
शाम के समय पार्क से उठकर औरतें अपने-अपने ठिकानों पर चल पड़ी। नीता और शीतल पार्क के गेट से बाहर निकल रही थी कि सामने मादा कुकर पर नजर पड़ी। दोनों के मुँह से एक साथ निकला- “हे भगवान! फिर से पेट से है यह तो। अभी कुछ दिन पहले ही तो जने थे पूरे छह पिल्ले… कुछ मर-खप गए। एक -दो को कोई पालने के लिए ले गया। यही दुर्गति होनी थी इनकी। दुम हिलाते नर कुत्तों से हर वक्त घिरी रहती थी। बेचारी की जूण ही ऐसी है, क्या करे?
अभी आगे बढ़ी थी कि उनकी नजर बाई कमला की बाहर निकली आँखें, कमजोर व पीली पड़ी काया पर पड़ी। कमला का फिर पेट बढ़ा हुआ था।
“सुना है अब जो इसका पति है, वह चाहता है कि उसका खुद का भी बच्चा हो। तीन-तीन आदमियों के साथ रहकर भी एक भी पति नहीं। बेचारी के चार बच्चे पहले और दूसरे पति से हैं। दोनों ही उसे छोड़कर जा चुके हैं और इनके लालन-पालन के बोझ में रात दिन घरों में बर्तन, झाड़ू-पोंछा करके यह मरी जा रही है।”
“ एक तो कमजोर हालत ऊपर से फिर यह गर्भावस्था, देख लेना! इस बार इसकी जान पर बन आएगी। इन बेचारी कामवालियों की जून ही ऐसी है,” कहते हुए सीता अपने घर की और मुड़ गई। वह अपने अंतर्मन को टटोलने लगी। लड़के की चाह में उसके भी तो न चाहते हुए चार बच्चे हो गए। “नहीं…नहीं… मादा कुकर की नहीं, कमली की नहीं, स्त्री की जूण ही ऐसी है।” वह कह उठी।
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