजाज बहू भी बेटे के सामने चुप-चुप रहती है।
2007
बेटा बहू को भी ले शहर चला गया है । उसका कहना है गाँव की जमीन पर खेत काट फैक्ट्री लगानी है। यह होगा वो तब ही वापस आयेगा। मैं और उसके पापा मायूसी से उसकी वापसी की राह तक रहे हैं।
2009
आखिर बेटे की जिद जीत गई। हमारी गाँव की जमीन पर फैक्ट्री लग गई है। और लोगों ने भी खेत काटकर बड़ी-बड़ी इमारते और फैक्ट्री बना ली हैं। बेटा बहुत खुश है। गाँव का विकास हो रहा है।
2011
गाँव की नदी-नहर का पानी फैक्टरी से निकलने वाले पानी के उसमें गिरने से पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। कच्ची सब्जी और फलों में भी पानी में घुला यह जहर घुल चुका है। यहाँ की हवा में भी अब कैमीकल्स की घुटन है।लोग कैंसर से मर रहे हैं।
2013
धुँए और कैमीकल्स का साम्राज्य लगातार बढ़ रहा है। गाँव की हवा जहरीली हो रही है।
2018
मैं घर के दलान पर बैठी हूँ। मेरा दम बुरी तरह घुट रहा है। मैं दमे की मरीज़ हूँ। साँस उखड़ रही है। जाने कब भगवान का बुलावा आ जाये। यह क्या बेटा -बहू और मेरा पोता भी खाँस रहे हैं। यह फैक्ट्री से निकलता काला धुँए का गुबार हमें निगल रहा है। पूरा गाँव बंद मर्तबान बन गया है। हम मछली के जैसे तड़प रहे हैं। एक-दूसरे को बचाना चाहते हैं पर असहाय हैं। अब शायद तुझे न छू पाऊँ प्यारी डायरी।
कुछ घंटे बाद
मेरी आँखें बंद हो रही हैं।लेकिन तुझे छूने का मोह नहीं छूट रहा मेरी डायरी..मैं बहू और बच्चों को गाँव से बाहर जाने को कह रही हूँ। बेटा असहाय हो मेरी ओर देख रहा है। हर तरफ काले धुँए का गुबार है।
मेरा पेन हाथ से गिरने को हो रहा है … .
विकास अकेला नहीं आया है। अपने साथ तबाही लाया है.. आगे के अक्षर छूट गए हैं।
-0-डॉ. उपमा शर्मा,बी -1/248,यमुना विहार,दिल्ली 110053
-0-