सुबह के नौ बजे थे। रामवती की समोसे और पकौड़ी की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी। कुछ लोग थैलियों में समोसे और पकौड़ियाँ लेकर घर जा रहे थे, कुछ वहीं पड़ी बैंचों पर बैठकर समोसे खा रहे थे।
बैंक कैशियर रमन जायसवाल भी नाश्ता करने आए थे। उन्होंने रामवती से एक प्लेट पकौड़ी और दो समोसे लिए और कोने में पड़ी एक खाली बैंच पर बैठकर समोसे खाने लगे। उन्होंने पास की दुकान से एक कप गर्मागर्म चाय भी मँगा ली थी। चाय के साथ बे समोसे और पकौड़ियों का आनन्द ले रहे थे।
रामबती के बनाए हुए समोसे और पकौड़ियाँ बहुत स्वादिष्ट होती थीं, इसलिए आस-पास के ऑफिसों के कर्मचारी उसी के यहां नाश्ता करने के लिए आते थे।
रमन जायसवाल समोसे और पकौड़ियों के पैसे देने के लिए काउन्टर पर पहुँचे । तभी एक विचार उनके मन में तेजी से आया। उन्होंने रामवती से कहा- “रामवती< तुम चाय भी बनाना शुरू कर दो। इससे तुम्हारी आमदनी भी बढ़ेगी और ग्राहकों को भी आसानी हो जाएगी।”
‘‘बात तो आपकी ठीक है बाबूजी; मगर उस बेचारे चाय वाले का क्या होगा? उसके परिवार का खर्चा तो चाय की दुकान से ही चलता है।’’ रामवती ने सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखते हुए कहा।
‘‘आजकल धंधे में सब अपने फायदे के बारे में सोचते हैं ।’’-मैंने उसे समझाते हुए कहा।
‘‘हो सकता है आप ठीक कह रहे हो बाबूजी। मैं तो अनपढ़ हूँ। मुझे दुनियादारी की अधिक समझ नहीं है। फिर भी मैं अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उस बेचारे चाय वाले के बच्चों के मुँह का निवाला कैसे छीन सकती हूँ?’’ -उसने निर्विकार भाव से कहा।
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