“ये इतनी सारी रोटियाँ बच गई, अन्न की बरबादी नहीं करते।” माँ ने रसोई में घुसते, रोटियों के लगे ढेर को देखते हुए कहा।
“माँ जी, पहले समोसे-पकौड़े खा लिये, फिर रोटियाँ किसे खानी थीं”- बहू ने जवाब दिया।
“होटल से रोटियाँ कम मँगवानी थी ना” , माँ ने रोटियों को एक लिफाफे में डालते कहा।
“बस माँ जी, जल्दी-जल्दी हँसी- मज़ाक में बैठे हिसाब नहीं लगाया और इन्होंने कर दिया ऑर्डर।”- बहू ने स्पष्टीकरण देने की कोशिश की।
“चल छोड़, अब। इस तरह कर, बाहर रख दे कूड़े के साथ। कूड़ा उठाने वाला लड़का आएगा ना, उसे दे देना, किसी गरीब के मुँह में तो जाएँगी”, माँ ने लिफाफा बहू के हाथ पकड़ाते कहा।
कूड़े वाले ने बेल बजाई, तो माँ ही भागी हुई गई। दरवाज़ा खोलकर जब वह कूड़ा उठाने लगा, तो माँ कहने लगी, “भइया ये रोटियाँ भी ले जाना।’’
कूड़े को रेहड़ी में डाल, डस्टबिन वापस रखा और रोटियों वाला लिफाफा उठाकर रेहड़ी में, कूड़े के साथ रख लिया।
माँ अभी वहीं खड़ी ही थी। एकदम बोली, “तूने इन्हें भी गंद के साथ रख लिया। रेहड़ी के हैंडल से टाँगनी था।”
“बीबी जी,” -वह कहते-कहते हुए रुका और फिर कहा, “बात यह है कि बच्चे खाते नहीं।”
“क्यों? क्या हुआ है, ताजी जैसी ही हैं, रात को ज़्यादा मँगवा ली बच्चों ने”, माँ ने समझाने की कोशिश की।
उसने मन में कहा, “अगर ताजी जैसी है, तो आप क्यों नहीं खा लेते’’, पर बोला नहीं। उसे तकरीबन हर रोज़ ही ऐसी बातों का सामना करना पड़ता है।
उसने सहज भाव से कहा, “वो तो ठीक है बीजी, बच्चे कहते हैं माँ के हाथ से बनी रोटी खाएँगे!’’
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