जून 2026

दस्तावेज़हिन्दी लघुकथा: शिल्प एवं सम्प्रेषण-कला     Posted: June 1, 2024

हिंदी साहित्य में लघुकथा को विगत कुछ दशकों में एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में विकसित किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि वर्तमान समय में लघुकथा साहित्य में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों की सँख्या बहुत बढ़ी है। इसी कारण से आजकल लघुकथाओं की अनेक पुस्तकें बाज़ार में बाढ़-सी ला रही हैं। हिन्दी साहित्य की लघुकथा, कहानी अथवा कथा की अन्य विधाओं से भिन्न है। लघुकथा किसी विशेष क्षण अथवा घटना से सम्बन्धित जीवनानुभव अथवा विचार को समाहित किए रहती है। संरचनात्मक रूप से, एक लघुकथा में आरम्भ,  मध्य, और अंत सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते हैं। इसमें कहानी के आवश्यक तत्व भी रहते हैं। कथानक, चरित्र-चित्रण, संवाद, और उद्देश्य, एक कहानी के समान ही लघुकथा में भी देखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यह एक संदेश अथवा नैतिक शिक्षा को विचारोत्तेजक रूप से संप्रेषित करती है। लघुकथा प्राय: नित्यप्रति के जीवन के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी होती है। इसमें जीवन मूल्यों का निरूपण रहता है। कभी-कभी हास्य या व्यंग्य के तत्त्व भी विद्यमान रहते हैं ; लेकिन यह आमतौर पर उद्देश्यपूर्ण होता है, और पाठक के मन-मस्तिष्क पर इसका समग्र प्रभाव अत्यन्त गंभीर होता है। अपनी संक्षिप्तता और सूक्ष्मता में, लघुकथा जीवन की जटिलताओं का वर्णन करती है, जीवन के बारे में बहुत कुछ कहती है। सूक्ष्मता से तराशी हुई, लघुकथा  जीवन के अनुभवों से उपजी विडम्बनाओं और विसंगतियों को कलात्मक ढंग से कहती है। हर घटना, समाचार या गपशप लघुकथा का रूप नहीं ले सकती; जीवन के अनुभवों को एक लघुकथाकार अपने रचनात्मक कौशल से आसवित करने का प्रयास करता है। जहाँ तक लघुकथाओं की विषय-वस्तु का प्रश्न है, उसमें कोई प्रतिबंध या किसी भी प्रकार की सीमा नहीं है। हालाँकि, विषय का चयन कलात्मक अभिव्यक्ति के अनुरूप होता है, यह वास्तव में एक कठिन कार्य है। समकालीन लघुकथा में इसके आकार की सूक्ष्मता और इसका विचारोत्तेजक स्वरूप इसकी अपनी विशिष्ट पहचान हैं। संचार की  एक अद्वितीय कला के रूप में हिंदी लघुकथा एक  महत्त्वपूर्ण साहित्यिक विधा है। लघुकथा, कहानी कहने का एक लोकप्रिय रूप है, जो मनोरंजन, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के साधन के रूप में कार्य करती है। लघुकथा में अर्थ बताने, भावनाओं को जगाने और दर्शकों को संलग्न करने के लिए भाषा, प्रतीक, और कहानी कहने की तकनीकों का कुशल प्रयोग शामिल है। लघुकथा का ऐतिहासिक संदर्भ प्राचीन भारत में खोजा जा सकता है, जहां मौखिक कहानी कहने की परंपराएँ प्रचलित थीं। समय के साथ, इन कहानियों को लिखित रूप में दर्ज किया गया, जिससे हिंदी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा का उदय हुआ। हिंदी लघुकथा लोगों के समाज, संस्कृति और मूल्यों के प्रतिबिंब के रूप में कार्य करती है। लघुकथा अक्सर मानवीय सम्बन्ध, प्रेम, विश्वासघात, न्याय, नैतिकता, राजनीति, परिवार, और विभिन्न सामाजिक सरोकार जैसे विषयों पर केन्द्रित रहती है, जिससे पाठकों को मानव स्वभाव और जीवन की जटिलताओं के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। भावनात्मक जुड़ाव के अलावा, लघुकथा में सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों की गहरी समझ की भी आवश्यकता होती है। लघुकथाओं में सांस्कृतिक संदर्भों, मुहावरों और प्रतीकों का प्रयोग करके, लघुकथाकार अपने पाठकों के साथ साझा अनुभव और समझ की भावना को भी सशक्त बना सकते हैं। लघुकथा में प्रभावी सम्प्रेषण का एक अन्य आवश्यक तत्व संवेदी भाषा और ज्वलंत कल्पना का प्रयोग है। हिंदी लघुकथा के शिल्प को पौराणिक और सांस्कृतिक संदर्भों जैसे पारंपरिक तत्वों के समावेश से और निखारा जा सकता है। हिंदी लघुकथा की जड़ें प्राचीन भारतीय कहानी कहने की परंपराओं में हैं, जहां मौखिक कथाएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित की जाती थीं। इन लघुकथाओं का उपयोग अक्सर नैतिक शिक्षा देने, दर्शकों का मनोरंजन करने और सांस्कृतिक मूल्यों को साझा करने के लिए किया जाता था। समय के साथ, कहानी कहने की कला विकसित हुई और हिंदी लघुकथा संचार के एक विशिष्ट रूप के रूप में उभरी। आधुनिक युग में इस संचार तकनीक को साहित्य, फिल्म, टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे विभिन्न माध्यमों से नया जीवन मिला है। लघुकथाएँ लोगों की आशाओं, सपनों और संघर्षों को दर्शाते हुए समाज के लिए एक दर्पण का कार्य करती हैं। उनमें नए विचार को उत्तेजित करने, शक्तिशाली भावना एवं सहानुभूति जगाने और सामाजिक परिवर्तन लाने की शक्ति है। जैसे-जैसे हिंदी लघुकथा विकसित हो रही है और आधुनिक समय के अनुरूप ढल रही है, इसके शिल्प में भी नवाचार देखने की मिल रहे हैं। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और कहानी कहने के नए रूपों के उदय के साथ, लेखक पाठकों को नवीन तरीकों से संलग्न करने के लिए विभिन्न कथा संरचनाओं और बनावट के साथ प्रयोग कर सकते हैं। 

हिंदी लघुकथा रचनात्मक अभिव्यक्ति, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और बौद्धिक उत्तेजना के लिए एक मंच प्रदान करती है। इन लघुकथाओं के माध्यम से, लेखक जटिल विषयों का पता लगा सकते हैं, विविध पाठकों के साथ जुड़ सकते हैं, और मानवता- विरोधी सामाजिक मानदंडों को चुनौती दे सकते हैं, तथा संवाद के लिए जगह बना सकते हैं। लघुकथा में सामाजिक परिवर्तन और व्यक्तिगत परिवर्तन के लिए एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में कार्य करते हुए, प्रेरित करने, शिक्षित करने और मनोरंजन करने की अद्भुत् शक्ति है। लघुकथा में प्रभावी सम्प्रेषण की कला देखी जा सकती है, जिसके लिए भाषा, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक बारीकियों की गहरी समझ की आवश्यकता होती है। लघुकथा में न केवल शब्दों का चयन और वाक्यों की संरचना प्रभावी होती है, बल्कि पाठकों के मन में भावनाओं एवं विचारों को जगाने और ज्वलंत मानसिक छवियाँ बनाने की क्षमता भी प्रबल होती है।

  *प्रस्तुत लेख कुछ शक्तिशाली और तकनीकी रूप से सुदृढ़ लघुकथाओं को उनकी संरचना, बनावट और संप्रेषणीय कला के बारे में चर्चा में ले जाता है। उदाहरणों में इस शैली के स्थापित और नए दोनों लेखक शामिल हैं। चयनित लघुकथाओं का उनकी शिल्पगत विशेषताओं के लिए विश्लेषण किया गया है। इन लघुकथाओं में कुछ विशिष्ट संरचनात्मक तत्व हैं, जिनमें प्रमुख हैं ― कहानी का आरम्भ, पात्रों का परिचय, कथ्य एवं मुख्य विषय की प्रस्तुति, कथानक का विकास, और कहानी का चरमोत्कर्ष, निष्कर्ष और संदेश। प्रतिदिन हम समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों और संकलनों में लघुकथाओं की विविधता देखते हैं, जो विभिन्न रूपों और शैलियों में सामने आती हैं, और कहानी कहने की इस विधा में रुचि रखने वाले पाठकों की अपेक्षाओं को पूरा करती हैं। हालाँकि, नित्य प्रकाशित हो रही बहुत-सी लघुकथाओं में से कुछ ही रचनाएँ ऐसी हैं, जो इस विधा के मानकों पर खरी उतरती हैं। अधिकतर, ऐसी रचनाएँ होती हैं, जो पत्रकारिता के प्रारूप में कुछ घटनाओं का वर्णन-मात्र प्रस्तुत करती हैं, बिना यह जाने कि लघुकथा अनेक बारीकियों के साथ कथा कहने की एक अत्यधिक गूढ़ विधा है। इस विधा के लिए तकनीकी कौशल और अभ्यास की आवश्यकता होती है। है। यहाँ मुंशी प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई जैसे सिद्धहस्त कथासर्जकों सहित, विष्णु प्रभाकर, सुकेश साहनी और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जैसे निपुण लघुकथाकारों, तथा सुदर्शन रत्नाकर, मंजु मिश्रा, शैलजा सक्सेना और सुषमा गुप्ता जैसे इस विधा के नियमित लेखकों की लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ की गई हैं। इनके अलावा हाल के प्रतिभासम्पन्न लेखकों,  अर्चना राय, उपमा शर्मा, दिव्या शर्मा, शिवचरण सरोहा, खेमकरन सोमन और पूनम कतरियार द्वारा लिखी लघुकथाएँ भी चर्चा में ली गई हैं। इनकी लघुकथाएँ विशिष्ट साहित्यिक आस्वाद और रंग लिये हुए हैं, तथा इनमें पाठकों को अनायास बाँधे रखने की शक्ति है। इन चुनिंदा लघुकथाओं की उनकी संरचनात्मक बारीकियों और पाठकों तक विषयों और विचारों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने की शक्ति के लिए पड़ताल की गई है। प्रत्येक चयनित लघुकथा पर उनकी अद्वितीय शैलीगत, संरचनात्मक, भाषायी, नाटकीय और कलात्मक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए एक संक्षिप्त टिप्पणी अलग से दी गई है। बदलते रिश्तेमंजु मिश्रा की लघुकथा ‘बदलते रिश्ते’ शिल्प एवं संरचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। प्रथम वाक्य में ही प्रमुख पात्र संजीवनी से परिचय हो जाता है। यह लघुकथा के पहले ही वाक्य में मुख्य पात्र का प्रभावी दृश्यात्मक ढंग से परिचय कराती है: ‘‘संजीवनी तो बस एकटक छत को घूरते हुए सोचे जा रही थीं. . .’’  इसका प्रारम्भिक वाक्य ही उस मुख्य मुद्दे या समस्या से भी परिचय करवा देता है, जिससे मुख्य पात्र जूझ रहा है: “आज ही तो सही मायने मे वे जान पाई थीं कौन अपना है और कौन पराया।”  यह लघुकथा समाज में बदलते जीवन-मूल्यों का प्रभावी ढंग से चित्रण करती है और पारिवारिक व्यवस्था के साथ-साथ समाज में बहुत तेज़ी से बदलती नैतिकता और आचार-व्यवहार के मानकों को दर्शाती है। विशेष रूप से, यह कहानी बदलते रिश्तों के द्वन्द्वों और दुविधाओं को रेखांकित करती है: बेटी बनाम बेटा, माता-पिता बनाम सास-ससुर, और इसके अलावा एक परिवार में विभिन्न सदस्यों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच का विवाद, इस कहानी के कथ्य में सम्मिलित हैं। 

ब्याही हुई बेटी अपने माता-पिता के घर आकर सम्पत्ति के बँटवारे सम्बन्धी बखेड़ा खड़ा कर देती है, जिससे माता-पिता चिन्ताग्रस्त हैं: “बिट्टी, उनकी तबियत खराब है सुनकर उनको देखने के लिए अपने ससुराल से आई हुई थी। यूँ ही बातों- बातों में उसने कहा- “अम्मा तुम तो मेरा और भैया का हिस्सा- बाँट अपने हाथों ही कर दो, क्या फ़ायदा कि तुम्हारे बाद हम भाई- बहन के बीच लड़ाई झगड़ा हो. . .” माँ संपत्ति के बंटवारे के इस मुद्दे को हँसी में टालने का प्रयास करती है ; लेकिन बेटी इस बात पर आक्रामक रवैया अपनाती है, और अपने पक्ष में नए कानूनों का हवाला देती है: “ऐ अम्मा तुम क्या समझती हो, तुम सब भैया को सौंप दोगी और मैं चुप बैठी रहूँगी, तुम इस गलत फहमी मे ना रहना। आजकल बेटा बेटी दोनों का बराबर का हिस्सा होता है, तुमने न दिया, तो मैं कोर्ट कचहरी तक जाऊँगी, मगर ऐसे ही अपना हिस्सा थोड़े छोड़ दूँगी।”

 लघुकथाकार एक गंभीर पारिवारिक समस्या को नाटकीय एवं कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। दहेज एक पुरानी समस्या है ; लेकिन माता-पिता इसे बेटी के धन के रूप में देते रहे हैं। हालाँकि, माता-पिता स्थायी संपत्ति अपने बेटे के लिए रखते हैं। बेटी का मुखर होना परंपरा से बंधे माता-पिता की नैतिक दुविधा और अनिर्णय को जन्म देता है। बेटी पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों के साथ-साथ पारिवारिक प्रेम और सद्भाव के प्रति पूर्ण उदासीनता दिखाती है।  लघुकथाकार द्वारा पात्रों की भावनात्मक उथल-पुथल और मानसिक तनाव को कम से कम शब्दों में दर्शाने में भाषा और अभिव्यक्ति की ताकत को महसूस किया जा सकता है। लघुकथा के विषय को दृश्य रूप से दिखाकर संप्रेषित किया गया है; केवल बताने या स्पष्ट विवरण देने से नहीं:  सब थोड़ी देर तो सन्न से बैठे रहे उसके बाद ममता ने खाना लगाया ; लेकिन सब बिना खाए-पिए ही अपने अपने कमरों में चले गए । वह अपने बिस्तर पर मानो सकते की मारी-सी बैठी थीं और सोच रही थी कि यह सब क्या हो गया, आखिर कहाँ गलती हो गई उनसे. . .”

 लघुकथा का चरमोत्कर्ष और निष्कर्ष/समाधान बहू की सांत्वना, सम्मान, देखभाल और सास-ससुर के प्रति समर्पण के माध्यम से दिया गया है: “इतने में उनकी बहू ममता उनके कमरे में आई और उनका हाथ पकड़कर सहलाते हुए बोली ― अरे अम्मा जी आप काहे को चिन्ता करती हैं, तबियत और खराब हो जाएगी आपकी। मान लीजिए न जीजी की बात, वह जो कह रही हैं। आप तो बस जल्दी से ठीक हो जाएँ और बबली और चिंटू के साथ खेलें , हमारे सर पे आपका साया रहे, हमें इससे जादा क्या चाहिए। आपका आशीर्वाद बना रहे हमें कौन- सी कमी है।”  सास-ससुर को अपनी बेटियों और बहुओं के बारे में गलत और पूर्वकल्पित धारणा का एहसास होता है: “ममता के जाते ही वे फूट-फूटकर रो पड़ीं, यही सोच सोचकर उनकी आँखों से जारोजार आँसू बह रहे थे कि जिसे पराई समझकर हमेशा मन से दूर रखा, उसने तो हमेशा हमें गले ही लगाया, सुबह शाम अम्मा जी- अम्मा जी करती देखभाल करती रही।” सास कह उठती है:  हम ही मूरख थीं जो, सच्चे स्नेह को दिखावा मानकर खुद को ठगाती रहीं। आज वह जान गई थी कि बेटियाँ पराई ही होती हैं, अपनी तो बहुएँ होती हैं, जो नए आँगन में, नई मिट्टी में रोप दी जाती हैं, उसके बाद भी फलती फूलती हैं, ढलती उम्र में हमारा सहारा बनती हैं।”  यह कहानी बेटी के माता-पिता को एक ठोस संदेश देती है कि बेटियों और बहुओं के बीच कैसे व्यवहार करें और संतुलन बनाए रखें: सुबह उठीं, बहू को आवाज़ दी, उसके आने पर बोलीं … ‘‘सुन तो ममता, रज्जू से कहना बिट्टी की वापसी की टिकट करा दे, जाए। अपना घर बार देखे बहुत दिन हो गए कब तक मायके में पड़ी रहेगी, पराई गृहस्थी में टाँग अड़ाती रहेगी।  इस लघुकथा के संवाद, भाषायी सहजता और नाटकीय शैली कथ्य का सम्प्रेषण सशक्त रूप से करती है।

 कागज़ की कश्ती

शैलजा सक्सेना की लघुकथा “कागज़ की कश्ती” में भी प्रारम्भिक पंक्ति में मुख्य पात्र और समस्या का विवरण दर्शाया गया है: “माँ गाँव के खुले आँगन से बेटे के शहर के बंद फ्लैट में आईं थीं।”  यह लघुकथा ग्रामीण जीवन बनाम शहरी जीवन से संबंधित मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती है: गांव के रीति-रिवाजों, मूल्यों, परंपराओं और पर्यावरण पर खतरों का चित्रण करती है। इसके अलावा यह कहानी शहरों में शहरीकरण और जीवन के बहुसांस्कृतिक तरीकों के निरंतर हमले के तहत कई चीजों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है: “माँ गाँव में ही रहना चाहती थीं, अपने रहने से वो पुराने रिश्तों को बचा लेना चाहती है, हल्दी-अक्षत वाले त्योहार बचा लेना चाहती हैं, अपने पेड़-पौधों के बीच रहना चाहती थीं, बेटा माँ को बार-बार देखने जाने में समय बचाना चाहता है, पैसा बचाना चाहता है, अपने और अपने बच्चों के बीच रखना चाहता है।”  लेखक मूल्यों के टकराव और मतभेद पर प्रकाश डालती है। वह दो पीढ़ियों के बीच के अंतराल को भरने का प्रयास करती है: “दोनों की अलग-अलग सोच और अलग-अलग फिक्र!”

 लघुकथा दो पीढ़ियों के आपसी संघर्ष का विचारोत्तेजक विवरण प्रस्तुत करती है: “माँ बच्चों को पुरानी कहानियाँ सुनाती हैं, रात उनके सिर पर तेल मल देती हैं और बहू के दफ्तर चले जाने पर उनके मन के पसंद की चीज़ें खिलाती, और कभी ताश तो कभी गिट्टे खेलना सिखाती। बहू को लगता कि माँ बच्चों को बिगाड़ रही हैं। वह मुँह बनाती और बच्चों को रोकती, बच्चे न सुनते तो पति को कहती। उसे लगता ऐसे बच्चों का मन पढ़ने से हट जाएगा, ऐसे में उनका भविष्य क्या होगा? वह गंभीर चिन्ता में पड़कर घबरा उठती।”  यह कहानी शहर और गाँव की चीज़ों और घटनाओं के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण और धारणाएँ प्रस्तुत करती है: “पिछले तीन दिनों से बारिश हो रही थी। इतना पानी गाँव में पड़ता तो ज़मीन पानी पीकर लहलहा उठती, पर यहाँ शहर में कंक्रीट पानी पीती नहीं, केवल जमा करती है और सड़कों पर जाम लगवा देती है।” यह कहानी शहर की तनावपूर्ण जीवनशैली और गाँव के शांत जीवन के बीच के अंतर को सशक्त ढंग से उजागर करती है: “पूरा शहर बारिश के मारे परेशान था। बेटा-बहू झींकते हुए जाते और झींकते हुए आते। माँ को गाँव के झूले और सावन के गीत याद आ रहे थे।”

 शहरों का गंदा वातावरण और प्रदूषित हवा और पानी लोगों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति चिंतित रखते हैं। वे बीमारों की देखभाल के लिए छुट्टी पर घर बैठने का खर्च वहन नहीं कर सकते। शहरों में ऐसी सभी समस्याएँ शहरवासियों को परेशान करती हैं: “पत्नी को चिन्ता थी कि पानी जमा होने से जो मच्छर-कीड़े पैदा हो गए हैं, उनके काटे से छोटे बच्चे बीमार न पड़ जाएँ। फिर छुट्टी लेकर घर बैठना पड़ेगा, क्या मुसीबत है।” गाँव का जीवन तनाव और चिंताओं से मुक्त है। किसी टाइम-टेबल का कोई दबाव नहीं है, बल्कि गाँव के लोग उन्मुक्त नैसर्गिक परिवेश में खुली हवा, स्वस्थ शरीर और शांत मन का आनंद लेते हैं: “माँ बच्चों के साथ उसमें कागज़ की नाव तैरा रहीं थीं, बच्चे नाव के हिलते-डुलते आगे बढ़ने को मुग्ध होकर देख रहे थे।”

 पति के गाँव में बिताए शुरुआती दिनों की यादें, अपनी माँ के साथ बिताए दिन उसे एक साथ आह्लादित एवं निश्चिन्त बना देते हैं। पेपरबोट्स को इस ग्रह पर उपलब्ध मानव जीवन के संक्षिप्त कार्यकाल का आनंद लेने के लिए पानी के एक बड़े पथ में क्षणिक, अल्पकालिक जीवन के लिए एक शक्तिशाली रूपक के रूप में दिखाया गया है: “पति मुग्ध भाव से तीनों को देख रहा था, कितने मगन, कितने निश्चिन्त, कितने खुश! बूँदा-बाँदी की फिक्र से परे, घड़ी के समय की सोच के बाहर! उसे अपना बचपन याद आया जब माँ उसके साथ कागज़ की नाव बनाकर तैराती थीं। माँ वहीं थीं, बच्चे बदल गए थे।” लघुकथा का रूपक वाला शीर्षक काफी गहरे अर्थों से भरा है। पानी पर तैरने वाली कागज़ की नावें किसी समय-सीमा से बँधी नहीं होतीं।  मानस में रचे-बसे शहरी मूल्यों के कारण बहू अपनी सास के साथ खुलकर बात करने और दूसरों के साथ अपने आंतरिक आनंद की भावना को व्यक्त करने में झिझकती रहती है: “बहू स्तब्ध सी खड़ी थी, उसके शहरी संस्कार शायद पाँव रोक रहे थे।” पुरानी यादें आनंदमयी अनुभूतियाँ प्रदान करती हैं। बचपन के अनुभव जीवंत हो उठते हैं। कहानी का संदेश उल्लेखनीय है: हमें इस अस्थायी दुनिया में इस क्षणभंगुर और अस्थायी जीवन की सरल खुशियों का आनंद लेना चाहिए।

 कुत्ते वाले घर

अपनी लघुकथा “कुत्ते वाले घर” में सुकेश साहनी एक आलीशान हवेली का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो मानवीय सरोकारों से रहित समृद्धि का प्रतीक है। आरंभिक वाक्य समस्या को चित्रित करता है: “आलीशान कोठी के गेट को खोलने के लिए उसने हाथ बढ़ाया ही था कि. . .”  लघुकथा बहुत अमीर और संपन्न लोगों पर केंद्रित है जो ज्यादातर दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं और गरीबों और जरूरतमंदों की चिंताओं के प्रति उदासीन रहते हैं: “दरवाजा खुला-कोठी के मालिक सामने खड़े थे। उसने अखबार का बिल उनकी ओर बढ़ा दिया। क्या अखबार बेचने का काम सब चोर-उचक्कों ने सम्हाल लिया है?” एकाएक उन्होंने बिल को घूरते हुए उससे कहा।”

 लघुकथा के दक्ष शिल्पकार सुकेश साहनी ने गरीबों के प्रति अमीर लोगों के रवैये की समस्या को प्रभावी ढंग से उकेरा है। उन्होंने दर्शाया है कि कैसे अमीर लोग धन के नशे में भौतिकवादी हो जाते हैं, दूसरों के प्रति पूरी तरह से उदासीन हो जाते हैं और उनमें दूसरों के प्रति सहानुभूति की कमी हो जाती है: “उन्होंने आँखें निकालकर कहा- पच्चीस दिन भी अखबार नहीं पढ़ा और बिल दो महीने का! यहाँ हराम के पैसे समझे हैं क्या?”  अमीर दूसरों की परवाह नहीं करता, जबकि गरीब अपने प्रत्येक दिन के श्रम को याद रखता है और अपने पसीने की हर बूंद का हिसाब रखता है: नहीं साहब, आपको गलतफहमी हो रही है। मुझे आपके यहाँ अखबार डालते हुए पूरे दो महीने हो गए… आप मेरी डायरी देख लीजिए।

 गरीब भीख नहीं, मेहनत की कमाई माँगता है। दूसरी ओर, गरीबों के अधिकारों का अमीरों द्वारा अतिक्रमण या दमन किया जाता है: साहब, जबान सम्हालकर बात कीजिए… अपनी मेहनत के पैसे माँग रहा हूँ-कोई खैरात नहीं।”  अमीर लोग गरीबों पर झूठे आरोप और दोषारोपण भी कर सकते हैं: “यही हरामी बरामदे से पंखा चुराकर ले गया है…लेकिन गरीब लोग बदनामी से डरते हैं और इसलिए अमीर लोगों के साथ किसी भी तरह के संघर्ष से बचते हैं और इस तरह अपने क्रोध, अपमान और बदले की भावनाओं को दबा देते हैं: “वह डर गया। गुस्से के बावजूद उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह तेजी से कोठी के बाहर आ गया। गुस्से से उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं।” हालाँकि, झुका हुआ गरीब आदमी अमीरों की तुलना उन कुत्तों से करता है जो गरीबों पर बेवजह भौंकते रहते हैं: “सामने की दूसरी कोठी के गेट पर कुत्ते से सावधानकी तख्ती लगी हुई थी। उसकी इच्छा हुई कि वहाँ से तख्ती को उखाड़कर इस कुत्ते की कोठी पर लगा दे।” साहनी की लघुकथा गरीबों के गुस्से और पीड़ा को कुशलता से व्यक्त करती है। बोलचाल की भाषा का प्रयोग, यहाँ तक कि अपशब्द का प्रयोग भी, मानव जगत के विचारोत्तेजक पहलू को प्रकाश में लाता है।

 अश्लील पुस्तकें

प्रख्यात व्यंग्यकार और लघु कथाकार हरिशंकर परसाई अपनी लघुकथा “अश्लील पुस्तकें” में तथाकथित आधुनिक भारतीय समाज में नकली आदर्शवाद या नैतिकता और पाखंड के साथ-साथ मूल्यों के संकट की समस्या उठाते हैं। शुरुआती दृश्य में ही उन्होंने कहानी का केंद्रीय संकट दिखा दिया है: “शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है।”   वे बताते हैं कि समाचार पत्र वह स्रोत हैं जहाँ से समस्या उत्पन्न होती है और समाज को जकड़ लेती है: “अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रही हैं।”  परसाई युवा दिमागों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर समाज पर मीडिया के प्रभाव को रेखांकित करते हैं: “दस-बारह उत्साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा, हम ऐसे साहित्य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।”

 युवा गंदी किताबें जब्त कर लेते हैं; लेकिन संकोच एवं झिझक के कारण, क्योंकि वे अपने बड़ों और परिवार के अन्य लोगों से डरते हैं, वे किताबें आपस में बाँट लेते हैं और अगले दिन उन्हें अपने साथ लाने का फैसला करते हैं: पुस्तकें मैं इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे, तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।”  हालाँकि, जो हुआ वह उनकी अपेक्षा के विपरीत था: “दूसरे दिन शाम को सब मिले, पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा ―किताबें दो, तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे। किताब कोई लाया नहीं था।”  परसाई एक कठिन सामाजिक वास्तविकता को सामने लाते हैं कि लोग स्वार्थ से बँधे हुए हैं, और उनकी बुराइयाँ उनके मानस में गहराई तक समाई हुई हैं:

 एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन दिन बाद जला देना ! अब तो

किताबें जब्त ही कर लीं।”

 यहाँ तक ​​कि बुजुर्ग तथा परिवार के विभिन्न आयुवर्ग के अन्य सदस्य भी वासना या स्वार्थ से अछूते नहीं हैं:

 तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा―अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दूसरे ने कहा― अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।

तीसरे ने कहा― भाभी उठाकर ले गई। बोली कि दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।

चौथे ने कहा― अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिरी में उठा ले गईं। पढ़ लें, तो दो-तीन दिन में जला देंगे।”

 परसाई की लघुकथा अपरिवर्तनीय मानव स्वभाव में एक मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, और कठोर सामाजिक वास्तविकता का एक व्यंग्यपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती है जिसमें बताया गया है कि कैसे आदर्शवाद आंतरिक राक्षसों के सामने आत्मसमर्पण करता है: “अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।”  वास्तव में, परसाई इस तथ्य को उजागर करते हैं कि बड़े पैमाने पर समाज स्थिर है, इसमें कोई गतिशीलता नहीं है। लोगों को कुछ आंतरिक इच्छाओं और प्रलोभनों ने जकड़ लिया है; विशेष रूप से कहें तो, कामुकता या शारीरिक सुख में नैतिकता या शुद्धता केवल अवसर की कमी के रूप में होती है, और वासना कभी नहीं मरती। लघुकथा दर्शाती है कि कैसे सामाजिक सक्रियता या सुधार के प्रति उत्साह आंतरिक वासना और सुखवादी एवं स्वार्थपरक दृष्टिकोण द्वारा छीन लिया जाता है। लघुकथा स्पष्ट करती है कि युवा आदर्शवाद और उत्साह सब अस्थायी अथवा आडम्बरपूर्ण हैं, जो अंतर्निहित स्वार्थ या अहं के अधीन हैं।

 भविष्य

उपमा शर्मा की लघुकथा ‘भविष्य  ”एक रोजमर्रा की समस्या को उठाती है कि कैसे लोग अपनी अच्छी-अच्छी छवि पेश करने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं।  जैसा कि हम लघुकथा- लेखन की तकनीक में देखते हैं, प्रारंभिक वाक्य पूरी कहानी की कुंजी प्रदान करता है। यह लघुकथा आरंभिक वाक्य में ही मुख्य मुद्दा उठाती है: कालेज काउंसिल के स्टैंडर्ड पर खरा नहीं उतरा, तो मान्यता रद्द हो जाएगी। हम सबका भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।विभाग प्रमुख से कालेज के डीन ने कहा।”  यह दयनीय और विचारणीय है कि अच्छी छवि दिखाने के लिए नकली रिकॉर्ड बनाए जाते हैं। चूँकि अधिकारी उच्चअधिकारियों को मूर्ख बनाते हैं, इसलिए सभी निरीक्षण निरर्थक हो जाते हैं। यह कहानी विशेष रूप से अस्पतालों और सामान्य रूप से कई अन्य संस्थानों की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान उठाती है:

 रोजाना पाँच-सात फर्जी मरीज दाखिल हुए दिखा देते हैं। इसी तरह कागजों में बैड भर देते हैं। काउंसिल को सत्तर परसेंट बैड-आकुपेंसी ही तो चाहिए।

इंस्पैक्शन के वक्त क्या करेंगे?”

तब मज़दूरों, भिखारियों, रिक्शावालों को दिहाड़ी पर लाकर लिटा देंगे।प्रोफैसर ने मुस्कराते हुए कहा।

 यह लघुकथा कुछ हद तक व्यंग्यात्मक ढंग से निराशाजनक वास्तविकता को व्यक्त करती है। समाज और राष्ट्र के प्रति घोर गैर-जिम्मेदारी और गैर-चिंता को दर्शाते हुए संवादों का प्रयोग करके तथ्यों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित किया गया है।

  रंग बदरंग

अन्य लघुकथाओं की तुलना में, शिवचरण सरोहा की लघुकथा ‘रंग बदरंग’ बहुत छोटी और सांकेतिक है, जो एक अबोध बालिका के व्यक्तिगत अनुभव की कटु वास्तविकता से संबंधित है। यह कहानी शुरुआत में ही एक विषयगत वाक्य भी लेकर आती है, जो मुख्य पात्र प्रिया को परेशान करने वाली समस्या की ओर संकेत करता है:

 ये क्या है प्रिया?…यह तू क्या बनाने लगी है? काला आकाश, बिना पत्तों वाला भूरा पेड़, मटमैली धरती… कहाँ गए तेरे गुलाबी फूल और सतरंगी तितलियाँ?…ये क्या करने लगी है आजकल? पहले की तरह लाल, पीले, हरे, नीले, चटक रंग क्यों नहीं लगाती अपनी पैंटिंग्स में?”

 बच्ची एक कड़वी सच्चाई से जूझ रही है और गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजर रही है, जिसे वह अपनी माँ को भी स्पष्ट रूप से नहीं बताती है:

 बेटा, चटक ख़ूब चटक रंग भर इसमें… तभी तो तेरी पेंटिंग खिलेगी। जा, अपने अंकल को भी दिखा दे।”

अंकल! नहीं- नहीं…वह सकपका उठी।

 लड़की के चाचा का एक ही संदर्भ है, जिसे माँ चाहती है कि वह उसे अपनी पेंटिंग दिखाए ; लेकिन लड़की की अपने चाचा के पास जाने की अनिच्छा से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इस रिश्ते में कुछ अजीब और अवांछित है। लेखक के अनकहे शब्द लड़की के अपने चाचा के साथ कड़वे अनुभव और उस रिश्ते के बारे में घृणित भावना के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।

 इस लघुकथा में एक महत्त्वपूर्ण संदेश है कि माता-पिता को अपने बच्चों की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए और कभी भी उनकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। बच्चों की चुप्पी या असामान्य व्यवहार गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। प्रस्तुत लघुकथा में बच्ची का डर अनाचारपूर्ण रिश्ते का संकेत देता है, जिस पर उसकी माँ को पूरा ध्यान देना था। उसे अपनी बेटी के सामान्य व्यवहार में आए बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए : “मम्मी पलटकर किचन में चली गई और बदरंग पेंटिंग हाथ में लिए गुमसुम उदास खड़ी रह गई प्रिया।”  ‘कथादेश’ द्वारा आयोजित लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में पुरस्कृत यह लघुकथा सांकेतिकता एवं शाब्दिक मितव्ययिता के साथ एक ज्वलन्त मुद्दे से सम्बन्धित विचार का सम्प्रेषण प्रभावी रूप से करती है।

 कुछ नहीं खरीदा

सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथा ‘कुछ नहीं खरीदा’ भी अत्यंत संक्षिप्त है, जो एक दृश्यक्रम पर क्षणिक अवलोकन एवं टिप्पणी के रूप में है। इस लघुकथा का सार यह है कि लोग दूसरों को सलाह देने में तो अच्छे होते हैं ; लेकिन शायद ही कभी उसे अपने जीवन में लागू करते हैं यानी पर उपदेश कुशल बहुतेरे। साथ ही, कहानी इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि बच्चे अत्यधिक उत्सुक एवं सूक्ष्म पर्यवेक्षक होते हैं, जो अपने बड़ों के नक्शेकदम पर चलते हैं, और कभी भी उनके गलत कदमों को नजरअंदाज नहीं करते हैं।

 कहानी की शुरुआत एक महिला से होती है जो अपने बेटे के साथ समुद्र तट पर अन्य लोगों को देख रही है। वह एक स्थानीय विक्रेता को स्वदेशी स्टोल और हार पेश करते हुए देखती है, जिसे लोग हाथ में लेते हैं, कीमत पूछते हैं और उन्हें खरीदे बिना वापस कर देते हैं। लोगों का यही रवैया उस महिला की चिंता का केंद्र बन जाता है।  वह कलाकृतियों के स्थानीय विक्रेता के साथ इतना उदासीन व्यवहार करने के लिए लोगों की आलोचना करना शुरू कर देती है, बजाय इसके कि उसे बढ़ावा दे और उसकी कड़ी मेहनत के लिए कुछ देखभाल और पैसे देकर मदद करे। उनका बेटा भी ये सब देख रहा है और साथ ही अपनी माँ को भी देख रहा है। वह लोगों के रवैये पर प्रतिक्रिया करती है:

 लाखों का ख़र्चा कर के इस टापू पर आकर मनोरंजन करने वाले सैलानी यहाँ की कला को नहीं ख़रीद सकते। मूल निवासियों की सहायता नहीं कर सकते। उसे बहुत अचरज हो रहा था। अनायास ही उसके मुख से निकला, “कितने ओछे हैं लोग।”

 माँ की टिप्पणी पर, उसका बेटा भी तुरंत उसके रुख पर टिप्पणी करता है: “आपने भी तो कुछ नहीं ख़रीदा मम्मा।” लेखक एक उदाहरण के माध्यम से मानवीय कमजोरियों और भ्रांतियों को संप्रेषित करने में सफल रहा है।

 राजनीति

सुषमा गुप्ता की बहुत छोटी लघुकथा ‘राजनीति’ में देखा जा सकता है कि कैसे युवा अपनी उच्च राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उचित या अनुचित तरीकों का सहारा लेते हैं; समाज पर किसी नैतिक प्रभाव की परवाह किये बिना। लेखक आरम्भ की वाक्य में मुख्य पात्र के आंतरिक द्वंद्व को सामने लाती है:  “अबे तूने ये क्या तमाशा लगाया है। ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद? राहुल ने युनिवर्सिटी कैम्पस में भीड़ देख मोहन से पूछा।यह लघुकथा भारत में राजनीति में प्रवेश करने के लिए लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले तरीकों पर कटाक्ष करती है। यह बताता है कि राष्ट्र के लिए कम से कम चिंता वाली सनसनीखेज ब्रेकिंग न्यूज बनाने की मीडिया की आत्मकेंद्रित चिंता ने देशभक्ति की भावना को कैसे कुचल दिया है:

 मुझे राजनीति में जाना है। कई साल से देशभक्ति के नारे लगा रहा हूँ। कोई ध्यान ही नहीं देता। आज  ज़रा पाकिस्तान जिंदाबाद क्या बोला, तू सामने भीड़ देख और तो और मीडिया वाले भी जमघट लगाएँ है।”

 राजनीतिक दल भी उन लोगों के लिए अपने दरवाजे खोल देते हैं जो बेधड़क और बेशर्मी से झूठ बोलने में माहिर होते हैं। यह खेदजनक है कि झूठ बोलना किसी राजनीतिक दल में शामिल होने और चुनाव में टिकट पाने के लिए प्राथमिक पात्रता बन जाता है:

 अबे गधे जेल जाएगा।”

. . . “जेल जाते ही हीरो बन जाऊँगा। सब अखबारों में छा जाऊँगा। फिर अपनी बात से पलट जाऊँगा।  बेरोजगारी की झुँझलाहट का जामा पहनाऊँगा और किसी न किसी बड़ी पार्टी का टिकट पा जाऊँगा।”

 यह लघुकथा व्यंग्यपूर्ण ढंग से यह संदेश देती है कि नागरिकों, मीडिया, अधिकारियों और राजनेताओं, सभी को राष्ट्र की सेवा करते समय नैतिकता बनाए रखनी चाहिए।

  मनीऑर्डर

खेमकरण सोमन ने अपनी लघुकथा ‘मनीऑर्डर’ में सगे भाइयों के बीच पारिवारिक विवाद के बाद की स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है। वह बताते हैं कि कैसे रक्त संबंधों के बीच शब्दों के आदान-प्रदान के बावजूद, और जब वे एक-दूसरे के साथ बातचीत नहीं करते हैं तब भी अंतर्निहित प्रेम कभी नहीं मरता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि जरूरत के समय समझौता करने या मदद के लिए हाथ बढ़ाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया जाए।

 लघुकथा प्रारंभिक वाक्य भाइयों के बीच के विवाद को उजागर करता है: “घर का बँटबारा और बोलचाल बंद हुए कई वर्ष बीत चुके थे।” लेखक दोनों भाइयों की आपसी कलह और उसके समाधान के रास्ते को संवादों के माध्यम से काफी नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करता है और कही गई बातों के बजाय अनकही बातों के जरिए बहुत कुछ बता देता है। बड़े भाई की पत्नी पहल करती है। वह अपने पति से झूठ बोलकर कुछ पैसे माँगती है कि उसे अपनी माँ को पैसे भेजने हैं। पति बिना कोई सवाल पूछे उसे पैसे दे देता है।  वह अपने पति के छोटे भाई की पत्नी को उसके परिवार में चल रहे आर्थिक संकट पर चिंता महसूस करते हुए पैसे देती है:

 ‘‘पाँच हजार रुपये चाहिए।एक दिन बड़े भाई की पत्नी बोली―माँ बीमार है। गाँव मनीऑर्डर करना है।’’ बड़े भाई ने कुछ नहीं कहा। शान्त भाव से पैसे दे दिए। पैसे लेकर बड़े भाई की पत्नी फिर सीधे अपने देवर-देवरानी के घर पहुँच गई। वह उनके आर्थिक संकट से विचलित थी। पैसे दिए तो दोनों संकोच से गड़ गए।

 पति अपनी पत्नी को अपने भाई के परिवार की मदद करते हुए चोरी-छिपे देखता है, लेकिन चुप रहता है। वह उससे केवल यही कहता है: ठीक है। समय-समय पर इसी तरह मनीऑर्डर करा दिया करो।बड़े भाई लगभग रो पड़े। कमरे से निकलते हुए बोले― अपना ही खून है।”  वास्तव में, इस लघुकथा में पाठकों के लिए एक सकारात्मक संदेश है। इस कहानी का सबसे  महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि यह न केवल एक प्रश्न खड़ा करती है, बल्कि एक प्रासंगिक और व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करती है।

  रसोई

दिव्या शर्मा की लघुकथा “रसोई” एक परिवार में एक समय में दो पीढ़ियों के पुरुष और महिला दृष्टिकोण के बीच टकराव का एक शक्तिशाली विवरण है। लघुकथा एक वैध मुद्दा उठाती है कि घर का नक्शा और योजना बनाते समय कोई भी गृहिणी के रूप में एक महिला के दृष्टिकोण को नजरअंदाज नहीं कर सकता है।

 लघुकथा की शुरुआत दो मुख्य पात्रों, पति-पत्नी सुधीर और विभा से होती है। सुधीर ने उत्साहपूर्वक अपने पिता को नए घर का नक्शा और लेआउट प्लान दिखाया और बताया कि उन्होंने ड्राइंग रूम और बेडरूम के लिए पर्याप्त जगह रखी है: पापा देखो, चार कमरे निकल आए हैं और मंदिर के लिए अलग स्पेस भी।सुधीर ने उत्सुकता से  पिता के सामने नक्शा बिछाकर कहा।लेकिन पत्नी विभा तुरंत टोकती हैं और पूछती हैं कि उन्होंने किचन के लिए कितनी जगह दी है:

 रसोई का क्या साइज है?” विभा ने पूछा।

अरे यार तुम चाय रखो पहले, बहुत थक गया हूँ।सुधीर ने विभा की बात को अनसुना कर बोला।

. . .

आठ बाई आठ की रसोई तो बहुत छोटी बनेगी।”- विभा बोली।

आठ बाई आठ की रसोई छोटी नहीं होती और वैसे भी तुम्हें कौन- सा रसोई में खाट बिछानी है! खाना ही तो बनाना है।” – चाय का घूँट भरते हुए सुधीर ने कहा।

 यह सवाल सुधीर को परेशान करता है, क्योंकि उसे लगता है कि रसोई के लिए ज्यादा जगह की जरूरत नहीं होती। हालाँकि, विभा का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। विभा इस बात पर ज़ोर देती हैं कि रसोई घर में सबसे महत्त्वपूर्ण जगह होती है।

 मेरा तो पूरा दिन ही वहीं बीतता है बस खाट ही नहीं बिछाती। गर्मी में कितनी घुटन हो जाती है, तुम क्या जानो।विभा के स्वर में उदासी थी।

अरे यार, मम्मी ने पूरी जिंदगी इस छह बाई छह की रसोई में बिता दी, उन्होंने तो कभी शिकायत नहीं की, छोटी रसोई की!”-सुधीर ने चिढ़ते हुए कहा।

कभी खड़े होकर देखना जून की गर्मी में। खुद पता चल जागा मैं शिकायत कर रही हूँ या परेशानी बता रही हूँ।” –विभा बोली।

 सुधीर की माँ भी रसोई का आकार तय करने में अपनी बहू का पक्ष लेती है: बिल्कुल सही है। औरत की पूरी जिंदगी रसोई के धुँए में  स्वाहा हो जाती है; लेकिन किसी को इसका एहसास नहीं होता। सुधीर तू रसोई का साइज दो फुट बढ़ा और देख रसोई में हवा और रौशनी बराबर हो।माँ ने आदेश दिया।  अंत में, सुधीर और उसके पिता को महिलाओं के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा, क्योंकि केवल वे ही रसोई के माध्यम से परिवार का भरण-पोषण करती हैं: नहीं माँ, आपकी बहू को कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि जान गया हूँ कि बहुमत उसी के पास है।सुधीर ने दोनों हाथ विभा की ओर जोड़ दिए।बहू के बहुमत में लेखक का यमक प्रयोग पाठक को अनायास बाँध लेता है।

पानी की जाति

अपनी लघुकथा “पानी की जाति” में, विष्णु प्रभाकर ने पानी को प्रकृति के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। जल जीवन के सतत प्रवाह को दर्शाता है। अपनी गंधहीन, रंगहीन, पारदर्शी, क्षणभंगुर, अस्थायी, और निरंतर प्रवाहशील प्रकृति में, पानी इस संसार के वास्तविक स्वरूप का भी प्रतीक है ― जो क्षणभंगुर और अस्थायी है; तथा जिसकी निर्मिति में धर्म, जाति, पंथ, समुदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव स्थायी नहीं है। वास्तव में, सभी प्रकार के भेद मानव-निर्मित हैं। प्रकृति ने अपनी विविध रचनाओं के बीच ऐसा कोई विभाजन या सीमांकन नहीं किया है।

इस लघुकथा का प्रमुख विषय हिंदू-मुस्लिम समुदायों के मध्य की अस्पृश्यता है, जिसे संकट या विशिष्ट आवश्यकता के क्षण में नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। प्रभाकर प्रभावी ढंग से चित्रित करते हैं कि कैसे बीमारी, परेशानी या निज प्राण-रक्षा की आवश्यकता आन पड़ने पर ― मनुष्य के लिए धर्म या जाति के सभी विभाजन अर्थहीन हो जाते हैं। संकट के क्षण में मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य जीवन बचाना हो जाता है।

लघुकथा के आरम्भ में समस्या सामने आ जाती है: “बी.ए. की परीक्षा देने वह लाहौर गया था। उन दिनों स्वास्थ्य बहुत ख़राब था।. . . मार्ग में तबीयत इतनी बिगड़ी कि चलना दूभर हो गया। प्यास के कारण, प्राण कंठ को आने लगे।” निश्चय ही लघुकथा के प्रमुख पात्र के लिए यह घोर संकट का समय था। वह मुसलमानों की बस्ती से गुज़र ही रहा था, कि बेहोश होने की स्थिति में आ गया था। ऐसे में उसे मानवीय सहायता की दरकार थी, उसने हिन्दू-मुसलमान के भेदभाव को त्यागकर एक मुस्लिम की दूकान में शरण ले ली।

दुकान के मुसलमान मालिक ने उसकी ओर देखा और तल्ख़ी से पूछा— “क्या बात है” जवाब देने से पहले वह बेंच पर लेट गया। बोला— “मुझे बुखार चढ़ा है। बड़े ज़ोर की प्यास लग रही है। पानी या सोडा, जो कुछ भी हो, जल्दी लाओ!” मुस्लिम युवक ने उसे तल्ख़ी से जवाब दिया— “हम मुसलमान हैं।” वह चिनचिनाकर बोल उठा— “तो मैं क्या करूँ”  वह मुस्लिम युवक चौंका। बोला— “क्या तुम हिन्दू नहीं हो? हमारे हाथ का पानी पी सकोगे”  उसने उत्तर दिया— “मेरी जान निकल रही है और तुम जात की बात करते हो। जो कुछ हो, लाओ!”

वह मुसलमान के हाथ का पानी पीकर राहत महसूस करता है। लेखक ने  मानव धर्म को पानी की प्रकृति से जोड़ कर बहुत प्रभावी ढंग से लघुकथा का उपसंहार प्रस्तुत किया है: “उसका मन शांत हो चुका था और वह सोच रहा था कि यह पानी, जो वह पी चुका है, क्या सचमुच मुसलमान पानी था?”  नि:सन्देह, यह लघुकथा वर्तमान समाज में मानवीय मूल्यों के संरक्षण, तथा धर्म व जाति के संकीर्ण भेदभाव से ऊपर मानवीय गरिमा के आह्वान को गंभीरता से दर्ज करती है।

डोरियाँ

अर्चना राय की लघुकथा “डोरियाँ” अनिवार्य पारिवारिक मूल्यों को पोषित करती है, जो धन, संपत्ति या भौतिक लाभ के विचारों से ऊपर हैं। यह लघुकथा एक असहाय पिता को दर्शाती है जो अपने पुत्र एवं पुत्रवधू द्वारा अपनी देखभाल से अनुगृहीत है; यह एक पुत्र के चरित्र को चित्रित करती है, जो अपने पिता की यथासम्भव देखभाल करता है; और यह एक अत्यधिक प्यार करने वाली, सम्मान करने वाली, और देखभाल करने वाली बहू के चरित्र को भी हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करती है। बहू की भूमिका को बहुत प्रभावी रूप से दर्शाया गया है, जिसे ससुर ने भी अपनी स्नेही माँ के समान देखा/माना है। सच में, यह लघुकथा बच्चों से प्रेम, आदर, एवं वाञ्छित सेवा-सुश्रूषा प्राप्त करने में एक पिता की आंतरिक आनंद की अपरिभाषित अनुभूति का प्रलेखन करती है।

लघुकथा का प्रारम्भ होता है एक पिता की चिन्ता से: “अस्पताल के बेड पर पड़े -पड़े दुख और ग्लानि से उनका दिल बैठा जा रहा था। जब से उन्हें पता चला कि उनके आपरेशन के लिए बेटे ने घर गिरवी रख पैसे जुटाए हैं. . .”  एक पिता के दायित्व को निभा पाने में असमर्थ रहने पर उस पिता के हृदय की पीड़ा को मार्मिक दृश्य में दर्शाया गयाहै: “बेटे- बहू को सामने से आते देख उनका जी चाहा कि अभी धरती फट जाए और वे उसमें समा जाएँ। मैं अपने बेटे से कैसे नजरें मिला सकूँगा, बहू मेरे बारे में क्या सोच रही होगी? पिता तो वह होता है जो बच्चों के दुख- तकलीफ दूर करता है। और एक वह है, जिसने अपने बच्चों को ही तकलीफ में डाल दिया है। एक्सीडेंट में मैं मर क्यों न गया, मन- ही- मन अपने आप को लानतें दे रहे थे।” लेकिन पुत्र के ढाढसपूर्ण शब्दों से उनके तप्त हृदय को शीतलता प्राप्त होती है:  “पर बेटा… मेरी वजह से घर….” ―कहते हुए उनकी हिचकियाँ बँध गईं। “कोई बात नहीं पिताजी आपके साथ और आशीर्वाद से ऐसे कई घर बना लेगें।” बेटे ने  ढा़ढ़स बँधाया।

पुत्रवधू की सान्त्वना से वे द्रवित हो जाते हैं: “पिताजी!…आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए …. सब ठीक हो जाएगा।” ―आगे बढ़कर बहू ने ससुर के माथे पर प्यार से हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा।”  लघुकथा का अन्त भावनात्मक दृश्य के साथ हुआ है, जिससे कथ्य को अत्यन्त मार्मिक ढंग से सम्प्रेषित किया गया है: “ममता- भरा नर्म स्पर्श पाकर उन्होंने आँखें  खोलीं। सामने देखकर वे चकित रह गए ! अचानक उन्हें बहू के चेहरे में अपनी माँ की छवि दिखाई दे रही थी। वह भी तो ऐसे ही उनके सिर पर हाथ फेर सारी तकलीफें हर लेती थी। वहाँ खड़ी नर्स की आँखें बरबस भीग गईं। एक तीस साल की माँ का साठ साल के बेटे को दुलार करते देखकर!”

बुद्ध

पूनम कतरियार की लघुकथा “बुद्ध” ग्रामीण जीवन शैली को दर्शाती है, जो देहाती जीवन के अतुलनीय आनन्द और एक निर्धन भूमिहीन ग्रामीण की जीवन के प्रति अत्यधिक संतोषपूर्ण दृष्टिकोण एवं सोच से परिपूर्ण है। यह लघुकथा संतुष्टि, शांति, विश्रान्ति, आह्लाद, सादगी, सरलता, सहजता, नि:स्वार्थ प्रेम और परोपकार की भावनाओं का चित्रण करती है जो वास्तव में ग्रामीण जीवन का एक अनूठा पहलू है। लेखक एक शहरी व्यक्ति के आंतरिक अनुभूति को चित्रित करता है जो इस सांसारिक जीवन को समझ पाने के विषय में बुद्धत्वपूर्ण है। एक शहरी व्यक्ति एक रिसॉर्ट विकसित करने के लिए अपनी गाँव की भूमि को एक बिल्डर को बेचकर अरबपति बनना चाहता है। लेकिन भूमिहीन ग्रामीण की आत्म-संतुष्ट जीवनशैली उसके दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल देती है, और वह बिल्डरों को भूमि बेच देने का विचार छोड़ देता है। गाँव की जीवनशैली में सुखद शांति और उत्साह पाकर ऐसा लगता है जैसे उसकी सारी इच्छाएँ वहीं पूरी हो गईं।

लघुकथा के प्रथम दृश्य में प्रमुख पात्र, शहर का एक धनाढ्य व्यक्ति, अपनी चिन्ता को अभिव्यक्त करता है: “महाबोधि-मंदिर को दूर से ही प्रणाम करते हुए, उन्होनें अपनी मनोकामना पूर्ण होने की मन्नत माँगी।” और साथ ही वह धनिक पात्र अपनी हार्दिक इच्छा भी कह देता है: “दूर तक फैले विशाल खेतिहर ज़मीन को देखते हुए उन्होंने सोचा― “अब सब झमेला ख़त्म हो जाएगा। बार-बार फ़सल बुआने-बेचने में छुट्टी बर्बाद होती है। अभी दो महीने पहले ही तो धान की फ़सल कटवा-बेचकर गए थे। अच्छा है, अब बिल्डर को रिसॉर्ट बनाने देकर, करोड़ों में खेलेंगें!” यही नहीं, गाँव की भूमि को बेचकर वह वहाँ पर बनने वाले रिसॉर्ट और उससे होने वाले और अधिक धनागम के मधुर स्वप्न देखने लगता है: “बिल्डर का इंतज़ार करते हुए, उनकी आँखों में रिसॉर्ट का स्वरूप झिलमिलाने लगा―दूर तक फैले  रिसॉर्ट में लॉन टेनिस, वॉलीबॉल, टेबुल-टेनिस आदि अनेक प्रकार के खेलों के शानदार कोर्ट, कृत्रिम झील में तैरते छोटे-बड़े, जल-नौकाएँ …चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड आदि अनेक देशों के बौद्ध-धर्मावलंबियों और पर्यटकों से गुलजार रिसॉर्ट!”

इस बीच उस धनाढ्य व्यक्ति का ध्यान जाता है गाँव के एक भूमिहीन निर्धन व्यक्ति रघुआ पर। वह उससे वार्तालाप करने लगता है: “रौबदार आवाज़ में रघुआ को आवाज़ दी― “का रे रघुआ, यहाँ से बुद्ध-भगवान का मंदिर दस-बारह किलोमीटर ही होगा न? बिदेशी लोग तो इधर ख़ूब आते होंगें?”

“जी हुजूर, मंदिर तो ज़्यादा दूर नहीं है। बाक़ी बिदेसी सबका हमको नहीं पता। हमनी का तो दिन आप मालिक लोगन के खेती-बारी और गाय-गोरू में बीत जाता है…बच्चा सब सरकारी स्कूल में पढ़-लिख रहा है और जिनगी में का चाही।”

रघुआ की संतोषपूर्ण जीवनशैली और गाँव की सहज-सरल दिनचर्या अपना प्रभाव दिखाती है: “ताजे छाछ के स्वाद में घुली उनकी ज़ुबान लटपटा गई और वे फ़ोन पर कह रहे थे―“सॉरी, मुझे वह प्रोजेक्ट कुछ ख़ास नहीं लग रहा।” फोन काटते ही उन्हें बोध हुआ कि उनके सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया है।” अपनी भूमि के विषय में दिन-रात चिन्तित रहने वाले धनिक का हृद्य परिवर्तन तथा वैचारिक व्यपवर्तन लघुकथा के उपसंहार में प्रभावपूर्ण दृश्य के साथ सम्प्रेषित हुआ है: “चारों ओर नज़र घुमाई तो रघुआ और आस-पास रह रहे अपने खेतों में काम करनेवाले भूमिहीन परिवारों को अपने दैनिक कार्यकलापों में व्यस्त देखा, उनकी आँखें ख़ुशी से भर आईं और वे असीम आनंद में डूब गए।”

लौहद्वार

लघुकथा के कुशल शिल्पकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की रचना “लौहद्वार” एक राज्य में कुशासन और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की तस्वीर को व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत करती है। राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के दृश्यों के चित्रण और अधिकारियों और आम आदमी के बीच संवाद के माध्यम से, लेखक दर्शाता है कि कैसे राज्य में शांति भंग हो गई है, और राज्य में व्यवस्था के खिलाफ जनता में असंतोष व्याप्त है। राज्य के न्यायिक तंत्र में सत्य अनसुना रहता है। सभी मंत्री और न्यायकर्त्ता जनता की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं, जबकि शासक भी इसके प्रति या तो अनभिज्ञ है या पूरी तरह से लापरवाह है।

लेखक ने इस समस्या की उत्कटता को सम्प्रेषित करने के लिए शाब्दिक चातुर्य का प्रयोग किया है, यह दिखाने के लिए कि किस प्रकार समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उत्पन्न बौखलाहट में शान्तिप्रिय व्यक्ति भी सत्य के प्रकाश को पहचान पाने में अक्षम हो जाता है: ‘‘यह कौन -सा समय है फ़रियाद करने का’’―लौह-द्वार को बाहर की ओर धकेलकर खोलते हुए द्वारपाल झुँझलाया। ‘‘हुजूर, सत्यप्रकाश को शन्तिप्रिय ने मार दिया।’’- आम आदमी भयभीत स्वर में बोला।

भ्रष्ट राजतन्त्र और सुषुप्त न्यायव्यवस्था में शान्तिप्रिय व्यक्ति पागलपन की कगार तक पहुँच जाय, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगि: “न्याय मंत्री जी को सूचित करना था, ताकि वे शान्तिप्रिय के पागलपन पर रोक लगा सकें।’’

‘‘वे अभी सो रहे होंगे। तुम्हें इतनी जल्दी नहीं आना था।’’ राजतन्त्र के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी की आवाज़ को सुनने वाला कोई नहीं रहता: ‘‘शान्तिप्रिय पर शैतान सवार हो गया है। वह भीड़ लेकर उसके परिवार तक को मारने पर तुला है। उसको न रोका गया, तो अनर्थ हो जाएगा।’’―आम आदमी गिड़गिड़ाया।”

सरकारी तंत्र में घोर भाई-भतीजावाद या पक्षपात व्याप्त है, जिसे लेखक ने प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। ऊपर तक पहुँच न हो तो आम आदमी की पुकार का कोई न्यायाधीश, अधिकारी या मन्त्री स्वत:स.ज्ञान तो क्या लेगा, उसे निकट भी आने न देगा, इस कटु तथ्य को लेखक ने इस दृश्य में विचारोत्तेजक शब्दों में सम्प्रेषित किया है: “आपकी पहुँच किसी ऊपरवाले तक है, जो मंत्री जी से आपकी सिफ़ारिश कर दे।’’  ‘‘मेरी पहुँच किसी ऊपरवाले तक नहीं है। मंत्री जी स्वतः संज्ञान भी तो ले सकते हैं।’’  ‘‘ठीक है, घर में जाकर बैठो। स्वतः संज्ञान लेने की प्रतीक्षा करो।’’ द्वारपाल ने चीखते हुए लौह- द्वार को बलपूर्वक बन्द कर दिया।”

बंद दरवाज़ा

हिन्दी उपन्यास के सम्राट् तथा हिन्दी कहानी को नई दिशा प्रदान करने वाले मुंशी प्रेमचंद लघुकथा के शिल्प में भी सिद्धहस्त थे। उनकी लघुकथा “बंद दरवाज़ा” विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो लघुकथा के शिल्प एवं सम्प्रेषण की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है, और लघुकथाकारों के लिए एक मानक रचना कही जा सकती है। इस लघुकथा की संरचना काफ़ी जटिल है, जिस कारण मात्र एक बार पढ़ने से इसकी संप्रेषणीयता कठिन हो जाती है, परन्तु एकाधिक बार पढ़ने से इसके कथ्य और शिल्प को समझा जा सकता है। प्रथम पंक्ति – “सूरज क्षितिज से निकला, बच्चा पालने से। वही स्निग्धता, वही लाली, वही ख़ुमार, वही रोशनी” – उदीयमान सूर्य और पालने से बाहर पग धरते बच्चे के समानांतर को सुन्दर कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। दरवाज़े के बाहर बच्चे के लिए एक नई / पृथक् दुनिया है, जिसे देखकर वह विह्वल हो उठता है। बच्चा बरामदे में बैठे अपने पिता की गोद में जाकर शरारतें करने लगता है; क़लम-कागज़ के साथ खेलने लगता है; गोद से उतारा तो मेज़ के पाये के साथ खेलने लगता है; चिड़िया फुदकती हुई आई तो उसे बुलाने लगता है; लेकिन जब चिड़िया उड़ जाती है तो निराश हो रोने लगता है; खुले हुए दरवाज़े से ‘गरम हलवे’ की मीठी पुकार आई तो बच्चे का चेहरा चाव से खिल उठा, लेकिन उसी क्षण खोंचेवाले को देख उसका ध्यान फिर भटक जाता है; वह पिता से याचना-फ़रियाद करता है, लेकिन;  (क्योंकि पिता बाज़ार की चीज़ें बच्चों को खाने नहीं देते) विफल रहता है, उदास हो जाता है; पिता उसे अपना फाउंटेन पेन देते हैं, तो फिर प्रसन्न हो जाता है; इसी बीच जैसे ही हवा से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ उसे सुनाई देती है, वह पेन को भी फेंक देता है, और रोता हुआ दरवाज़े की तरफ़ चल पड़ता है ।

इस सारे घटनाक्रम में ‘दरवाज़े के बाहर की दुनिया’ में बच्चा कई प्रलोभन देखकर भ्रांतचित्त होकर टहलता है, लेकिन तभी तक जब तक ‘दरवाज़ा खुला हुआ था’; जैसे ही दरवाज़ा बंद होता है, बच्चा सब चीज़ों से ध्यान हटाकर, सब कुछ त्याग कर, रोता हुआ दरवाज़े की ओर बढ़ने लगता है । ‘दरवाज़ा’ इस लघुकथा में एक सशक्त बिम्ब बना है, जो एक नन्हे बच्चे की दृष्टि में घर के बाहर और अंदर की दुनिया के वैषम्य को दिखाता है। दरवाज़े के बाहर प्रलोभन अनेक हैं, परन्तु सुरक्षा का भाव दरवाज़े के भीतर है। दरवाज़ा इस लघुकथा की धुरी बन गया है, जिसके इर्दगिर्द कहानी घूमती है। कथाकार ने बारम्बार इसी पर ध्यान केंद्रित किया है: ‘दरवाज़ा खुला हुआ था’ से आरम्भ होकर ‘दरवाज़ा बंद हो गया था’ पर कथा पूर्ण होती है। बच्चा दरवाज़े के बाहर के दृष्टिक्रम से लुब्ध-आकृष्ट होता है, परन्तु तभी तक जब तक घर का दरवाज़ा खुला रहता है; दरवाज़ा बंद होते ही वह सब कुछ भुलाकर उसी ओर मुड़ जाता है।

दरवाज़े के अंदर की दुनिया को कथाकार ने अव्यक्त रखा है, किंतु स्पष्टतः अनुपस्थिति में भी बच्चे की माँ अपनी उपस्थिति बनाए हुए है। बच्चा किसी भी हाल में अपनी माँ को नहीं भूला है; दरवाज़ा खुला रहते उसे माँ की सुरक्षा की प्रत्याभूति बनी रहती है, लेकिन दरवाज़ा बंद होते ही वह असुरक्षित अनुभव करने लगता है। दरवाज़े के अंदर बच्चे के लिए माँ की सुरक्षा है, ममत्व है, वात्सल्य है, विश्वास है, आराम है, सुकून है, अपनत्व है, निजत्व है, स्वातन्त्र्य है,  स्वाधिकार है, जो उसे बाह्य संसार में नहीं मिलता। साथ ही दरवाज़े के भीतर की दुनिया, जहाँ बच्चे का पालना है, उसकी जड़ें हैं, जिनकी ओर वह वापस मुड़ आता है। कथा के आरम्भ में क्षितिज में उदित सूर्य अंधकार के घिरने से पूर्व क्षितिज-दरवाज़े पर आ जाता है। शीर्षक ‘बंद दरवाज़ा’ बच्चे के तनाव के केन्द्रबिन्दु को इंगित करता है – दरवाज़े के बंद होने से ही उसका ध्यान बाह्य प्रलोभनों से हटता है, और द्वन्द्वों से मुक्त होकर, एकमन होकर, वह दरवाज़े के अन्दर की ओर मुड़ता है।

कथाकार के पैने अवलोकन के कारण यह कथा लघ्वाकारी होते हुए भी बहुत से दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। एक बालक के हठ एवं व्यग्रता के माध्यम से बाल-मनोविज्ञान की जटिलता को सहजता से उकेरती है। कुछ समकालीन सामाज के सत्य को भी उजागर करती है, जैसे – मानव के जीवन में घर-परिवार के महत्त्व को कहती है; मातृशक्ति के महत्त्व को कहती है; और पितृसत्तात्मक सामाजिक विभाजन में पिता (पुरुष) को घर के बाहर और माता (स्त्री) को घर के अंदर के क्रियाकलाप तक सीमित रखते हुए भी माँ की ममता का सब पर भारी पड़ने को मार्मिक ढंग से दर्शाती है।

प्रेमचंद की लघुकथा ‘बंद दरवाज़ा’ में कहानी की संपूर्णता है; एक ही दृश्य के सीमित परिवेश की इतिवृत्तात्मकता में जीवंतता है, पात्र-संघर्ष की सहजानुभूति है, घर की उष्मापूरित ‘फील’ है, बालमन की ऋजुता, आकुलता व मृदुल भावात्मकता है। शिल्प, शैली एवं कथ्य की दृष्टि से प्रेमचंद की यह लघुकथा बेजोड़ है। सरल-सहज भाषा में कथानक प्रवाहमयी है और भावपूर्ण है। अपने कालखण्ड में प्रयोग, संरचना और तकनीक की दृष्टि से यह रचना विलक्षण है। ‘ईदगाह’ कहानी की भांति अपने सार्वत्रिक महत्त्व के लिए यह लघुकथा भी बाल-मनोविज्ञान पर एक क्लासिक, कालजयी रचना कही जा सकती है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

उपरि-विवेचित रचनाओं के शिल्प एवं सम्प्रेषण कला के आधार पर निष्कर्षत:  कहा जा सकता है कि हिंदी लघुकथा में कुछ उल्लेखनीय संरचनात्मक घटक और तत्व हैं, जो इस शैली को लघ्वाकार कहानी के अन्य रूपों से अलग बनाते हैं: (1) यह अक्सर मध्य या अंत में शुरू होती है; तथा इसमें अक्सर एक अनियमित कथानक होता है, और आरम्भ, मध्य और अंत का बहुत संकीर्ण या सूक्ष्म सीमांकन होता है। (2) अधिकतर लघुकथाएँ चरित्र अथवा पात्र- केंद्रित हैं, और पात्रों/चरित्रों का परिचय प्राय: प्रारम्भिक दृश्य या वाक्य में हो जाता है। (3) कहानी की केन्द्रीय समस्या या मुद्दे का उल्लेख भी प्राय: आरंभिक पंक्तियों में ही रहता है। (4) लघुकथा का उद्देश्य प्राय: किसी पात्र या दृश्य के माध्यम से किसी विशेष सामाजिक मुद्दे अथवा सरोकार को स्वरित करना होता है।  (5) लघुकथा में शब्दों की संख्या बहुत सीमित है। (6) लघुकथा का चरम पात्रों के दृष्टिकोण में परिवर्तन या पात्रों द्वारा स्व-निर्णय की त्रुटि एवं पूर्वाग्रहयुक्त अवधारणाओं के निराकरण के रूप में हो सकता है। (7) लघुकथा व्यापक रूप से समाज और मानवता के लिए एक नैतिक संदेश देती है।  (8) लघुकथा में कुछ भाषायी विशेषताएँ और कौशल देखे जा सकते हैं, जिनमें निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं:  सरल और सीधी नित्यप्रति की भाषा का प्रयोग; कहावतों, मुहावरों और दैनिक जीवन के उदाहरणों का प्रयोग; पढ़ने और समझने में आसान शब्दावली, जो  बड़े पैमाने पर पाठक वर्ग को आकर्षित करती है; कलात्मकता एवं नाटकीयता के साथ कथ्य की प्रस्तुति; दृश्यात्मकता यानी कथ्य को दर्शाने की कला, स्पष्ट अथवा सपाट रूप से वर्णन करने की नहीं (आज के शैलीगत मानदंडों के अनुसार); भावनात्मक, सनसनीखेज़, मार्मिक; तथा आलंकारिक उपकरणों का प्रयोग, जैसे व्यंग्य, कटाक्ष, हास्य, निर्देश, रूपक, उपमा, संकेत, इत्यादि। (9) विषयवस्तु के संबंध में, लघुकथा जीवन- मूल्यों, मानवीय सम्बन्धों एवं रीति-रिवाज़ों के निरूपण के साथ-साथ विभिन्न समसामयिक सामाजिक समस्याओं एवं मुद्दों पर प्रतिक्रिया प्रस्तुत करती है।

~डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

कवि, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक (हिन्दी/ अँग्रेज़ी),प्राध्यापक (अँग्रेज़ी) एवं सम्पादक: हाइफ़न,#3, सिसिल क्वार्टर्ज़, चौड़ा मैदान, शिमला: 171004 हिमाचल प्रदेश।

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